कश्मीर डायरी: हत्याओं के बीच ईद का त्यौहार

- Author, पारुल अबरोल
- पदनाम, पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
भारत प्रशासित कश्मीर में ईद के अगले ही दिन पिछले साल आठ जुलाई को हिजबुल मुजाहिदीन का कमांडर बुरहान वानी मारा गया था. इसके बाद कश्मीर घाटी में ईद की खुशी कम हो गई थी.
उत्तर भारत में रहते हुए मैंने बचपन से ही सिर्फ़ एक दिन की ही ईद मनाई थी लेकिन कश्मीरी एक हफ़्ते तक ईद की खुशी मनाते हैं. वो इसे दूसरी ईद, तीसरी ईद और ऐसे ही एक हफ़्ते तक मनाते हैं.
मेरा एक कश्मीरी दोस्त इसे कुछ इस तरह से बयां करता है, "हम कश्मीरी काम करना कम और जश्न मनाना ज्यादा पसंद करते हैं."
तो भी मैंने नोटिस किया कि महीनों के बाद भी हालात बहुत बेहतर नहीं हुए. महीनों बाद यह और बदतर होता गया.
मैं अगस्त के आख़िरी दिनों में बहुत खुश थी कि अब बकरीद आने वाला इसलिए हालात अब कुछ बेहतर होंगे. पिछले साल 13 सितंबर को बकरीद था.
भारत में रमजान के महीने के बाद होने वाले ईद को लेकर बड़ा उत्साह रहता है. उसे बड़ी ईद कहते हैं लेकिन कश्मीर में उल्टा है. वहां बकरीद सबसे बड़ा त्यौहार है.
मुझे पता चला कि हालात और बिगड़ सकते हैं. और ऐसा हुआ भी.

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हाल के कई सालों में पहली बार श्रीनगर के लोगों को हज़रतबल शरीन, जामा मस्जिद, खांकांह-ए-मौला, दस्तगीर साहिब खनयार, मखदूम साहिब रैनावारी और दूसरे ईदगाहों में ईद की नमाज़ पढ़ने से रोका गया.
ये वो जगहें हैं जहां पड़ोसी, रिश्तेदार और दोस्त सभी एक साथ इकट्ठा होते हैं और एक-दूसरे का हाल-समाचार लेते हैं.
घाटी के लोग काफी धार्मिक प्रवृति के हैं हालांकि वे भारत में जो कश्मीरियों की 'कट्टर' छवि बनी हुई है, उससे अलग है.
आप कहां इबादत कर रहे हैं और किसके साथ कर रहे हैं, ये जरूर मायने रखता है उनके लिए. लेकिन इस पर ही 'पाबंदी' लगा दी गई थी.

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राज्य में 'कानून-व्यवस्था' बनाए रखने के नाम राज्य सरकार और पुलिस की ओर से जो कदम उठाए गए उसने स्थानीय लोगों को और उकसाया ही.
उनकी आस्था को बीच में लाने से वो और आक्रोशित हुए.
क़ानून-व्यवस्था को कायम रखने के लिए शहर में कर्फ्यू लगाए गए थे. लोग त्यौहार मनाने के लिए जरूरी चीजों की खरीददारी करने भी बाहर नहीं जा सकते थे.
बकरीद के एक दिन पहले 12 सितंबर को लोगों के फोन जैम कर दिए गए जो 19 सितंबर की रात तक जैम रहें.
कोई किसी को त्यौहारों पर मुबारकबाद ना दे सका.

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आम तौर पर परंपरा है कि कश्मीर के लगभग सभी घर जो सामर्थ्य रखते हैं, वो कोई एक जानवर (भेड़, बकरा, भैंस, गाय) की कुर्बानी करते हैं और इसे अपने रिश्तेदारों, दोस्तों और पड़ोसियों के बीच बांटते हैं.
पूरा शहर सड़को पर निकला होता है. वो एक-दूसरे के घरों पर जाते हैं. तीन दिनों तक देर रात तक सड़कों पर जाम लगा रहता है.
लेकिन पिछले साल बकरीद के दौरान व्यवसाय के ठप पड़ने और जानवरों की बिक्री कम होने को लेकर खबरें छाई रहीं.
बहुत सारे लोग इसलिए कुर्बानी नहीं दे पाए क्योंकि पिछले कुछ महीनों से लोग काम पर नहीं निकल पाए थे और इसकी वजह से उनके पास पैसे नहीं थे.

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पर्यटन के व्यवसाय से लेकर दूसरे काम-धंधों में लगे लोग भी बुरी तरह प्रभावित हुए थे. प्राइवेट नौकरियों में लगे हुए लोगों को भी तनख्वाह नहीं मिली थी.
हालांकि बहुत सारे लोग ऐसे ही भी थे जिन्होंने जानबूझकर कश्मीर घाटी के मौजूदा माहौल में कुर्बानी देने से परहेज किया.
कई महीनों तक हिंसा के माहौल ने बकरीद तक 75 लोगों की जान ले ली थी.
पुराने मोहल्लों में छोटे-छोटे बच्चों को पलास्टिक या बेंत की टोकड़ियों में मीट लेकर पड़ोस में जाते हुए देखा जा सकता था. हालांकि सबसे दुखद जो बात हुई इस बकरीद में वो यह थी कि दक्षिण कश्मीर में भारतीय फ़ौज ने दो नौजवानों को मार दिया था. इंसानों की कुर्बानी सबसे बदतर होती है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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