वो महिला जिन्होंने 85 साल पहले एकतरफ़ा तलाक़ पर सवाल उठाया

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- Author, नासिरूद्दीन
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
मर्दों ने मज़हब का सहारा लेकर तलाक़ और बहु-विवाह का अर्से से बेज़ा इस्तेमाल किया है.
इसलिए ऐसा नहीं है कि आज ही इस पर पहली बार आवाज़ उठ रही है. इसके खि़लाफ़ हमारी पुरखिनों ने भी आवाज उठाई है. हाँ, आवाज़ उठाने के तरीके अलग-अलग रहे हैं.
मशहूर शिक्षाविद, साहित्यकार, नारीवादी रुक़ैया सख़ावत हुसैन ने स्त्रियों और ख़ासकर मुसलमान स्त्रियों की हालत पर खूब लिखा. उन्होंने भी एकतरफ़ा तलाक़ के मुद्दे पर ग़ौर किया था.
यह बात 1932 की है. हालाँकि, रुक़ैया तलवार निकाल कर खड़ी नहीं हुईं. वे सहज बुद्धि से निकलने वाले मज़बूत तर्क देती हैं.
एकतरफ़ा तलाक़ क्यों
वे लिखती हैं और मुसलमानों को याद दिलाती हैं, 'हमारे मज़हब में शादी लड़का-लड़की की रज़ामंदी से ही पूरी होती है.' फिर वे सवाल करती हैं, 'हालाँकि ख़ुदा न करे, अगर शादी टूटने की नौबत आती है तो यह भी दोनों की रज़ामंदी से ही होनी चाहिए. मगर ऐसा क्यों होता है- एकतरफ़ा तलाक़ यानी सिर्फ़ शौहर तलाक़ के बारे में फ़ैसला लेता है?'

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यह सवाल तो वाजिब है. अगर इस्लाम में शादी क़रार है तो बिना दूसरे को शामिल किए क़रार तोड़ना कितना सही है. वे उन लोगों से बात करना चाहती हैं, जो ऐसे इकतरफ़ा तलाक़ के हिमायती हैं.
इसलिए वे मज़हब के उसूल का हवाला देती हैं. यह रुक़ैया के लेखन की ख़ासियत है.
रुक़ैया की आखि़री रचना- नारीरो ओधिकार
नौ दिसम्बर 1932 को रुक़ैया का इंतक़ाल हुआ था. उस रात वे देर तक कुछ लिख रही थीं. उनकी चचेरी बहन मरियम रशीद को उनकी टेबल पर पेपरवेट के नीचे कुछ कागज़ मिले.
मरियम रशीद ने इसे सालों तक बहुत संभाल कर रखा. अर्से बाद यह बंगला की पत्रिका 'माहे-नौ' में छपा तो दुनिया को इसका पता चला.

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यह रुक़ैया की आखि़री रचना थी. रुक़ैया ने बांग्ला में इसका शीर्षक दिया था, 'नारीरो ओधिकार' यानी स्त्रियों के हक़. यह अधूरा लेख है.
मुमकिन है, वे जिंदा रहतीं तो यह लेख एक अहम दस्तावेज़ की शक्ल में हमारे सामने रहता. इस लेख की शुरुआत वे इसी इकतरफ़ा तलाक़ की बात से कर रही थीं.
वे 80-90 साल पहले अपने इलाके में तलाक़ के चलन के बारे में लिखती हैं और ऐसा लगता है कि वे हमारे वक़्त की बात कर रही हैं.
इस लेख में रुक़ैया लिखती हैं, 'हमारे उत्तर बंगाल के मध्यवर्गीय ख़ानदानों में तलाक़ आम है. यानी शौहर साहब मामूली-मामूली सी चूक पर स्त्री को छोड़ देते हैं. तलाक़ दे देते हैं. लड़की से कोई चूक हुई नहीं कि शौहर अकड़ते हुए हल्ला करता है, 'मैं उसे तलाक़ दूँगा. आज ही तलाक़ दूँगा.'
दाएँ तालाक़, बाएँ तलाक़
उस इलाके में तलाक़ देने के तरीके के बारे में वे लिखती हैं, 'इसके बाद घर की बाकी महिलाएँ इस बदनसीब लड़की के साथ एक जगह बैठती हैं. बाहर बरामदे या बैठक में शौहर नाम के जीव के साथ मर्द बैठते हैं. इन सब लोगों के सामने शौहर नाम का यह शख़्स तीन बार ऊँची आवाज़ में बोलता है-
(आइनो तालाक़, बाइनो तालाक़, ताला़क तालाक़, तिन तालाक़, आजो जोरूरे दिलाम तालाक़)
'दाएँ तालाक़, बाएँ तलाक़, तलाक़, तलाक़, तीन तलाक़, आज तो देना ही है तलाक़'
देन मोहर माफ़ करती जाओ
मामूली मामूली सी बात पर दिए जाने वाले इस एकतरफ़ा तलाक़ का असर स्त्रियों और मर्दों पर एक जैसा नहीं होता है. इकतरफ़ा तलाक़ की इस बात को रुक़ैया बहुत बारीकी से समझती हैं और उसे रेखांकित करती हैं.
मगर यह बताने का तरीका ग़ौर करने लायक है. वे बता रही हैं- 'इस व़क्त मर्द को का़फी ख़ुश देखा जा सकता है. मानो ऐसा लगता है, नई बीवी मिलने के ख़्वाब में फूला नहीं समा रहा. मगर लड़की तो ज़ारो-क़तार रोती है.'

