‘डिजिटल इंडिया’ के सपने से कश्मीर क्यों है दूर?

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- Author, माजिद जहांगीर
- पदनाम, श्रीनगर से बीबीसी हिंदी के लिए
भारत-प्रशासित कश्मीर में भारत सरकार के 'डिजिटल इंडिया' का सपना अभी तक पूरा नहीं हुआ है. आख़िर क्या वजह है कि जम्मू-कश्मीर में भारत सरकार के डिजिटल इंडिया का सपना पूरा होता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है?
जम्मू-कश्मीर में मुख्य रूप से इसके दो बड़े कारण सामने आ रहे हैं. कश्मीर में इंटरनेट पर आए दिन प्रतिबंध और सुस्त रफ़्तार इंटरनेट सेवा.
कश्मीर में आए दिन इंटरनेट पर बैन
कश्मीर में सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर रोक के लिए सरकार इंटरनेट पर प्रतिबंध लगाती है.
लेकिन ऐसा नहीं है कि कश्मीर में इंटरनेट सिर्फ़ सोशल मीडिया के लिए ही इस्तेमाल होता है बल्कि कश्मीर का कारोबारी तबक़े का कामकाज और रोज़गार इंटरनेट से जुड़ा हुआ है.

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कश्मीर में इंटरनेट पर आए दिन सरकारी प्रतिबंध तो अब एक मामूली बात बन गए हैं. कश्मीर में इंटरनेट के ज़रिए रोज़गार पाने के मौके तो सिमट ही रहे हैं.
वहीं, जम्मू-कश्मीर में भारत सरकार के 'डिजिटल इंडिया' का जाल बिछाने का मंसूबा भी बुरी तरह प्रभावित हो रहा है.
इंटरनेट पर प्रतिबंध का असर कश्मीर के हर इलाके पर पड़ता है. बीते कुछ वर्षों में यहां भारत सरकार की ओर से डिजिटल इंडिया के फैलाव के लिए भी कम्युनिटी सेवा सेंटर या सीएससी सेवा उपलब्ध करने की शुरुआत की गई थी.
लेकिन इंटरनेट की सुविधा न होने के कारण इन सेंटर्स का भविष्य भी खतरे में पड़ गया है.
कैशलेस मतलब?
सीएससी चलाने वाले अधिकारियों का कहना है कि उनका सब काम इंटरनेट के ज़रिए होता है. सीएससी के अभी तक कश्मीर घाटी में 2800 सेंटर्स रजिस्टर्ड हैं, उनमें 2000 सेंटर्स ही काम कर पा रहे हैं.

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इसका बड़ा कारण यह है कि कई ग्रामीण इलाकों में अभी तक या तो इंटरनेट काम ही नहीं कर पाता है या फिर 2जी स्पीड पर इंटरनेट चल रहा है.
आए दिन इंटरनेट पर सरकारी प्रतिबंध से यह हो रहा है कि लोग अभी तक इस बात से बेख़बर हैं कि डिजिटल होता क्या है.
बीते साल जब कश्मीर के एक गांव को सरकार ने पहला कैशलेस विलेज क़रार दिया तो वहां के लोगों को मालूम ही नहीं था कि कैशलेस होता क्या है?
उस गांव में जब मैं खुद भी गया था तो वे यह बात सुनकर हैरान हो गए थे कि उनका गांव कैशलेस क़रार दिया गया है.
उस गांव में इंटरनेट चलता ही नहीं है. एटीएम और बैंक कई किलोमीटर दूर हैं. यह हालत एक साल के बाद भी बदली नहीं है.
करगिल और लेह में 2जी की रफ़्तार से इंटरनेट

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जम्मू-कश्मीर में सीएससी की प्रोजेक्ट हेड ज़ीनत-उन-निशा ने एक बातचीत में बताया कि जब हम करगिल और लेह की बात करते हैं तो वहां इंटरनेट 2जी रफ़्तार से चलता है.
उनका यह भी कहना था कि श्रीनगर में 4जी तो है, लेकिन वह भी तेज़ रफ़्तार से चलता नहीं है. उन्होंने कहा कि जब लोग हमारे सेंटर्स पर आते हैं तो हमें गलियां खानी पड़ती हैं क्योंकि इंटरनेट जिस रफ़्तार से चलता है, उससे किसी का भी काम नहीं हो पाता है.
उन्होंने कहा, "हमारा जो प्रोजेक्ट है वह डिजिटल इंडिया बनाने का है, लेकिन पूरे भारत में जम्मू-कश्मीर ऐसा एक राज्य है जहां यह सपना पूरा नहीं हो पा रहा है. हमारा लक्ष्य यह है कि घर-घर जाकर एक-एक व्यक्ति को हम मोबाइल के ज़रिए ऑनलाइन लेन-देन का तरीका सिखाएं, लेकिन जब इंटरनेट ही नहीं है तो हम कैसे सिखा सकते हैं? अगर देखा जाए तो यहां कुछ भी डिजिटल नहीं है. भारत सरकार ने सीएससी को एक लक्ष्य दिया है जो हमें समय पर पूरा करना है, लेकिन जब इंटरनेट पर आए दिन प्रतिबंध लगाया जाता है तो लक्ष्य पूरा कैसे हो सकता है."
हथियारबंद आंदोलन के समय नहीं था इंटरनेट

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सीएससी का बुनयादी काम डिजिटल सेवा उपलब्ध कराना है. सीएससी का हर एक काम इंटरनेट के ज़रिए होता है.
कश्मीर में जब लोग सीएससी का नाम सुनते हैं तो वह उसकी तरफ़ आकर्षित हो जाते हैं, लेकिन नज़दीक आने पर वे मायूस हो जाते हैं.
आम लोगों में यह राय है कि इंटरनेट पर प्रतिबंध से कश्मीर के हालात ठीक कैसे हो सकते हैं?
जब नब्बे के दशक में कश्मीर में हथियारबंद आंदोलन शुरू हुआ तो उस समय इंटरनेट का वजूद नहीं था. इसके बावजूद कश्मीर में चरमपंथ के बढ़ते क़दमों को कोई रोक नहीं पाया था.
भारत सरकार के लिए यह एक बड़ी चुनौती है कि कश्मीर में डिजिटल इंडिया की मज़बूत इमारत कैसे खड़ी की जा सकती है.
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