अहमद पटेल गांधी परिवार के इतने ख़ास क्यों हैं?

अहमद पटेल

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    • Author, अदिति फडनीस
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

''अहमद पटेल की हार सोनिया गांधी की हार है, उनकी जीत सोनिया गांधी की जीत है.'', गुजरात में मंगलवार को हुए राज्यसभा चुनाव में हुए सियासी ड्रामे की ख़बरों में ये चर्चा सुनने को मिल रही थी.

यही दिखाता है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल की अहमियत क्या है.

मंगलवार को गुजरात में राज्यसभा की तीन सीटों के लिए चुनाव हुआ जिसमें कांटे की टक्कर में अहमद पटेल जीत गए.

कांग्रेस चाहे सत्ता में हो या सत्ता से बाहर अहमद पटेल ऐसी शख्सियत हैं जिनका रसूख बना रहा.

सोनिया गांधी, शरपद पवार,अहमद पटेल, अमर सिंह, लालू यादव

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तो अहमद पटेल इतने महत्वपूर्ण क्यों हैं?

अहमद पटेल का ये क़द सिर्फ़ इसलिए नहीं है कि वो तीन बार लोकसभा में कांग्रेस के सांसद रहे और पांच बार कांग्रेस की तरफ़ से राज्यसभा सांसद रह चुके हैं, बल्कि कांग्रेस के सबसे शीर्ष परिवार यानी गांधी परिवार के प्रति उनकी वफ़ादारी से उन्हें ये क़द हासिल हुआ है.

बात 1977 की है जब कांग्रेस की हार के घावों से जूझ रहीं इंदिरा गांधी को अहमद पटेल और उनके साथी सनत मेहता ने अपने चुनाव क्षेत्र भरूच बुलाया, इंदिरा गांधी की वापसी की कहानी की शुरुआत इसी दौरे से हुई थी.

लेकिन अहमद पटेल कांग्रेस की पहली पंक्ति में 1980 और 1984 के बीच आए जब इंदिरा गांधी के बाद ज़िम्मेदारी संभालने के लिए बेटे राजीव गांधी को तैयार किया जा रहा था, तब शर्मीली शख्सियत वाले अहमद पटेल राजीव गांधी के क़रीब आए.

राजीव गांधी और सोनिया गांधी

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उन दिनों को क़रीब से देखने वाले बताते हैं कि जब भी राजीव गांधी गुजरात के दौरे पर आते तब अहमद पटेल उनके विमान तक सेव-भूसा, चूड़ा और मूंगफली लेकर दौड़ जाते, इन गुजराती खानों को गांधी परिवार ख़ास तौर पर पसंद करता था.

इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी 1984 में लोकसभा की 400 सीटों के बहुमत के साथ सत्ता में आए थे. और अहमद पटेल कांग्रेस सांसद होने के अलावा पार्टी की संयुक्त सचिव बनाए गए, उन्हें कुछ समय के लिए संसदीय सचिव और फिर कांग्रेस का महासचिव भी बनाया गया.

नरसिम्हा राव के दौर में किनारे

लेकिन नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने तो गांधी परिवार से अहमद पटेल की नज़दीकी के बावजूद उन्हें किनारे कर दिया गया.

कांग्रेस वर्किंग कमेटी की सदस्यता के अलावा अहमद पटेल को सभी पदों से हटा दिया गया.

मोतीलाल वोरा,अशोक गहलोत,अहमद पटेल, मनमोहन सिंह

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कांग्रेस की बात करें तो उन वर्षों में गांधी परिवार का प्रभाव कम हुआ तो परिवार के वफ़ादार क़रीबियों के लिए भी ये मुश्किलों से भरा समय था.

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राजीव गांधी फ़ाउन्डेशन को बजट से 20 करोड़ रुपए का फंड दिलाया लेकिन सोनिया गांधी ने इसे अस्वीकार कर दिया और अहमद पटेल के कंधों पर राजीव गांधी फ़ाउन्डेशन के लिए फंड इकट्ठा करने की ज़िम्मेदारी आई.

जब पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने मंत्री पद की पेशकश की तो उसे पटेल ने ठुकरा दिया. अहमद पटेल गुजरात से लोकसभा चुनाव भी हार गए और उन्हें सरकारी आवास खाली करने के लिए लगातार नोटिस मिलने लगे.

नरसिम्हा राव

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उनकी मित्र नज़मा हेपतुल्ला ने उनके लिए कई सरकारी आवासों के विकल्प खोजे, लेकिन इसके लिए राव सरकार से मंज़ूरी मिलना ज़रूरी था. अहमद पटेल ने नज़मा हेपतुल्ला का शुक्रिया तो अदा किया लेकिन मदद स्वीकार करने से इनकार कर दिया. पटेल के समर्थक कहते हैं कि अगर वो नजमा हेपतुल्ला की मदद स्वीकार कर लेते तो इसका मतलब होता नरसिम्हा राव से मदद लेना. बताया जाता है कि एक बार उन्होंने तिरस्कार से भरे लहज़े में कहा था, ''उस शख्स से? मदद मांगूं?''

