बिहार: गांव जहां सब कुछ है बस टॉयलेट के सिवा

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- Author, सीटू तिवारी
- पदनाम, नवादा से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
"शौचालय बनवाएंगें, तो बेटा मर जाएगा. फिर कोई काम देने आएगा क्या? ये जो दो मंज़िला मकान बनाए हैं, वो बेटा-बहू के लिए ही बनाए हैं. लेकिन इसमें शौचालय बनाकर बेटे को मारना है क्या?"
कुछ घड़ी पहले तक मुझसे बेहद सौम्य तरीके से बात कर रहीं जया देवी अचानक ही गुस्से में आ गईं.
उनसे मेरा सीधा-सा सवाल था कि आपके घर में शौचालय क्यों नहीं है?
जिस घर में शौचालय होता है, उसमें महिलाओं को सहूलियत रहती है. घर के पुरुषों और बड़े बूढों का भी रोज़मर्रा का जीवन आसान हो जाता है.
यह तक कहा जाता है कि जिन घरों में शौचालय होता है, वहां प्रेम संबंध और मजबूत होते हैं.
लेकिन ये सभी तर्क बिहार में नवादा ज़िले के गाजीपुर गांव में नहीं चलते.

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'तुम शौचालय बनवाओ, हम ज़हर खाते हैं'
दो हज़ार की आबादी वाले गाजीपुर गांव में आपको अच्छी सड़क, पक्के मकान, फ्रिज, कूलर, टीवी, इनवर्टर, बाथरूम में गीज़र तक दिख जाएंगे, लेकिन एक भी घर में शौचालय नहीं मिलेगा.
एक भी घर ऐसा नहीं जिसमें शौचालय हो. सभी लोग खुले में शौच के लिए जाते हैं.
जया देवी के दो मंज़िला मकान में भी सब कुछ है, लेकिन शौचालय नहीं.
वार्ड मेंबर राम जतन सिंह बताते हैं, "सरकारी लोग आए, हमसे बात की, तो हमने सोचा शौचालय घर में बनवा लेते हैं. बस ये विचार मन में आया ही था कि हमारी जनाना (पत्नी) कह दीं कि तुम शौचालय बनवाओ, हम ज़हर खा लेते हैं."

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शौचालय को लेकर भय
पेशे से टीचर सतीश कुमार गाजीपुर गांव में रहते हैं.
घरों में शौचालय ना होने की वजह को वो कुछ ऐसे समझाते हैं, "पहली बार साल 1984 में सिद्धेश्वर सिंह के यहां शौचालय बनाने की प्रक्रिया चालू हुई थी. तभी उनका बड़ा बेटा पप्पू अचानक मर गया. इसके बाद 1996 में श्यामदेव सिंह के घर में शौचालय बनाने की कोशिश हुई. नका भी बड़ा बेटा राम प्रवेश मर गया. फिर 2009 में ऐसी कोशिश हुई तो उनके घर का बड़ा बेटा एक्सीडेंट में मरते-मरते बचा."
"तब से गांववालों के मन में डर बैठ गया है कि जिसके यहां शौचालय बनेगा, उसके यहां बड़ा बेटा जिंदा नहीं रहेगा."

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गांव वालों का कहना है कि वो अपनी पहल से शौचालय नहीं बनवा सकते. ऐसे में सरकार ही सभी के घरों में एक साथ शौचालय बनवाए.
कोई बच्चा स्कूल में टॉयलेट नहीं जाता
आलम ये है कि गांव के सरकारी प्राथमिक स्कूल में साल 2007 से ही शौचालय बना हुआ है, लेकिन उसे कोई इस्तेमाल नहीं करता.
सरकारी मिडिल स्कूल से रिटायर्ड हेडमास्टर शिवरानी प्रसाद शर्मा कहते हैं, "कैसे करेंगे? हम मर जाएं तो कोई बात नहीं, लेकिन बात तो बाल-बच्चा का है. स्कूल में बाहर से भी जो टीचर पढ़ाने के लिए आते हैं, वो भी शौचालय नहीं जाते."
दिलचस्प है कि गांव में अच्छी ख़ासी तादाद सरकारी सेवाओं में काम करने वाले लोगों की है.

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'जाने कैसे गांव में ब्याह कर लिया!'
पटना में कृषि विभाग में काम करने वाली प्रियंका 6 माह की गर्भवती हैं. उन्हें मजबूरन अपने ससुराल गाजीपुर आना पड़ा है.
प्रियंका बताती हैं, "डॉक्टर कहते हैं कि खूब खाइये, लेकिन अगर खूब खाएगें तो जाएगें कहां. अपनी किस्मत को रोते है कि कहां शादी कर लिए."
वो कहती हैं, "शादी से पहले पिताजी हमको ये बात बताए थे, लेकिन हमने सोचा था कि एजडस्ट कर लेंगे. लेकिन अब जब एडजेस्ट करना पड़ रहा है, तो समझ आ रहा है कितना मुश्किल है."

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रिश्तेदारों ने भी बंद किया आना-जाना
ऐसा नहीं है कि सरकार की तरफ से गांव में शौचालय बनाने की कोशिशें नहीं हो रही हैं.
प्रखंड विकास पदाधिकारी राधा रमण मुरारी बताते हैं, "हम गांववालों से कह रहे हैं कि सरकार शौचालय बनाने के लिए 12 हजार रुपये का अनुदान देगी. लेकिन अंधविश्वास के चलते कोई आगे आने को तैयार नहीं. फिर भी हमने वहां मीटिंग की है और गांव का सर्वे किया जा रहा है."

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अंधविश्वास की जद में आए गांववालों की ज़िद के चलते उनकी अपनी रिश्तेदारियां भी अब टूट रही हैं.
हालात ये हैं कि कोई अगुआ (शादी कराने वाले) अब जल्दी से इस गांव में पांव नहीं रखते.
इसी गांव की मंजू देवी बताती हैं, "अगुआ इस गांव का रंग-ढंग देखकर नहीं आते. सब कहते हैं शाम में आएगी, तो सुबह किधर जाएगी."
वो कहती हैं, "अब रिश्तेदार भी घर में नहीं टिकते. बहुत हुआ तो दोपहर में आए, थोड़ी देर रहे और फिर नवादा में ही होटल ले कर रहने चले गए."
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