लोकतंत्र में भीड़तंत्र: क्या देश में अराजकता का राज है?

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- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
1970 का दशक: एक मामूली कुर्सी पर बैठा, विजय वर्मा अपने होठों के बीच सिगरेट लहराए, गुंडों को घूर रहा है.
वो अपने माता-पिता के ख़िलाफ हुए अन्याय का बदला लेने पूरे समाज से लड़ने के लिए मुंबई की तस्करी की दुनिया का बेताज बादशाह बन जाता है. उसका हर शब्द, उसका हर एक्शन उसकी दुनिया का क़ानून होता है.
फिल्म 'दीवार' का 'एंग्री यंग मैन' अमिताभ बच्चन यानी विजय वर्मा हक़ीक़त की दुनिया के क़ानून का पालन नहीं करता. किसी ने उस विजय वर्मा को विजिलांटे वर्मा यानी क़ानून को अपने हाथ में लेने वाला वर्मा कहा था.
2015-17 का दौर: जम्मू में एक मवेशी व्यापारी परिवार को औरतों और बच्चों समेत बुरी तरह से मारा-पीटा जाता है.
पुलिस वहां मौजूद होती है, लेकिन इससे हमला करने वालों को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. मारने वाले इस बर्बर कार्रवाई की वीडियो रिकॉर्डिंग भी करते हैं.

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लव जिहाद
वो कथित रूप से एक स्थानीय गौरक्षा दल के सदस्य हैं. उनके 11 लोग गिरफ़्तार किए जाते हैं. साथ ही पीड़ित परिवार के ख़िलाफ़ मवेशियों की तस्करी का मुक़दमा भी दर्ज कर दिया जाता है.
एंग्री यंग मैन की जगह अब ले ली है गिरोहों ने जो सड़कों पर उमड़ आए हैं. विजय वर्मा की तरह उनका ग़ुस्सा समाज, सिस्टम और सरकार के ख़िलाफ़ नहीं होता. लेकिन विजय वर्मा की तरह वो भी क़ानून को अपने हाथ में ले लेते हैं.
गौरक्षा के नाम पर हो या लव जिहाद के नाम पर या फिर एंटी-रोमियो के नाम पर क़ानून सभी अपने हाथ में ले रहे हैं. इन विजिलांटे ग्रुप्स को कुछ मामलों में सियासी संरक्षण हासिल है और कुछ और मामलों में पुलिस का.
पिछले कुछ सालों से ऐसे ही मंज़र हर कुछ समय बाद देखने को मिल रहे हैं. गौसुरक्षा के नाम पर इंसानों को पीट-पीट कर जान से मारा जा रहा है.
मोदी की चुप्पी
अक्सर गौमांस खाने या रखने की अफ़वाहें हिंसा भड़का रही हैं. इन अफ़वाहों को सोशल मीडिया के ज़रिए बढ़ावा दिया जा रहा है.
गौरक्षा और हिंदू लड़कियों को मुस्लिम लड़कों से बचाने वाले कथित रक्षक खुले आम सड़कों पर हथियारों को लहराते घूम रहे हैं. शुरू में पीड़ित मुसलमान होते हैं.
बाद में दलितों के ख़िलाफ़ भी हमले शुरू हो जाते हैं और अभी हाल में बच्चों के अपहरण की अफ़वाह के बाद झारखण्ड में तीन हिन्दुओं को भी पीट-पीट कर जान से मार दिया गया.
अक्सर ऐसे कांडों में राज्य सरकारें ख़ामोश तमाशाई बनी रहती हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस पर सिर्फ़ एक बार बयान दिया है.
लोग उनसे कड़े शब्द और उससे भी कड़े क़दम उठाने की आशा करते हैं. प्रशासन कमज़ोर नज़र आता है और पुलिस बेबस.

अख़लाक़ का मामला
इन सब के इलावा कहीं कोई विधायक किसी पुलिस वाले को पीट देता है तो कहीं हिंसा पर उतारू भीड़ ज़िला मजिस्ट्रेट को थप्पड़ रसीद कर देती है.
कहीं सांसद ही एक पुलिस अधिकारी के घर हल्ला बोल देता है जहाँ उसके समर्थक तोड़-फोड़ करने में जुट जाते हैं. क्या इससे देश में अराजकता फैल रही है?
क्या ये कानून और व्यवस्था के एक भयंकर संकट की शुरुआत है? क्या ये जंगल राज का ट्रेलर है?
और इससे भी बड़ा सवाल कि क्या ये पुलिस के असर और इसके अधिकार को कमज़ोर करता है?
सीबीआई में आला अधिकारी रह चुके एनके सिंह के अनुसार पुलिस पीड़ितों को बकायदा प्राणदंड देने वाली भीड़ से बचाने में नाकाम रही है, "अख़लाक़ अहमद को पुलिस सुरक्षा नहीं दे सकी. जिन्होंने अख़लाक़ अहमद को मारा वो आज (आज़ाद) घूम रहे हैं."

