अमित शाह के बेटे का केस लड़ सकते हैं एडिशनल सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता

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भारत के एडिशनल सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह के बेटे जय शाह का मानहानि का मुकदमा लड़ने की तैयारी में हैं.
न्यूज़ वेबसाइट 'द वायर' ने पिछले दिनों अपनी एक रिपोर्ट में दावा किया था कि नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद बीजेपी अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद अमित शाह के बेटे जय अमित शाह की कंपनी का कारोबार कई गुना बढ़ा.
इसके बाद बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के बेटे जय अमित शाह ने उन पर रिपोर्ट छापने वाली न्यूज़ वेबसाइट 'द वायर' के रिपोर्टर रोहिणी सिंह समेत सात लोगों पर सोमवार को आपराधिक मानहानि का केस दायर कर दिया.
तुषार मेहता ने न्यूज़ चैनल एनडीटीवी को दिए इंटरव्यू में कहा है कि इस मामले पर उनसे सलाह ली जा रही है और वो इस केस के लिए कोर्ट में भी आ सकते हैं.
मेहता ने एनडीटीवी से ये भी कहा कि 6 अक्टूबर 2017 को ही उन्होंने क़ानून मंत्रालय से जय शाह का केस लड़ने की अनुमति भी मांग ली थी.
जबकि 'द वायर' पर जय शाह के कारोबार पर रिपोर्ट दो दिन बाद छपी थी.

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आखिर कौन हैं तुषार मेहता?
तुषार मेहता को अमित शाह का करीबी माना जाता है.
इससे पहले तुषार मेहता 2002 के गुजरात दंगों के दौरान और सोहराबुद्दीन एनकाउंटर केस में गुजरात सरकार का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं.
तुषार मेहता, गुजरात के जामनगर के रहने वाले हैं और 80 के दशक में उन्होंने वकालत शुरू की.
उनके पिता जामनगर तालुका में अधिकारी थे. मेहता बहुत छोटे थे तभी उनके पिता की मौत एक सड़क हादसे में हो गई थी.
करियर की शुरुआत तुषार मेहता ने कृष्णकांत वखारिया के साथ जूनियर वकील के तौर पर की.
कृष्णकांत वखारिया गुजरात में कांग्रेस के बड़े नेता थे, और कई डेयरी और बैंक कोऑपरेटिव केस में अदालत में मुकदमा लड़ा था.
अमित शाह उस वक्त गुजारत में कोऑपरेटिव बैंक का प्रतिनिधित्व करते थे. उन्हीं दिनों तुषार मेहता की मुलाकात अमित शाह से हुई थी.

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इसके बाद, जब गुजरात में पहली बार नरेन्द्र मोदी की सरकार आई, तब तक तुषार मेहता खुद को नामी वकील के तौर पर साबित कर चुके थे, जिनको सिविल और कोऑपरेटिव केस लड़ने में महारत हासिल थी.
2007 में इनको गुजरात हाई कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता बनाया गया और इसके एक साल के भीतर ही उन्हें एडिशनल एडवोकेट जनरल बना दिया गया.
एडिशनल एडवोकेट जनरल के तौर पर तुषार मेहता ने मोदी के नेतृत्व वाली गुजरात सरकार का कई बड़े मामलों में प्रतिनिधित्व किया जिनमें सोहराबुद्दीन एनकाउंटर केस शामिल है.
2011 में गुजरात और महाराष्ट्र के कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने नरेन्द्र मोदी से नज़दीकियों की वजह से तुषार मेहता के इस्तीफे की मांग भी की थी.
तुषार मेहता के जय शाह का केस लड़ने में दिलचस्पी दिखाने के बाद सवाल ये भी उठने लगा है कि क्या सरकारी पद पर रहने वाला व्यक्ति कोई निजी मुकदमा लड़ सकता है?

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कानून मंत्रालय के नियम
सीनियर एडवोकेट संजय हेगड़े ने बताया कि कानून मंत्रालय से इजाज़त लिए जाने पर ऐसा होना मुमकिन है.
संविधान के जानकार सुभाष कश्यप का कहना है कि 'सरकार के वकील ऐसे किसी मुकदमे में निजी तौर पर लड़ सकते हैं जिसमें सरकार पार्टी ना हो.'
मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद अक्तूबर 2014 में कानून मंत्रालय के सचिव पीके मल्होत्रा ने कानूनी अधिकारियों को नसीहत दी थी.
24 अक्तूबर 2014 के अपने एक मेमोरेंडम में उन्होंने क़ानूनी अधिकारियों के सर्विस नियम, 1987 के नियम 8(1) को याद दिलाते हुए कहा कि सरकार के वकील केंद्र सरकार और इसकी संस्थाओं के अलावा किसी भी पार्टी के लिए कोर्ट नहीं जाएंगे.
ये भी बार-बार दोहराया गया है कि इस नियम में छूट का इस्तेमाल किसी असाधारण या विशेष केस में ही हो सकता है जिसके लिए कानून मंत्रालय से इजाज़त लेनी होगी.
मेमोरेंडम में जिक्र किया है कि इन निर्देशों के दोहराए जाने के बाद भी अधिकारी बार-बार प्राइवेट केस लड़ने की इजाज़त मांगने आ जाते हैं और कई बार अर्ज़ियां इतनी ज़्यादा हो जाती हैं कि उनका सारा वक्त निजी मुकदमों में ही चला जाता है और सरकारी मुकदमों पर इसका खासा असर पड़ता है.
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