मोदी इसराइल-फ़लस्तीन में कैसे संतुलन बिठाएंगे

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- Author, सुहासिनी हैदर
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जुलाई के पहले हफ्ते में इसराइल की यात्रा पर जा सकते हैं.
लेकिन उससे पहले फ़लस्तीनी प्रशासन के प्रमुख महमूद अब्बास का चार दिनों का भारत दौरा 15 मई से शुरू हो गया है.
महमूद अब्बास अपने कार्यकाल में पांचवीं बार भारत आए हैं, लेकिन मोदी सरकार आने के बाद ये उनका पहला भारत दौरा है.
फ़लस्तीन और भारत के बीच द्वीपक्षीय मुद्दों पर बातचीत होगी इनमें शिक्षा, तकनीक समेत कई क्षेत्रों में पांच-छह एमओयू पर हस्ताक्षर हो सकते हैं.
नरेंद्र मोदी पहले भारतीय प्रधानमंत्री हैं जो इसराइल के दौरे पर जाने वाले हैं.
इससे पहले विदेश मंत्री या फिर वरिष्ठ भारतीय अधिकारी और मंत्री इसराइल के दौरे पर जाते रहे हैं जो कि फ़लस्तीनी क्षेत्र में भी जाते थे.
लेकिन प्रधानमंत्री मोदी इसराइल के दौरे के साथ-साथ फ़लस्तीनी इलाकों में भी जाएंगे या नहीं, इस पर फ़िलहाल तस्वीर साफ नहीं है.
मोदी सरकार
तो ऐसे में कहीं न कहीं फ़लस्तीनी नेता महमूद अब्बास की यात्रा का समय अहम हो जाता है क्योंकि मोदी सरकार इसराइल पर ज़्यादा ध्यान केंद्रित कर रही है.
अगर मोदी इसराइल के दौरे के समय फ़लस्तीन नहीं जाते तो इसके भी कुछ मायने निकाले जाएंगे, लेकिन इससे पहले ही महमूद अब्बास को भारत यात्रा पर बुलाया गया है.
फ़लस्तीनी नेता महमूद अब्बास भारत आने से पहले रूस के राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन से मिले हैं और अमरीका के राष्ट्रपति ट्रंप से भी वॉशिंगटन में मिल चुके हैं.
महमूद अब्बास जब भारत से लौटेंगे तो कुछ ही दिनों में अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप इस इलाके का दौरा करने वाले हैं.
चूंकि महमूद अब्बास का कार्यकाल ख़त्म होने जा रहा है ऐसे में उनका ज़ोर इसराइल-फ़लस्तीन विवाद को सुलझाने के लिए शांति प्रक्रिया पर है.
वो इसमें भारत की अहम भूमिका की उम्मीद जता चुके हैं.

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इसराइल से नज़दीकी?
ऐसे में महमूद अब्बास भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इस मसले पर बात कर सकते हैं.
हालांकि भारत ने इसराइल-फ़लस्तीन समस्या में कोई अहम रोल निभाने की तैयारी नहीं दिखाई है.
लेकिन अमरीका समेत कई बड़े देश इस मसले के हल में जो रुचि दिखाते हैं, तो ऐसे में भारत भी इस शांति प्रक्रिया से अलग-थलग रहना पसंद नहीं करेगा.
फ़लस्तीन और भारत काफ़ी लंबे समय तक नज़दीक रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र में भारत ने कई बार फ़लस्तीन का समर्थन किया है.
लेकिन पिछले कुछ सालों में भारत के रुख में बदलाव आया है. भारत ने संयुक्त राष्ट्र में इसराइल के समर्थन में वोटिंग की है.
भारत ही नहीं बल्कि कई देश हैं जो कभी फ़लस्तीन के नज़दीकी थे, वो अब इसराइल की तरफ़ बढ़ रहे हैं.

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कारगिल युद्ध
1992 में भारत ने इसराइल के साथ पूर्ण राजनयिक संबंध बनाए थे.
लेकिन करगिल युद्ध के बाद भारत और इसराइल ज़्यादा करीब आए क्योंकि करगिल युद्ध के दौरान भारत को ज़रूरी सैन्य साज़ो-सामान और असलहा इसराइल से मिला था.
चूंकि इसराइल ने करगिल युद्ध के अहम समय में बिना शर्त मदद दी, तब से भारत इसराइल को एक भरोसेमंद सहयोगी मानने लगा.
अब भारत और इसराइल के बीच कई क्षेत्रों जैसे कृषि, शिक्षा क्षेत्र, टेक्नॉलॉजी और स्टार्ट अप में द्विपक्षीय संबंध स्थापित हो चुका है.
(वरिष्ठ पत्रकार सुहासिनी हैदर से बीबीसी संवाददाता हरिता कंडपाल की बातचीत पर आधारित)
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