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पुलिस की इज़्ज़त
सिंह एक अफ़सर की हैसियत से दबंग थे जिन्होंने इंदिरा गाँधी को गिरफ़्तार किया था. उनका कहना है कि आज पुलिस की बदनामी हो रही है.
वे कहते हैं, "पुलिस के लिए जो भी इज़्ज़त बच गई है, समाज में वो घटती जा रही है. इससे होगा ये कि जब सही मानों में पुलिस को क़ानून लागू करने के लिए अपने अधिकार का इस्तेमाल करना होगा तो पुलिस को कई कठिनाइयों का सामना करना होगा."
उत्तर प्रदेश पुलिस और सीमा सुरक्षा बल के प्रमुख रह चुके प्रकाश सिंह के अनुसार पुलिस फ़ोर्स में कई तरह की कमियां हैं. इसे सियासी नेता इस्तेमाल करते हैं अपने फ़ायदे के लिए. उसका मनोबल नीचे है.
वो आगे कहते हैं, "पुलिस फ़ोर्स में संरचनात्मक सुधार की ज़रूरत है. जब से एनडीए सरकार बनी है, गौरक्षकों का हौसला बढ़ा है."

क़ानून का शासन
अब तक आम तौर से ये समझा जा रहा था कि देश में दो ऐसे समूह हैं जो क़ानून को अपने हाथ में लेने के लिए जाने जाते हैं -नक्सली और चरमपंथी.
प्रकाश सिंह कहते हैं कि अब इसमें एक और समूह शामिल हो गया है - आज के स्वयंभू ठेकेदार गिरोह. वो आज की परिस्थिति को देखते हुए कहते हैं, "क़ानून का कोई नियम नहीं है. ऐसा आभास हो रहा है कि जिसकी लाठी उसकी भैंस."
क़ानून का नियम या रूल ऑफ़ लॉ की कमी के कारण क्या हैं?
कुछ विशेषज्ञ कहते हैं कि कई स्वयंभू ठेकेदार गिरोह धर्म और संस्कृति के नाम पर क़ानून को अपने हाथ में लेने को ग़लत नहीं मानते. कुछ क़ानून की इज़्ज़त नहीं करते.
लेकिन प्रकाश सिंह के अनुसार क़ानून अपने हाथ में लेने के पीछे लोगों का अपराधिक न्याय प्रणाली से भरोसा टूटना है.
वे कहते हैं, "मेरे विचार में देश की जनता को अपराधिक न्याय प्रणाली से दिनों-दिन विश्वास उठता जा रहा है. क्रिमिनल केसेज़ 20 साल तक लटके रहते हैं. इस बीच गवाह टूट जाते हैं. सबूत ख़त्म हो जाते हैं. जांच करने वाले अफ़सर बदल जाते हैं."

आपराधिक तत्व
वो आगे कहते हैं, "जब भीड़ को ये लगता है कि अपराध करने वाला क़ानून से बच सकता है तो, इस में देरी हो सकती है तो क्यों न हम ही इसे ख़ुद ही सज़ा दे दें."
कई लोगों के विचार में गौरक्षकों में कई गुट इन स्वयंभू ठेकेदार गिरोहों में शामिल नहीं हैं और न ही वो हिंसा में शामिल हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ये बात कही थी कि गौरक्षा के नाम पर कई आपराधिक तत्व सक्रिय हैं.
लेकिन पंजाब में साबुन बनाने में इस्तेमाल होने वाली मवेशियों की चर्बी के व्यापारी राजीव अरोड़ा के मुताबिक़, "कम से कम पंजाब में ये सारे गुंडे हैं."
उनकी बात शायद पूरी तरह से सही न हो लेकिन उनकी ये राय बनी है. उनके "माल से लदे ट्रकों पर 15 से 20 बार हुए हमलों के बाद" वो अब परेशान हो चुके हैं.
वो कहते हैं, "ये क़ानून थोड़े ही है. ये तो अंधेर है. एफ़आईआर तो मज़ाक है. गौ रक्षकों के ख़िलाफ़ अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई."

कानून और व्यवस्था
दिल्ली के ग़ाज़ीपुर इलाक़े में मवेशियों की ख़रीद-फरोख़्त का सब से बड़ा बाजार है. हर रोज़ 2000 से अधिक जानवरों की यहाँ बिक्री होती है.
सारे जानवर सुबह-सुबह ही बिक जाते हैं. लेकिन इन दिनों दोपहर में भी काफी मवेशी बिक नहीं पाते हैं. कई मंडी तक नहीं आ पाते.
फ़ौज़ान अलवी अखिल भारतीय मांस और पशुधन निर्यातकों के संघ के प्रवक्ता हैं. वो कहते हैं कि गौ रक्षकों के हमलों से "धंधा आधा हो गया है."
वो आगे कहते हैं, "अधिकारियों से शिकायत की लेकिन स्केल इतना बड़ा है कि क़ानून और व्यवस्था लागू करने वाली एजेंसियां इसे रोक नहीं पा रही हैं और ये सिर्फ यूपी में नहीं पूरे हिंदुस्तान में ये एक मुद्दा है."
आम जनता पहले ही पुलिस की अयोग्यता से परेशान नज़र आती है लेकिन पूर्व अफ़सरों के अनुसार पुलिस को अपना काम पेशेवर तरीके से तो अंजाम देना ही चाहिए.
लेकिन स्वयंभू ठेकेदार गिरोहों के सामने बेबसी का दोष सियासी नेताओं को देना चाहिए जो प्रकाश सिंह और एनके सिंह जैसे पूर्व अफ़सरों के अनुसार इन समूहों को संरक्षण देते हैं. उनके अनुसार समस्या ऊपर से शुरू होती है.
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