अहमद पटेल बहुत धार्मिक बताए जाते हैं, ये भी एक वजह थी कि वो नरसिम्हा राव के दौर में ख़ुद को अलग-थलग महसूस करते थे.

अहमद पटेल के साथ राज बब्बर

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धार्मिक पहचान से दूर

पटेल बाबरी मस्जिद विध्वंस में नरसिम्हा राव की भूमिका को कभी माफ़ी नहीं कर पाए. लेकिन ये भी देखने वाली बात है कि धार्मिक होने के बावजूद वो दाढ़ी और शेरवानी जैसे धार्मिक चिह्नों से दूर रहते हैं.

जिस तरह कांग्रेस के दमदार नेता कमला पति त्रिपाठी ने कहा था कि बाबरी मस्जिद गिराने वाले का पहला कुदाल हमारे सिर पर गिरेगा. उसी तरह अहमद पटेल भी कांग्रेस की परंपरा के मुताबिक हिंदूवाद समेत सभी धर्मों को समझते हैं और स्वीकार करते हैं.

लेकिन ये भी उतना ही सही है कि कांग्रेस की परंपरा में वो बहुत सधे हुए और प्रेरणादायक नेता नहीं हैं.

उनके भाषण मामूली होते हैं और वो किरश्माई नेता नहीं हैं, वो साधारण आदतों वाले सामान्य व्यक्ति हैं.

अहमद पटेल

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न ही उनके बच्चों, न ही बहुओं और दामाद ने राजनीति में आने की इच्छा दिखाई है. उनके दामाद वकील हैं लेकिन वो इतना साधारण जीवन जीते हैं कि ज़ाहिर नहीं हो पाता कि वो कांग्रेस के एक बड़े नेता के दामाद हैं. बहुत बड़ा हिसाब-किताब उनके हाथ में होता है लेकिन वो इससे अछूते नज़र आते हैं.

कार्यकर्ताओं में गहरी पैठ

कहते हैं कि राजनीति में वो नेता सफल होते हैं जो लोगों को उनके नाम से पहचानते और याद रखते हैं. अहमद पटेल कांग्रेस के उन कार्यकर्ताओं को जानते हैं, जिनके बारे में किसी ने नहीं सुना.

अहमद पटेल सबको जानते हैं, वो पहले से भांप लेते हैं कि जिनसे वो मिल रहे हैं उनकी क्या प्रतिक्रिया होगी और वो क्या कहेंगे, उनकी पृष्ठभूमि के बारे में भी जानकारी रखते हैं. उनकी इस याददाश्त के कारण ही पार्टी में वो एक संस्था की तरह हैं.

उनकी कुछ ख़ास आदतें हैं जैसे रात बहुत देर तक काम करना और वो किसी भी कांग्रेस कार्यकर्ता को फ़ोन कर गहरी नींद से उठा कर कोई भी काम सौंप देते हैं.

वो बहुत योजनाबद्ध तरीके से काम करते हैं, एक मोबाइल फ़ोन हमेशा खाली रखा जाता है जिस पर सिर्फ़ 10 जनपथ से ही फ़ोन आते हैं.

अहमद पटेल कभी भी गप नहीं मारते. न ही भावनाओं में बहते हैं. वो नरेंद्र मोदी को एक राजनीतिक चुनौती के तौर पर देखते हैं और मानते हैं कि एक बेहद लोकप्रिय नेता के खिलाफ़ लगातार बयानबाज़ी करना नुकसानदेह ही साबित हो सकता है. नरेंद्र मोदी की चुनौती का सामना करने के लिए वो एक रणनीति के साथ काम करने की बात कहते हैं.

राहुल गांधी के साथ अहमद पटेल

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जिस बात के लिए अहमद पटेल की आलोचना हो सकती है वो है कांग्रेस में मुस्लिम नेता की ग़ैरमौजूदगी. उनसे कभी ये सवाल पूछा भी नहीं गया है.

सलमान ख़ुर्शीद को कांग्रेस में मुस्लिम नेता की पहचान बनाने के लिए संघर्ष करना पड़ा. मोहसिना किदवई से कहा गया था कि उन्हें राज्यपाल बनाया जाएगा जिसके बाद वो सक्रिय राजनीति से रिटायर हो जाएंगी लेकिन जब वो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मिली तो कुछ और ही संकेत मिला था.

आने वाले पांच साल अहमद पटेल के लिए सक्रिय राजनीति के आख़िरी पांच साल हो सकते हैं. अब कांग्रेस की कमान उपाध्यक्ष राहुल गांधी के हाथ में है जिनकी राजनीति का तरीक़ा अलग है, पटेल इससे कुछ अलग-थलग दिखते हैं.

वो कांग्रेस नेताओं की उस पीढ़ी के हैं जिसका तालमेल कांग्रेस की नई पीढ़ी से आसानी से बैठता नज़र नहीं आता.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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