कश्मीरी जो 'न हिंदुस्तानी हैं और न पाकिस्तानी'

    • Author, माजिद जहांगीर
    • पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

पहले पिता 19 सालों तक अपनी बहन से आख़िरी बार मिलने का इंतज़ार करते रहे, लेकिन जब मुलाक़ात का वक़्त आया तो बहन की मौत हो गई थी.

अब बीते बीस बरस से बेटा माँ से मिलने के लिए तड़प रहा है, लेकिन वो लम्हा आज तक कभी नहीं आया.

ये कहानी भारत-प्रशासित कश्मीर के रहने वाले 67 साल के तारिक़ महमूद तारिक़ की है.

तारिक़ महमूद की पैदाइश तो पाकिस्तान-प्रशासित कश्मीर के मीरपोरा की है, लेकिन उनका पूरा परिवार भारत-प्रशासित कश्मीर से ताल्लुक रखता है.

बंटवारे से कुछ समय पहले तारिक़ महमूद के पिता गुलाम नबी कारोबार के सिलसिले में मुज़फ़्फ़राबाद चले गए थे और बंटवारे की वजह से वापस लौट नहीं सके.

तारिक़ महमूद के माता-पिता दोनों ही श्रीनगर रहने वाले हैं और उनकी ससुराल भी यहीं है.

'क्विट इंडिया नोटिस'

बीते बीस बरसों से तारिक़ महमूद पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में अपनी माँ से मिलने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अदालत में सिर्फ़ तारीखें ही मिल रही हैं.

बंटवारे के बाद साल 1997 तक तारिक़ महमूद का परिवार अक्सर भारत प्रशासित कश्मीर आता-जाता रहता था.

लेकिन आखिरी बार तारिक़ महमूद 1997 में कश्मीर आए और फिर लौट नहीं सके.

वो कहते हैं, "मेरा पूरा परिवार 1997 में भारत प्रशासित कश्मीर आया था और जब वीज़ा और पासपोर्ट का समय बीत गया तो मुझे भारत सरकार की तरफ से 'क्विट इंडिया नोटिस' मिला जिसके बाद मुझे अदालत का दरवाज़ा खटखटाना पड़ा और अदालत ने स्टे जारी कर मुझे फ़ैसला आने तक यहाँ रहने की छूट दी."

कुछ ही समय बाद तारिक़ महमूद ने अपने परिवार को वापस पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर भेज दिया और वहां बच्चों की पढ़ाई पूरी करने के बाद दिल्ली के रास्ते वापस बुलाया.

श्रीनगर में धमाके

परिवार का दिल्ली से कश्मीर वापस पहुंचने का सफ़र भी अजीब था.

वह कहते हैं, "जब मेरी पत्नी और बच्चे दिल्ली पहुंचे तो मेरी पत्नी ने अपने पिता की तस्वीर एक मैगज़ीन के कवर पन्ने पर देखी. तस्वीर में वो खून से लथपथ थे. उस समय श्रीनगर में बम धमाके हुए थे जिसमें वो ज़ख़्मी हो गए थे. वो लोग रोते-बिलखते श्रीनगर पहुंचे."

तारिक़ महमूद कहते हैं कि बीस बरस बीत चुके हैं, लेकिन अब तक फैसला नहीं आया.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "ये स्टे तब से लेकर हमारे गले में फंस चुका है. न उगल सकते हैं, न निगल सकते हैं. सरकार की नज़र में हम इस समय न हिंदुस्तानी हैं, न पाकिस्तानी हैं. पता नहीं ये हमें कश्मीरी मानते हैं या नहीं, ये तो अल्लाह ही जानता है."

तारिक़ महमूद की माँ मदीना बेगम की सेहत ठीक नहीं रहती. वो अब यात्रा नहीं कर सकती हैं. पिता का निधन कुछ साल पहले पाकिस्तान-प्रशासित कश्मीर में हो गया. वे वहीं दफ़्न हैं.

जज़्बात का क़त्ल

तारिक़ महमूद को इस बात ने काफी परेशान किया है कि जब कोई रिश्तेदार इधर या उधर मरता है तो उसके बाद वीज़ा दिया जाता है जिसका कोई मतलब नहीं होता है.

उन्होंने कहा, "जब माँ के भाई मर गए तो उसके बाद उन्हें वीज़ा दिया गया. ये तो ऐसी बात हो गई कि कोई रिश्तेदार मरता है तो फिर कहा जाता है कि अब तुम रोने के लिए आ सकते हो. ये तो जज़्बात का क़त्ल है. ज़िंदा इंसान से मुलाक़ात करने का ख़्वाब पूरा नहीं होता. वीज़ा हासिल करने में ही समय निकल जाता है."

भारत प्रशासित कश्मीर और पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर दोनों ही जगहों के स्टेट सब्जेक्ट दस्तावेज़ होने के बावजूद तारिक़ महमूद के लिए आर-पार आना-जाना आसान नहीं है.

वह कहते हैं, "अगर भारत कहता है कि पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर हमारा है तो फिर क्या हम उनके नहीं हैं. माँ से जब भी बात होती है तो वह कहती हैं कि आप आने की कोशिश क्यों नहीं करते? मेरा जवाब यही होता है कि मैं तो चाहता हूं कि उड़ के आ जाऊं, लेकिन कैसे?"

तारिक़ महमूद के पिता मीरपुर में एक्स्ट्रा कमिश्नर अफ़सर के तौर पर काम करते थे. खुद तारिक़ महमूद ने कई सालों तक पाकिस्तान-प्रशासित कश्मीर में पत्रकार के तौर पर काम किया है.

तारिक़ कहते हैं कि उनकी बीमार माँ आख़िरी मुलाक़ात के लिए सरहद के उस पर इंतजार कर रही हैं.

वह कहते हैं, "मैं ये नहीं कहता हूँ कि अदालत मेरे हक़ में ही फैसला सुनाए. जो भी फ़ैसला होगा, मुझे मंज़ूर होगा. कम से कम माँ से मिलने तो दिया जाए."

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