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यानी मर्द की जि़ंदगी पर इस तलाक़ का कोई असर नहीं पड़ा है. वह तो अपनी नई दुनिया शुरू करने के ख़्वाब भी देखने लगा है. यही तो इस समाज में स्त्री की हालत का आईना है.
वे एकतरफ़ा तलाक़ के बाद का हाल बयान करती हैं. जो बयान है, उसे महसूस करने पर ही उस हालत का अंदाज़ा लगाया जा सकता है.
रुक़ैया लिखती हैं, 'इसके बाद (इकतरफ़ा तलाक़ के बाद) घर की कोई बड़ी-बूढ़ी महिला लड़की को पकड़ती है. फि़र उसके कान, नाक, हाथ के ज़ेवर उतारकर साड़ी के आँचल में बाँध देती है. उसके हाथ की काँच की चूडि़याँ ईंट या लकड़ी के टुकड़े की मदद से तोड़ दी जाती हैं. ... और फि़र कहती है, 'देन मोहर (मेहर) माफ़ करती जाओ.'
ध्यान रहे, मेहर निकाह से जुड़ी चीज़ है, तलाक़ से नहीं. इसे स्त्रियों का हक़ माना जाता है. मगर आज भी ज़्यादातर मुसलमान महिलाओं को यह नहीं मिलता है या फि़र इसे तलाक़ से जोड़ दिया जाता है.
लड़की के हिस्से आता है खाली दुख
हमारे सामाजिक निज़ाम में लड़की की जि़ंदगी का मक़सद उसकी शादी, उसके शौहर और ससुराल से जोड़ दिया जाता है. उसकी परवरिश ही इसी के लिए की जाती है. उसकी जिंदगी पूरी तरह शादी और शौहर के इर्द-गिर्द ही घूमती है.

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इसलिए जब शादी का क़रारनामा एकतरफ़ा तरीक़े से टूटता है तो वह अचानक अपने को बेसहारा और बेबस पाती है. उसके लिए तो उसकी दुनिया ही जैसे ख़त्म हो गई हो.
रुक़ैया इस पसमंज़र को चंद लाइनों में कलमबंद करती हैं. वे लिखती हैं, 'लड़की इस वक़्त (एकतरफ़ा तलाक़ के वक़्त) फूट-फूट कर रोती है. वह बेचारी तो शौहर हारकर, बनाव-सिंगार हारकर, अपने हाथों से सजाई पति की दुनिया हारकर- अपने हिस्से आए खाली दुख के लिए रो रही है.'
लेकिन मर्द के लिए ऐसी कुछ तबाही नहीं आई है. उसकी जि़ंदगी में तो जैसे कुछ हुआ ही नहीं है.
रुक़ैया इसके बाद का नज़ारा दिखाती हैं- 'मर्द अपने दोस्तों-यारों के संग मस्ती में झूमते हुए कहीं घूमने जा रहा ... और लड़की का बाप, भाई चाचा या मामू- इनमें से जो भी इस घड़ी में लड़की के गार्डियन के रूप में मौजूद रहते हैं, वह बाकी लोगों की मदद से लड़की को जबरन पकड़कर पालकी या बैलगाड़ी में बैठा कर लेकर चले जाते हैं.'
मर्दों से सवाल
मगर बड़ा सवाल है कि आखि़र मर्द बेहिचक, बिना किसी ख़ौफ़ के एकतरफ़ा तलाक़ क्यों देते हैं?
रुक़ैया मर्दों द्वारा इकतरफ़ा तलाक़ दिए जाने की वजह बहुत ही शाइस्तगी से बताते हुए आगे बढ़ जाती हैं. उनके ग्यारह शब्द, हजार शब्दों पर भारी हैं. मर्द इकतरफ़ा तलाक़ क्यों देते हैं?
रुक़ैया की नज़र में यह सिर्फ इकतरफ़ा तलाक़ का ही मसला नहीं है. वे लिखती हैं, 'हालाँकि ऐसा तो लगभग हर मामले में देखने को मिलता है.'

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रुक़ैया द्वारा 1911 में कायम सख़ावत मेमोरियल गर्ल्स स्कूल कोलकाता में आज भी चल रहा है.
यानी मर्द तो जि़ंदगी के हर मामले में एकतरफ़ा ही फैसला लेते हैं. वे अपने फ़ैसलों में कब और कहाँ स्त्री को शामिल करते हैं. मर्द अपने ही हक़ को देखते रहे हैं.
उन्होंने आमतौर पर स्त्रियों के हक़ की परवाह नहीं की है. यानी मर्द जिस तरह जि़ंदगी के दूसरे मामलों में सब कुछ अपने काबू में रख फैसला लेते हैं. उसी तरह वे एकतरफ़ा तलाक़ का विकल्प भी अपने ही अख्ति़यार में रखते हैं और इस्तेमाल करते हैं. यह वस्तुत: तलाक़ के नाम पर मर्दानगी की नुमाइश ही है.
इस अधूरे लेख में रुक़ैया बहुत थोड़ा ही लिख पाई हैं. हालांकि जो लिखा है, उसका मर्म आज भी मौज़ूँ है.
(रुक़ैया की रचना का मूल बांग्ला से हिन्दी/उर्दू नासिरूद्दीन का है. वे रुक़ैया की रचनाओं पर काम कर रहे हैं.)
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