नज़रिया: 'एक और मुसलमान की मौत, या एक भारतीय की...?'

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- Author, अपूर्वानंद
- पदनाम, लेखक और विश्लेषक, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
एक और मुसलमान की मौत, या एक भारतीय की मौत? या एक भारतीय मुसलमान की हत्या?
क्या ऐसा कहने की इजाजत है? क्योंकि अब मुसलमान की हत्या को मुसलमान की हत्या कहने पर नाराज़ होकर यह आरोप लगाया जाता है कि यह भाषा हिंसा और भेदभाव का प्रचार करती है.
हत्या को मौत कहा जाना चाहिए और दुर्घटना माना जाना चाहिए. हर कोई इंसान है और मरनेवाले को मुसलमान बताना साम्प्रदायिक घृणा का प्रचार है और मौत को हत्या कहना हिंसा का.
लेकिन वह जो गुमला में मरा, वह कोई लू से नहीं मरा था, उसे पीटते-पीटते मार डाला गया था.और यह सामूहिक सज़ा उसे एक हिंदू स्त्री से प्रेम करने के अपराध में दी गई थी.
मारनेवाले हिंदू थे और उन्होंने उसे ठीक इसी वजह से मारा गया कि उसने मुसलमान होकर यह जुर्रत की थी. उसी तरह अलवर में जिसे दौड़ाकर मार डाला गया,उसका जुर्म था कि वह मुसलमान होकर भी पवित्र गाय के साथ दिखलाई पड़ा था. मारनेवालों में सब हिंदू थे.

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जो हत्यारे या उनके वकील हैं, वे अब अपराध को अपराध कहने पर खफ़ा हो जाते हैं. अडोर्नो ने लिखा था कि कमरे में फाँसी का फंदा है, यह याद दिलाने पर जल्लाद नाराज़ हो जाता है. क्योंकि ऐसा करके वह जल्लाद के प्रति विद्वेष फैला रहा होता है.
एक चर्चा में एक अफ्रीकी के यह कहने पर कि उत्तर प्रदेश में हुई अफ्रीकी की हत्या नस्ली घृणा के चलते हुई, भारतीय जनता पार्टी के एक सांसद उन पर क्रुद्ध हो गए और उनके इस वक्तव्य को ही द्वेषपूर्ण कहकर उनपर हमला किया. उससे तरह एक दूसरे व्यक्ति पर, जो इस नस्ली नफ़रत की चर्चा कर रहे थे, उन्होंने विभाजनकारी होने का आरोप लगाया.
हत्यारा हत्या को हादसा मनवाना चाहता है. खुद को वह कुदरती ताकत में बदल देता है. इस तरह न तो ह्त्या, हत्या रह जाती है और न हत्यारा, हत्यारा. सब कुछ प्राकृतिक हो जाता है. मानो, मरनेवाला किसी तूफ़ान में फँस गया था.
लेकिन हन्ना आरेंत ने कहा था कि एक यहूदी इसलिए मारा जाता है कि वह यहूदी है, इसलिए नहीं कि वह इंसान है. फिर उसकी हत्या को यहूदी की हत्या कहना होगा, इंसान की मौत नहीं. भारत में भी जो हो रहा है, उसमें उनकी यह बात रखी जानी चाहिए.

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अब मुसलमान की हत्या एक रोज़मर्रा की चीज़ होती जा रही है. इस तरह ख़तरा यह है कि यह वह घटनात्मकता खो बैठेगी जो हत्या को मीडिया के लिए दिलचस्प ख़बर बनाती है. ऐसा लगने लगा है कि मीडिया पर मुसलमान-थकान या ऊब हावी हो रही है.
इसलिए गुमला के मुसलमान का क़त्ल पहले पृष्ठ पर जगह नहीं पा सका. अगर मुसलमानों को इसी तरह रोज़ मारे जाने की आदत पड़ गई है तो वे रोज़ हरेक ऐसी हत्या पर उतनी ही तवज्जो की मांग नहीं कर सकते. और हत्याएँ इतनी नियमितता से और इस तादाद में होने लगेंगी, कि हर हत्या गुजरी हुई बात होने को अभिशप्त होगी.
फिर उन मुसलमानों का तो तो जिक्र ही क्या करना जो गिरफ़्तार किए जा रहे होंगे या पीटे रहे होंगे? या उनका सार्वजनिक अपमान या अलगाव भी खबर की हैसियत कैसे पा सकेगा जब वह हत्याओं के सिलसिले से प्रतियोगिता कर रहा है?
यही वजह है कि न तो अखबारों ने, न टेलीविज़न ने यह बताया कि इस बार पटना, हजारीबाग और दूसरी जगहों पर तलवार भाँजते हुए, मुस्लिम मुहल्लों के सामने या उनके अन्दर घुसकर राम नवमी के जुलूस से गाली गलौज की गई और "टीका हो या टोपी हो,जयश्रीराम कहना होगा" या बंगाल में यह कहा गया कि रामजादे या हरामजादे में चुनना होगा.

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अखबार चाहें, तो तर्क दे सकते हैं कि वे दरअसल घृणा प्रचार का हिस्सा नहीं बनना चाहते. लेकिन अगर आप घृणा के संगठन और उसके आयोजन की खबर नहीं दे रहे तो कल को इस घृणा के चलते हुई हत्या को भी आप हादसा भर ही कहेंगे, किसी पूर्व योजना का नतीजा नहीं.
हिंदू क्या ऐसी खबरें पढ़कर शर्मिंदा होंगे या मरने वालों पर ही इस वजह से नाराज़ हो जाएँगे कि वे उन्हें जान बूझकर लज्जित करने पर तुले हैं और इस तरह दोष उन्हीं का है? क्या वे इसे गलती मानकर भुला नहीं सकते?
क्या यह सबकुछ एक वक्ती उबाल है जो उत्तर प्रदेश के चुनाव नतीजे के चलते पैदा हुए अति उत्साह का परिणाम है? या यह अब धीरे-धीरे राष्ट्रीय आदत में तब्दील हो रहा है और चूँकि ये उभार के पहले दिन हैं, इसलिए हमें कुछ बेचैनी सी हो रही है?
फिर हमें भी इसकी वैसे ही आदत पड़ जाएगी जैसे छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के बलात्कार या हत्याओं की वहां के हिंदू समाज को पड़ चुकी है?
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