नज़रिया: '...तो फिर ख़ुदा ही मुसलमानों की ख़ैर करे!'

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- Author, अपूर्वानंद
- पदनाम, राजनीतिक विश्लेषक, बीबीसी हिंदी के लिए
जिसे साम्प्रदायिक हिंसा कहते हैं, अब बंगाल उसकी चपेट में आ रहा है. दो रोज़ से 24 परगना के बशीरहाट में किसी एक आपत्तिजनक फ़ेसबुक पोस्ट से क्रुद्ध मुसलमान उपद्रव और हिंसा में लिप्त हैं.
यह हिंसा इतनी ज़्यादा है कि मुख्यमंत्री ने उस इलाक़े में इन्टरनेट बंद करने का आदेश दिया. स्कूल और दुकानें बंद हैं और सुरक्षा बल लगातार गश्त लगा रहे हैं. हिंसा में दुकानों को जलाया और बर्बाद किया गया है जो ज़्यादातर हिन्दुओं की हैं.
यह कहना भी मुश्किल है कि इस हिंसा को मुसलमानों और हिन्दुओं के बीच दंगा कहा जाए या अपने पवित्र स्थल या धर्म को तथाकथित रूप से अपमानित करती हुई फ़ेसबुक पोस्ट से नाराज़ मुसलमानों की हिंसा मात्र!
अब तक की ख़बरों से मालूम होता है कि उपद्रवी मुसलमानों की भीड़ ही हमलावर रही है और सिवाय फ़ेसबुक पोस्ट करने वाले के, हिंदू इसमें शरीक नहीं हुए हैं.

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मुसलमानों की भावना
पहले मांग यह थी कि फ़ेसबुक पोस्ट जारी करने वाले को गिरफ़्तार किया जाए. वह 11वीं कक्षा का एक किशोर निकला. ज़ाहिर है, पोस्ट कहीं और से चली होगी और उसने सिर्फ़ उसे आगे बढ़ा दिया होगा.
अब तक किसी को यह नहीं मालूम कि उसमें ठीक-ठीक क्या है, लेकिन जाननेवाले यह बताते हैं कि वह मुसलमानों को चिढ़ाने के ख़्याल से ही बनाई गई लगती है.
लड़का गिरफ़्तार हो गया. पुलिस ने चुस्ती से काम लिया. फिर भी हिंसा हुई. यह भी कहा जा रहा है कि गिरफ़्तारी से मुसलमानों की आहत भावना संतुष्ट नहीं हुई है. तो वे चाहते क्या थे? क्या उस लड़के को उसी वक़्त सज़ा दी जानी चाहिए थी और क्या वह सज़ा भीड़ देती?
यह कहा जा रहा है कि जब फ़ेसबुक पोस्ट की ख़बर फैलने से ग़ुस्सा आम हो गया तो क़ायदे से पुलिस को यह सार्वजनिक तौर पर बताना चाहिए था कि दोषी की गिरफ़्तारी हो गई है.
लेकिन क्या उसके ऐसा करने से हिंसा न होती? दूसरे कि क्या अब हर चीज़ सड़क पर निबटाई जाएगी? क्या पुलिस और प्रशासन अपना हर क़दम जनता को रिपोर्ट करेंगे और उनकी मंज़ूरी के बाद ही वह क़दम सही माना जाएगा?

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बशीरहाट के मुसलमान
क्या बशीरहाट के मुसलमान राजस्थान, झारखंड, उत्तर प्रदेश, जम्मू के हिन्दुओं की तरह तुरत-फुरत अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ इन्साफ़ करना चाहते हैं जो उन्हें पीट-पीट कर मार डालते हैं जो उनके मुताबिक़ अपराध कर रहे हैं?
क्या पुलिस को यह मौक़ा नहीं मिलना चाहिए कि वह पता करे कि मुसलमानों को चिढ़ाने की यह कोशिश शुरू कहाँ से हुई?
जिसकी भी यह मंशा थी, वह कहीं बैठा मुस्करा रहा होगा कि उसकी तरकीब कामयाब हुई और मुसलमान आख़िर उसके फंदे में आ ही गए! यह एक तरह से मालदा की घटना का दुहराव ही हुआ.
मालदा में भी इसी तरह पैग़म्बर मोहम्मद और मज़हब के अपमान से ग़ुस्साए मुसलमानों ने सरकारी संपत्ति को भारी नुक़सान पहुँचाया था.
यह नोट करने की बात है कि उनका हमला हिन्दुओं पर न था और न हिन्दुओं को वहां कोई नुक़सान पहुँचा था. लेकिन सड़क पर गाड़ियों को आग लगाते मुसलमानों की तस्वीरें ख़ूब घूमती रहीं और स्थापित यही हुआ कि मुसलमानों को मौक़ा दो और देखो!
सिंगूर और नंदीग्राम
बशीरहाट में मुसलमान बहुसंख्या में हैं. बंगाल में ही वे दूसरे राज्यों के मुक़ाबले ज़्यादा तादाद में हैं. राजनीतिक दलों में भी वे दिखलाई पड़ते हैं.
स्थानीय स्तर पर भी वे दब कर नहीं रहते. इसलिए स्वाभाविक है कि ग़रीबी और आम ख़ुशहाली में हिस्सा कम होने के बावजूद वे ख़ुद को अभिव्यक्त करने में उस तरह संकुचित नहीं रहते जैसे दूसरे राज्यों में. यह याद कर लेना चाहिए कि वाम मोर्चे की सरकार ने जब सिंगूर और नंदीग्राम में क़हर ढाया तो राज्य की हिंसा का मुक़ाबला करने में मुसलमान दूसरे किसानों के साथ थे और मारे भी गए.
यह भी उतना ही सच है कि बंगाल में साम्प्रदायिक हिंसक भावना सतह के नीचे ख़ूब रही है. वाम मोर्चे के वक़्त ऊपरी हिंसा भर न दिखी और कभी भीतर के इस मवाद को बाहर निकालने की कोई सामाजिक या राजनीतिक कार्रवाई हुई नहीं.

