'तो ये संदेश जाता कि कांग्रेस डूबता सूरज है'

अहमद पटेल

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    • Author, नीरजा चौधरी
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार

हाल के दिनों में या हाल के सालों में इतना ड्रामा भरा चुनाव नहीं देखा.

ये चुनाव प्रधानमंत्री के लिए नहीं था, मुख्यमंत्री के लिए भी नहीं था, संसद के लिए ज़रूर था लेकिन वो भी ऊपरी सदन यानी राज्यसभा के लिए था.

लेकिन दोनों पक्षों के लिए ये प्रतिष्ठा का सवाल बन गया क्योंकि दोनों पक्षों के लिए दांव पर बहुत कुछ लगा था.

मान लीजिए कि जैसे ये चुनाव अमित शाह बनाम अहमद पटेल बन गया था अगर इसमें अगर अहमद पटेल हार गए होते.

काफी हद तक मामला ऐसा बन गया था कि अगर चुनाव आयोग ने दो वोट रद्द ना किए होते तो अहदम पटेल हार ही जाते.

'संदेश जाता कि कांग्रेस डूबता सूरज है'

अहमद पटेल की जीत के बाद जश्न

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अगर अमित शाह एक तरफ से राज्यसभा में आते और साथ-साथ दूसरी तरफ से अहमद पटेल राज्यसभा से बाहर जाते तो उसका अपना ही संदेश था.

अहमद पटेल सोनिया गांधी और कांग्रेस के सिस्टम बीते दस सालों से अधिक समय से संभाल रहे हैं. अगर वो शख्स राज्यसभा से जाते तो कांग्रेस से मनोबल पर असर पड़ता.

देश में संकेत जाता था भाजपा उगता हुआ सूरज और कांग्रेस डूबता हुआ सूरज है. ऐसे में जो लोग राजनीति हैं उनमें होड़ लग जाती कि भाजपा के ख़ेमे में जाओ क्योंकि इसी पार्टी की अब ख़ास भूमिका होगी.

जहां तक गुजरात का सवाल है वहां को कांग्रेस पूरी तरह ख़त्म होने की कग़ार तक पहुंच जाती.

अहमद पटेल

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तीन सप्ताह पहले तक कांग्रेस के पास 57 विधायक थे और अहमद पटेल को आसानी से जीत सकते थे, लेकिन जैसे-जैसे चुनाव नज़दीक आए 15 विधायक पार्टी छोड़ कर चले गए. आगे जा कर पार्टी का क्या होता ये देखने वाली चीज़ होती.

इसीलिए भी कांग्रेस का इस सीट को जीतना ज़रूरी हो गया और भाजपा के लिए इस सीट पर अहमद पटेल को हराना ज़रूरी हो गया.

अहमद पटेल के लिए भी लड़ना बेहद ज़रूरी हो गया था क्योंकि उनकी अपनी पोज़ीशन, कांग्रेस की पोज़ीशन, कांग्रेस अध्यक्ष की पोज़ीशन सब उसमें शामिल हो गया था.

क्या था ज़रूरी- सीट या पटेल?

मोदी

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एक और सवाल ये सामने आता है कि यहां पर राज्यसभा की सीट जीतना ज़रूरी था या फिर अहमद पटेल को राज्यसभा पहुंचाना.

सीट ज़रूरी नहीं थी वो तो कांग्रेस को जीत जानी चाहिए थी. पटेल की अपनी सीट होते हुए उन्होंने एक लड़ाई लड़ी और किसी तरह जीत गए.

ये सिर्फ एक सीट का मामला नहीं था ये अहमद पटेल का मामला था, कांग्रेस पार्टी और सोनिया गांधी का मामला था. ये आगे जा कर कांग्रेस की क्या हैसियत होती, उसका भविष्य क्या होगा उसका मामला था.

हालांकि कांग्रेस के लिए जीत भी काफी मुश्किल भरी रही लेकिन कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में जो संकेत गया है वो ये है कि कहीं ना कहीं लड़ाई बाक़ी है.

आज उन्हें लगता है कि अभी भी हम अगर कमर कस लें तो हम लड़ सकते हैं. ये चीज़ें कार्यकर्ताओं में एक नई उर्जा ला सकती है.

तीन साल में पंजाब को छोड़ कर कहीं से भी कांग्रेस के पास अच्छी ख़बर नहीं मिली है.

सोनिया गांधी और राहुल गांधी

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कांग्रेस में संकट है और ये बात इस पूरे प्रकरण में साफ दिखती है. विधायकों को मैनेज करने का मतलब ये नहीं कि जनता कांग्रेस के साथ है.

एक राज्यसभा की सीट से कुछ नहीं होने वाला है, कांग्रेस को अपने अंदर झांक कर देखना होगा और बड़े पैमाने पर काम करने की ज़रूरत है.

हाल में जयराम रमेश ने कहा कि हमारे अस्तित्व को ले कर संकट है. पहले भी हम चुनाव हारते थे लेकिन फिर उससे रिकवर भी कर लेते थे, लेकिन अब तो बड़े नेता कहते हैं कि अस्तित्व को ले कर संकट है.

कांग्रेस को सोचना होगा कि वो क्यों हारे, क्या कारण हैं हारने के और स्थति में सुधार लाने के लिए उन्हें क्या करना होगा. उन्हें मंथन करना होगा कि उन्हें क्या कड़े सुधार करने चाहिए.

अहमद पटेल की जीत से कुछ मनोबल तो बढ़ेगा लेकिन इससे कुछ ख़ास नहीं बदलने वाला है.

(बीबीसी संवाददाता मानसी दाश से बातचीत पर आधारित.)

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