कश्मीर डायरी: इंटरनेट के बिना कश्मीरियों का जीवन

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- Author, पारुल अबरोल
- पदनाम, पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
आठ जुलाई, 2016 को में शाम गहराने लगी थी, मैं फेसबुक पर समय जाया कर रही थी, तभी मैंने बुरहान वानी की मौत से जुड़ी एक पोस्ट देखी.
बुरहान कश्मीरी चरमपंथी संगठन हिज़बुल मुजाहिदीन का कमांडर था. पोस्ट देखते ही मैं नर्वस हो गई. मुझे लगा कि स्थिति बिगड़ेगी और किसी भी पल इंटरनेट और फ़ोन कनेक्शन बंद हो जाएंगे.
मैंने अपने माता पिता और नज़दीकी दोस्तों को फ़ोन करके बताया कि अगर जल्दी बात नहीं हो तो घबराने की ज़रूरत नहीं. मैं जब तक सोने गई, इंटरनेट ने काम करना बंद कर दिया था.
सुबह में, मैना की आवाज़ से नींद खुली. कुछ ही दिन पहले मैंने इस अपार्टमेंट में रहना शुरू किया था. मैं श्रीनगर में नई दिल्ली से रहने आई थी, एक किताब के लिए रिसर्च के इरादे से.
यह मैना मेरे बेडरूम की खिड़की पर आवाज़ देकर मुझे जगाती थी, जब मैं बाहर देखती तो वो मुड़कर उड़ जाती.

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लेकिन उस सुबह ऐसा नहीं हुआ. वो खिड़की पर लगातार आवाज़ देती रही, मानो सुनिश्चित करना चाहती हो कि मैं हूं ना. जब मैंने बाहर देखा तो वो हर दिन की तरह पीछे मुड़कर उड़ नहीं गई बल्कि वे मेरे चेहरे को देखती रही, जैसे उसे कोई ख़बर देनी हो.
लोगों पर दबाव
तो क्या मुझे एक पक्षी से बातचीत शुरू कर देनी चाहिए? संकट के समय में जब आपको सूचनाएं नहीं मिलती हैं तो आप इसी तरह से सोचने लगते हैं. इंटरनेट ही नहीं बंद हुआ था, 16 से 20 जुलाई, 2016 के बीच घाटी में कोई अख़बार भी नहीं आया,
विपक्ष के जवाब मांगने पर राज्य की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने कहा कि ये उनकी सरकार का काम नहीं है, पुलिस अधीक्षक ने ये फ़ैसला लिया था. अगर कश्मीर में एक चुनी हुई सरकार है तो फिर पुलिस कैसे प्रशासन को अपने हाथ में ले सकती है?
मैं पिछले साल जून में श्रीनगर पहुंची थी तब मैंने मेडिसां सां फ़्रतिए (एमएसएफ) के सर्वे पर आधारित एक रिपोर्ट पढ़ी थी. इस रिपोर्ट के मुताबिक कश्मीर में प्रत्येक दो में से एक वयस्क मानसिक दबाव में हैं.
स्थानीय राजनीतिक कार्टूनिस्ट मीर सुहैल ने एक कार्टून भी बनाया था कि लोग अपने सिर पर टैंक बांधे टहल रहे हैं. किसी संघर्ष क्षेत्र की ये मानवीय त्रासदी है.
14 से 27 जुलाई, 2016 के बीच सभी फ़ोन सेवा बाधित रही, केवल सरकारी अधिकारी और राजनेताओं के बीएसएनएल नंबर काम कर रहे थे.
इसके बाद, 14 से 20 अगस्त, के बीच घाटी के फ़ोन फिर से जाम रहे. फिर 12 सितंबर को पड़ने वाली ईद से एक दिन पहले फ़ोन सर्विस बाधित हो गई. 19 सितंबर की देर रात तक ये बाधित रही. इतना ही नहीं, 27 जुलाई से प्री पेड कनेक्शन पर केवल फ़ोन आ सकते थे, इन्हें बाहर कॉल करने की इजाजत 15 अक्टूबर के बाद मिली.
पूरा प्रदेश किसी कैदखाने में तब्दील हो गया था. क़र्फ्यू लगने के चार महीने बाद जब मैं ने श्रीनगर छोड़ा तब ये क़र्फ्यू कब हटेगा, इस बारे में कोई चर्चा नहीं हो रही थी. घाटी में 133 दिनों के बाद ही इंटरनेट सेवा बहाल हो पाई.