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धूलागढ़ की हिंसा
यह भी दिलचस्प है कि बंगाल के सबसे प्रभावशाली समाचार समूह का एक अघोषित निर्णय है कि इस प्रकार की हिंसा को वह ख़बर नहीं बनने देगा.
यह शुतुरमुर्गी प्रवृत्ति समाज को देखने नहीं देती कि यह बीमारी उसके भीतर मौजूद है. सही रिपोर्टिंग के अभाव में अफ़वाहें कारगर हो जाती हैं.
धूलागढ़ की हिंसा की ख़बर को भी इसी तरह दबाने की कोशिश हुई थी. हालाँकि इस बार ख़बरें बाहर आ रही हैं.
बशीरहाट की हिंसा निहायत ही अहमक़ाना है. जायज़ तो उसे किसी भी तरह नहीं ठहराया जा सकता. अगर मुसलमानों को यह नहीं मालूम कि फ़ेसबुक जैसी चीज़ स्थानीय नहीं और जिसके ख़िलाफ़ वे अपना ग़ुस्सा अपनी ही संपत्ति को बर्बाद करके कर रहे हैं, हो सकता है वह किसी और मुल्क में या राज्य से चली हो तो उनकी अक़्ल पर तरस ही खाया जा सकता है!
फिर उनकी मूर्खता क्या इंसाफ़ करने में किसी की मदद कर रही है?
फ़ेसबुक पोस्ट
चौबीस परगना के इस हिस्से की हिंसा पर केंद्र में सत्तारूढ़ और बंगाल को हथियाने को बेचैन भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने बिना किसी आधार के बयान जारी कर दिया कि हिन्दू औरतों के बलात्कार की ख़बरें आ रही हैं.
यही नहीं, उन्होंने बिना वहाँ गए यह भी बता दिया कि कितने मुसलमान हिंसा कर रहे थे. यह भी ध्यान देने की बात है कि मुसलमानों की हिंसा की तो उन्होंने बात की, लेकिन एक बार भी उस फेसबुक पोस्ट की निंदा नहीं की.
ममता बनर्जी ने सख़्त तरीक़े से मुसलमानों को भी चेतावनी दी है कि उनकी हिंसक हरकत को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. यह अच्छा है क्योंकि भाजपा उन्हें मुस्लिम परस्त साबित करने पर लगी है.

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ममता की लोकप्रियता
भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जी तोड़ मेहनत कर रहे हैं कि केरल, बंगाल और त्रिपुरा उनके क़ब्ज़े में आ जाए.
पिछले दिनों उनकी बढ़ती आक्रामकता और वहां की सरकारों को बार-बार मुस्लिमपरस्त कहकर बदनाम करने के उनके प्रचार से इस साज़िश को समझा जा सकता है.
लेकिन ममता बनर्जी को अपनी लोकप्रियता की परीक्षा देनी होगी.
उन्हें मुसलमानों से खुलकर बात करनी होगी और भारत के हर मुसलमान को भी यह समझना होगा कि उसे किसी भी मुद्दे पर अहिंसक प्रतिरोध के अलावा किसी दूसरे उकसावे से सावधान रहना है. मुद्दे ढेर सारे हैं.
सबसे बड़ी बात, हिन्दुस्तान में अभी मुसलमानों का शहरी हक़ ख़तरे में है. उसपर विरोध ज़ाहिर करने की जगह अगर एक फ़ेसबुक पोस्ट पर वे गाड़ियां और दुकानें जलाने लगते हैं तो फिर ख़ुदा ही उनकी ख़ैर करे!
यह वक़्त भारत के प्रत्येक मुसलमान के अपने शहरीयत के दावे पर ज़ोर देने का है न कि ख़ुद को दीन का मुहाफ़िज़ साबित करने का! न तो इस्लाम को उनकी हिफ़ाज़त की ज़रूरत है, न पैग़बर को. उसका वक़ार पहले से साबित है. लेकिन मुसलमानों को अपनी दुनियावी ज़िंदगी में इज़्ज़त और हक़ से रहने के लिए ज़रूर जद्दोजहद करने की ज़रूरत है.
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