ऊना कांड का एक सालः दलितों को मिला पाटीदारों, ओबीसी का समर्थन

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- Author, विजय सिंह परमार
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
ऊना में गुजरात सरकार के ख़िलाफ़ अपनी बड़ी लड़ाई में दलितों को पाटीदारों और ओबीसी का समर्थन मिल गया है. यह लड़ाई कागज पर आवंटित ज़मीन पर कब्जे को लेकर है.
पिछले साल एक गाय के शव को उठाने के बाद चार दलितों की पिटाई कर दी गई थी. उस घटना की याद में, दलित संगठन के नेता जिग्नेश मेवाणी ने मेहसाणा में 12 जुलाई को शुरू हुए आज़ादी कूच का नेतृत्व किया.
यात्रा के अंतिम दिन बनासकांठा में मेवाणी ने दलितों से अपने अधिकारों के लिए पुरजोर लड़ाई लड़ने को कहा.
बीबीसी से बात करते हुए इस दलित नेता ने कहा, "हमने सरकार को आवंटित ज़मीन के अधिकार दलितों और ओबीसी को लौटाने के लिए 6 दिसंबर तक की मोहलत दी है. इसके बाद हम जबरन कब्जा ले लेंगे."

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बदलते समीकरण
पिछले दो सालों में, गुजरात ने पाटीदारों, दलितों और ओबीसी के तीन समानांतर आंदोलन देखे हैं. अब ऐसा लगने लगा है कि इन आंदोलनों के नेता हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर एक दूसरे का समर्थन करने के लिए एक आम आधार की तलाश कर रहे हैं.
'आज़ादी कूच' को रवाना करने के लिए मेवाणी और अन्य दलित नेताओं के साथ पाटीदार नेता और हार्दिक के सहयोगी रेशमा पटेल भी मौजूद थे.
मेवाणी ने कहा, "हम पाटीदार और ओबीसी नेताओं के साथ हमारे मतभेदों को जानते हैं लेकिन हमारे पास एक समान एजेंडा है कि ये लड़ाई सरकार के ख़िलाफ़ या किसानों की आत्महत्या के विरोध में है."
मेवाणी कहते हैं, "राज्य सरकार भी 'आज़ादी कूच' से सहमी हुई है क्योंकि दलित, पाटीदार, आदिवासी, ओबीसी एकजुट हो रहे हैं. इस यात्रा के दौरान हमें रोकने के लिए हरसंभव कोशिश की गई."
मेहसाणा में यात्रा के पहले दिन गुजरात पुलिस ने कन्हैया कुमार और अन्य कार्यकर्ताओं समेत 100 से अधिक लोगों को हिरासत में रखा.
इससे पहले, ओबीसी, पाटीदार, दलित युवा नेताओं ने वाइब्रेंट गुजरात शिखर सम्मेलन से पहले 'बेरोजगारी मार्च' आयोजित करने के लिए जनवरी में हाथ मिलाया था.
हार्दिक के सहयोगी रेशमा पटेल ने कहा, "अब समय आ गया है कि हम बीजेपी सरकार के ख़िलाफ़ लड़ाई में एकजुट हो जाएं."
रैली में भाग लेने वाले किसान नेता सागर रबाड़ी कहते हैं, "दलित अब आर्थिक अन्याय, किसानों के शोषण और जमीन हथियाने की बात कर रहे हैं. इन मसलों पर पाटीदार, ओबीसी और दलित सरकार के ख़िलाफ़ लड़ाई में एकजुट रहेंगे."

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बीजेपी ने लगाया साजिश का आरोप
गुजरात में विधानसभा चुनाव इसी साल होने हैं, तो क्या दलितों, ओबीसी और पाटीदारों का एकजुट होना बीजेपी को नुकसान पहुंचा सकता है?
गुजरात बीजेपी के प्रवक्ता भारत पंड्या इसे साजिश बताते हैं, "ठाकोर, पटेल और मेवाणी का एक मंच पर जुटना खुद में विरोधाभास है. पटेल और जिग्नेश मेवाणी सामाजिक कारणों के लिए काम नहीं कर रहे बल्कि उनका एकमात्र एजेंडा बीजेपी की छवि को ख़राब करना है."
बीबीसी से बातचीत में पंड्या ने कहा, "उनके विरोध करने और उनकी गतिविधियों से बीजेपी की चुनावी संभावनाएं किसी भी तरह प्रभावित नहीं होंगी."
हालांकि, राजनीतिक विश्लेशकों का कहना है कि दलित आंदोलनों ने अपनी ऊर्जा खो दी है और सरकार के ख़िलाफ़ लड़ाई में अन्य समुदायों को साथ मिलाने की ये क़वायद एक लंबी चलने वाली लड़ाई की तरह है.
दलित अधिकार आंदोलन के समीक्षक चंदू माहेरिया कहते हैं, ''इस दलित आंदोलन का गुजरात की चुनावी राजनीति पर बहुत कम असर होगा. राष्ट्रीय नेता ऊना के बाद के विरोध प्रदर्शन में शामिल हो रहे हैं लेकिन स्थानीय दलितों का इससे दूर रहना निर्णायक साबित होगा."

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...तो ऊंची जाति पर निर्भरता कम होगी
गुजरात हाई कोर्ट में दलित नेता जिग्नेश मेवाणी की एक जनहित याचिका के अनुसार, जिन 17,000 दलित परिवारों को ज़मीन आवंटित की गई थी उननें से 80 फ़ीसदी को ख़ेती के लिए ज़मीन कभी मिली ही नहीं.
दलित नेता दल्पेत भाटिया कहते हैं, "बनासकांठा में 3,000 हेक्टेयर से अधिक ज़मीन दलितों को आवंटित की गई थी लेकिन वो उस पर कभी कब्ज़ा नहीं कर सके. 'आज़ादी कूच' के अंतिम दिन हमने 1960 में लावार गांव में चार परिवारों को आवंटित 10 एकड़ जमीन पर जबरन कब्ज़ा करने की योजना बनाई थी. लेकिन इससे एक दिन पहले ही राज्य सरकार हरकत में आई और दलित परिवारों को ज़मीन पर अधिकार दे दिया गया."
मेवाणी कहते हैं कि सरकार ने गुजरात कृषि भूमि सीलिंग अधिनियम के तहत चार दशक पहले करीब 37,000 भूमिहीन परिवारों को 1.63 लाख एकड़ ज़मीन आवंटित किया था, इनमें 17,000 दलित परिवार भी शामिल हैं.
मेवाणी ने कहा, "ग्रामीण भारत में ज़मीन का होना ताक़त का प्रतीक है. दलितों को ज़मीन मिली तो ऊंची जाति पर उनकी निर्भरता कम होगी. हमने सरकार को आवंटित ज़मीन के अधिकार दलितों और ओबीसी को लौटाने के लिए 6 दिसंबर तक की मोहलत दी है. इसके बाद हम इस पर जबरन कब्जा करेंगे."
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