क्या सरकारी वकील लड़ सकते हैं जय अमित शाह का केस?

जय शाह

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    • Author, सर्वप्रिया सांगवान
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

न्यूज़ वेबसाइट 'द वायर' ने अपनी एक रिपोर्ट में दावा किया है कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद अमित शाह के बेटे जय अमित शाह का कारोबार कई गुना बढ़ गया है.

इस खबर के सामने आते ही केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने जय शाह का बचाव करते हुए इसका खंडन किया और कहा है कि वेबसाइट और रिपोर्टर पर मानहानि का दावा किया जाएगा.

लेकिन इस सबके बीच भारत सरकार के एडिशनल सॉलीसिटर जनरल तुषार मेहता ने न्यूज़ चैनल एनडीटीवी से कहा है कि इस मामले में उनसे सलाह ली जा रही है और वो इस केस के लिए कोर्ट भी आ सकते हैं.

तुषार मेहता के इस बयान के बाद ये बहस उठी है कि क्या सरकार के वकील को किसी सामान्य नागरिक के लिए मुकदमा लड़ने की इजाज़त है या नहीं.

कानून मंत्रालय का मेमोरेंडम

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कानून मंत्रालय के नियम

सीनियर एडवोकेट संजय हेगड़े ने बताया कि कानून मंत्रालय से इजाज़त लिए जाने पर ऐसा होना मुमकिन है.

संविधान के जानकार सुभाष कश्यप का कहना है कि 'सरकार के वकील ऐसे किसी मुकदमे में निजी तौर पर लड़ सकते हैं जिसमें सरकार पार्टी ना हो.'

मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद अक्तूबर 2014 में कानून मंत्रालय के सचिव पीके मल्होत्रा ने कानूनी अधिकारियों को नसीहत दी थी.

24 अक्तूबर 2014 के अपने एक मेमोरेंडम में उन्होंने क़ानूनी अधिकारियों के सर्विस नियम, 1987 के नियम 8(1) को याद दिलाते हुए कहा कि सरकार के वकील केंद्र सरकार और इसकी संस्थाओं के अलावा किसी भी पार्टी के लिए कोर्ट नहीं जाएंगे.

ये भी बार-बार दोहराया गया है कि इस नियम में छूट का इस्तेमाल किसी असाधारण या विशेष केस में ही हो सकता है जिसके लिए कानून मंत्रालय से इजाज़त लेनी होगी.

मेमोरेंडम में जिक्र किया है कि इन निर्देशों के दोहराए जाने के बाद भी अधिकारी बार-बार प्राइवेट केस लड़ने की इजाज़त मांगने आ जाते हैं और कई बार अर्ज़ियां इतनी ज़्यादा हो जाती हैं कि उनका सारा वक्त निजी मुकदमों में ही चला जाता है और सरकारी मुकदमों पर इसका खासा असर पड़ता है.

बेटे जय और बहु रुशिता के साथ बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह

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निर्देशों के बावजूद इजाज़त ली गई

नियमों और निर्देशों के बावजूद सरकार के क़ानूनी अधिकारियों ने कई बार निजी मुकदमों के लिए इजाज़त ली.

हालांकि इजाज़त दिए जाने की वजह कानून मंत्रालय स्पष्ट नहीं करता है और ना ही किसी सर्विस नियम में वजहों को लिखा गया है.

मोदी सरकार के पहले दो साल में कई क़ानूनी अधिकारियों ने निजी मुकदमे लड़ने की इजाज़त मांगी.

सबसे ज़्यादा निजी मुकदमे लड़ने की अर्ज़ियां हाल ही में रिटायर हुए एडिशनल सालिसिटर जनरल पीएस पटवालिया ने दी थी.

मंत्रालय ने उनकी 18 में से 15 अर्ज़ियां मंज़ूर भी कर ली थीं.

एएसजी पिंकी आनंद की भी 17 अर्ज़ियों में से 11 को मंत्रालय ने इजाज़त दे दी. अनिल चंद्रबलि सिंह की सभी 14 अर्ज़ियों को मंज़ूर कर लिया गया.

कई मामलों में ऐसा भी हुआ कि लिखित इजाज़त मिलने का इंतज़ार किए बिना ही कानूनी अधिकारी निजी मुकदमों के लिए कोर्ट पहुंच गए.

सुप्रीम कोर्ट

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कानून अधिकारियों की नियुक्ति

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 76 के मुताबिक अटार्नी जनरल भारत सरकार के मुख्य कानूनी सलाहकार होंगे और सुप्रीम कोर्ट में भारत सरकार के प्रमुख वकील भी.

उनकी योग्यता सुप्रीम कोर्ट के जज के बराबर होनी चाहिए. अटार्नी जनरल संसद की कार्रवाई में हिस्सा ले सकते हैं, लेकिन वोट नहीं कर सकते.

सुप्रीम कोर्ट में भारत सरकार के सभी मुकदमों की पैरवी अटॉर्नी जनरल करते हैं. अटॉर्नी जनरल से नीचे आते हैं सॉलीसिटर जनरल जो अटार्नी जनरल का सहयोग करते हैं.

सॉलीसिटर जनरल के सहयोग के लिए 4 एडिशनल सॉलीसिटर जनरल नियु्क्त किए जाते हैं.

फिलहाल भारत सरकार के अटॉर्नी जनरल हैं - के के वेणुगोपाल जिन्होंने हाल ही में मुकुल रोहतगी के बाद पद संभाला है.

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