ममता के राज में 'रामधनु' बदलकर हुआ 'रंगधनु'

सातवीं कक्षा की किताब

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    • Author, पीएम तिवारी
    • पदनाम, कोलकाता से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

बांग्ला में इंद्रधनुष को 'रामधनु' यानी राम का धनुष कहा जाता है. लेकिन पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार ने अब इसका नाम 'रामधनु' से बदल कर 'रंगधनु' यानी रंगों का धनुष कर दिया है.

यह फ़ैसला वैसे तो लगभग तीन महीने पुराना है, लेकिन सातवीं कक्षा में ताज़ा सत्र से इसकी पढ़ाई शुरू हुई है. इस कक्षा में 'परिवेश (पर्यावरण) और विज्ञान' शीर्षक पुस्तक में रामधनु को जहां इंद्रधनुष लिखा गया है, वहीं इसके 'आकाशी' रंग को 'आसमानी' लिखा गया है.

आलोचकों का सवाल है कि आकाशी (बांग्ला) को उर्दू के आसमानी शब्द से बदलने का क्या तुक है?

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पश्चिम बंगाल उच्च शिक्षा परिषद ने इसे रूटीन अपडेट बताते हुए जहां सरकार के फ़ैसले का बचाव किया है, वहीं आलोचक इसे सरकार की तुष्टिकरण की नीति का नतीजा मान रहे हैं.

यहां इस बात का जिक्र प्रासंगिक है कि पड़ोसी बांग्लादेश में इंद्रधनुष को रंगधनु और आकाशी (हिंदी में आसमानी) को आसमानी कहा जाता है. बांग्ला भाषा के जानकारों का दावा है कि बांग्ला शब्दकोश में रंगधनु नामक कोई शब्द ही नहीं है. इससे सरकार के फ़ैसले पर सवाल उठने लगे हैं.

ममता बनर्जी

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कुछ लोग इसे बीजेपी के साथ तृणमूल कांग्रेस की लगातार बढ़ती कड़वाहट और राम शब्द के उसके (बीजेपी) साथ जुड़े होने को भी इस बदलाव की वजह मानते हैं.

भाषाविद् राकेश बनर्जी कहते हैं, "बांग्ला शब्दकोश में रंगधनु नामक कोई शब्द नहीं है. महज राजनीतिक मकसद से सही शब्द को हटा कर उसकी जगह ग़लत शब्द का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए. इससे भावी पीढ़ियां ग़लत शब्द पढ़ेंगी."

एक दूसरे भाषाविद् साधन दास कहते हैं, 'बांग्ला भाषा इतनी ग़रीब नहीं है कि मानकीकरण के नाम पर उसे बांग्लादेश से शब्द उधार लेना पड़े.'

दिलीप घोष

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पश्चिम बंगाल स्कूल पाठ्यक्रम समिति के अध्यक्ष अवीक मजूमदार को इसमें कुछ ग़लत नहीं लगता. वे इसे एक रूटीन अपडेट बताते हैं. लेकिन कई भाषाविदों ने सांप्रदायिक आधार पर शब्दों को बदलने या स्कूली पाठ्यक्रम तैयार करने की सरकार की मंशा पर सवाल उठाए हैं.

दूसरी ओर, बीजेपी और उससे जुड़े संगठनों ने सरकार के इस फ़ैसले को राज्य में भगवा के मज़बूत होने के डर से उठाया गया कदम क़रार दिया है.

प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष दिलीप घोष कहते हैं, "सरकार पहले से ही तुष्टिकरण की नीति पर चल रही है. सदियों से प्रचलन में रहे शब्दों को बदलना इसी का सबूत है."

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