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इस दौरान आप अपने चाहने वाले को फ़ोन नहीं कर सकते, उनकी आवाज़ नहीं सुन सकते थे और आपके पड़ोस के शहर में क्या हो रहा है, इसकी भी आपको कोई जानकारी नहीं, इस दौर में ये सामान्य स्थिति तो नहीं थी.
कई छात्र अपने लिए नामांकन का फॉर्म नहीं भर पाए, युवाओं को इंटरव्यू कॉल्स नहीं मिले, कई नौकरियों के लिए आवेदन नहीं कर पाए.
मैं इंटरनेट के लिए अपने दोस्त के एक समाचार पत्र स्थित दफ़्तर में जाती थी. क़र्फ्यू की स्थिति के चलते वहां बार बार जाना भी संभव नहीं था, तो मेरे काम अटक गए. ये सब इसलिए किया जा रहा था ताकि लोग जानकारियां शेयर नहीं कर सकें.
जीवन पर पड़ता असर
इंटरनेट पर अंकुश के ज़रिए सरकार ने नैरेटिव्स पर भी नियंत्रण रखा. चरमपंथी संगठन अपनी सामाग्री के प्रचार प्रसार के लिए इसका इस्तेमाल कर सकते थे.
समाचार पत्रों और इंटरनेट पर अंकुश के बावजूद, घाटी के लोगों को ये मालूम था कि उनकी गलियों में क्या हो रहा है. और लोग एक दूसरे के साथ पाबंदी वाली सामग्री शेयर करने के तरीके भी ढूंढ रहे थे.
श्रीनगर के तेंगपुरा फ्लाईओवर पर दिन के कुछ घंटे तक मुफ़्त में इंटरनेट उपलब्ध होता था. इस फ्लाईओवर पर कई लड़के और युवा घंटों खड़े होकर मैटर डाउनलोड किया करते थे. बाद में इसे वे अपने परिवार, पड़ोसी और दोस्तों के साथ शेयर किया करते थे.
जब तक राज्य में क़र्फ्यू रहा, तब तक राज्य में केवल बीएसएनएल ब्रॉडबैंड से इंटरनेट उपलब्ध था. कुछ लोग अपने अकाउंट से दूसरों की मदद भी करते थे. लोगों ने बुरहान वानी की बहन के गाए गीत की रिकॉर्डिंग भी शेयर की.

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इन दिनों आंशिक पाबंदी लगी हुई है, सोशल नेटवर्किंग साइट्स और 3जी ब्लॉक है, लोग ऐसे में वीपीएन को डाउनलोड कर रहे हैं. वीपीएन यानी वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क, को पब्लिक नेटवर्क बनाया जा सकता है, इसके जरिए कई लोग फेसबुक, यूट्यूब, व्हाट्सऐप जैसी सुविधाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं.
हालांकि अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते भारत को जल्दी ही कश्मीर में इंटरनेट की सुविधा को बहाल करना पड़ सकता है. कुछ ही दिन पहले 11 मई, 2017 को मानवाधिकार को लेकर यूएन हाई कमिश्नर (ओएचसीएचआर), अभिव्यक्ति की आजादी के लिए काम कर रहे संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत डेविड काय और मानवाधिकार की स्थिति पर यूएन के विशेष दूत माइकल फॉर्स्ट ने भारत सरकार को क्षेत्र में लोकतंत्र और राजनीतिक संघर्ष के दौरान लोगों की अभिव्यक्ति की आज़ादी के सुरक्षा करने के लिए कहा है.
भारत ने अब तक कोई जवाब नहीं दिया है. शायद दे भी नहीं. लेकिन तब तक कश्मीरी लोगों की मुश्किलें बनी रहेंगी.
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