जब योगी आदित्यनाथ को एबीवीपी का टिकट न मिला..

योगी आदित्यनाथ

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    • Author, राजेश डोबरियाल
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और बीजेपी के फ़ायरब्रांड हिंदूवादी नेता योगी आदित्यनाथ अपने स्कूल-कॉलेज के दिनों में कुछ शर्मीले से और शांत स्वभाव के हुआ करते थे.

पौड़ी के यमकेश्वर ब्लॉक के रहने वाले योगी आदित्यानाथ ने कोटद्वार से बीएससी की है. दीक्षा लेने से पहले योगी आदित्यनाथ का नाम अजय सिंह बिष्ट था.

यमकेश्वर के पंचूर गांव के आनंद सिंह बिष्ट और सावित्री देवी के सात बच्चों में अजय पांचवें थे. तीन बहनें और एक भाई उनसे बड़े हैं और दो छोटे.

उनके छोटे भाई महेंद्र सिंह बिष्ट ने बीबीसी को बताया कि 1994 में संन्यास लेने के बाद योगी कुल मिलाकर तीन-चार बार ही घर आए हैं. इनमें से दो बार 1999 और 2013 में भाइयों की शादी में आए थे.

योगी आदित्यनाथ के माता-पिता.

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बहरहाल योगी भले ही गांव न के बराबर आते हों लेकिन रविवार को उनके शपथ ग्रहण पर पंचूर गांव में जश्न मनाया गया. गांव वाले उनका शपथ ग्रहण देखने के लिए टीवी से चिपके रहे और उसके बाद उन्होंने होली-दिवाली एक साथ मनाई.

योगी के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद उनके गांव पंचूर में जश्न मनाते लोग

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इमेज कैप्शन, योगी के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद उनके गांव पंचूर में जश्न मनाते लोग.

योगी के माता-पिता को बधाई देने की होड़ लग गई थी और यमकेश्वर के एसडीएम और अन्य अधिकारी भी इस पंक्ति में शामिल थे.

वैसे ये खुशी सिर्फ़ पंचूर गांव तक ही सीमित नहीं थी, कोटद्वार में योगी के सहपाठी और दोस्त भी खुशियां मना रहे थे.

कोटद्वार पीजी कॉलेज

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कोटद्वार पीजी कॉलेज में योगी के दोस्त रहे संजय सजवाण बताते हैं कि पढ़ाई के दौरान वह और योगी आदित्यनाथ शहर में ही किराए के कमरों में रहा करते थे.

संजय कहते हैं,"योगी तब शांत और शर्मीले युवक थे. हां हिंदुत्व की ओर उनका रुझान शुरू से था और कॉलेज राजनीति में पहचान बनाने के लिए हम लोग एबीवीपी में शामिल हो गए थे. योगी को संगठन ने टिकट नहीं दिया तो हमने उन्हें अकेले ही चुनाव लड़वा दिया."

योगी आदित्यनाथ

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इमेज कैप्शन, योगी आदित्यनाथ की कॉलेज के समय की तस्वीर

हालांकि सचिव पद के लिए हुए इस चुनाव में वह हार गए थे लेकिन इससे वह संन्यासी नहीं हो गए थे.

उस समय एबीवीपी के ज़िला संयोजक रहे डॉक्टर पद्मेश बुडाकोटी कहते हैं कि शायद किस्मत ने ही उनका मार्ग प्रशस्त किया.

बुडाकोटी के अनुसार 89-92 में स्नातक करने के दौरान राम मंदिर आंदोलन चरम पर था और एबीवीपी कार्यकर्ता होने के नाते अजय पर भी इसका काफ़ी प्रभाव पड़ा था.

वह कहते हैं कि एक और घटना ने शायद अजय की दिशा मोड़ी.

कोटद्वार में रहने के दौरान उनके कमरे से सामान चोरी हो गया था जिसमें उनके सर्टिफ़िकेट भी थे. इस वजह से गोरखपुर से एमएससी करने का उनका प्रयास असफल हो गया.

योगी आदित्यनाथ अपने परिवार के लोगों के साथ

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इमेज कैप्शन, उत्तराखंड विधानसभा चुनाव के दौरान ऋतु खंडूड़ी के प्रचार के लिए यमकेश्वर आए योगी आदित्यनाथ कुछ समय के लिए घर भी आए थे.

इसके बाद उन्होंने ऋषिकेश में एमएससी में एडमिशन तो लिया लेकिन कुछ राम मंदिर आंदोलन का प्रभाव और कुछ एडमिशन को लेकर परेशानी से उनका ध्यान और चीज़ों में लग गया.

गोरखपुर प्रवास के दौरान ही वह महंत अवैद्यनाथ के संपर्क में आए थे जो उनके पड़ोस के गांव के निवासी और परिवार के पुराने परिचित थे. अंततः वह महंत की शरण में ही चले गए और दीक्षा ले ली.

डॉक्टर पद्मेश कहते हैं, "गोरखपुर जाने से पहले तक अजय में आक्रामकता या उग्र हिंदुत्व के कोई निशान नहीं थे. वह एक संकोची युवक थे जिसे गांव से आने के बाद कोटद्वार जैसे 'बड़े शहर' में सामंजस्य बैठाने में शुरुआत में दिक्कत महसूस हो रही थी."

योगी आदित्यनाथ

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इमेज कैप्शन, कॉलेज टूर में साथी छात्रों के साथ योगी आदित्यनाथ. सबसे बाएं ऊपर से दूसरे सिर पर लाल चुन्नी पहने हुए.

इसकी पुष्टि योगी के सहपाठी रहे हर्ष सिंह राणा भी करते हैं. अब गुड़गांव में रह रहे राणा बताते हैं कि गढ़वाल विश्वविद्यालय में उस साल बीएससी के लिए एंट्रेंस टेस्ट शुरू किया गया था. अजय और राणा ने ये टेस्ट पास कर पीसीएम कोर्स में एडमिशन लिया था.

राणा कहते हैं, "हम दोनों ही गांव से आए थे और हिंदी मीडियम में पढ़े थे. बीएससी की पढ़ाई अंग्रेजी में होती थी और स्वाभाविक रूप से इसमें हम दोनों को ही परेशानी होती थी. फिर कोटद्वार के स्थानीय लड़के हम गांव-वालों को ज़्यादा भाव नहीं देते थे और इसलिए हम लोग अधिकतर समय साथ ही बिताते थे."

बीएससी करने के बाद अजय सिंह से किसी का भी ज़्यादा संपर्क नहीं रहा. संपर्क तो उनका ज़्यादा घर वालों के साथ भी नहीं रहा.

योगी के बचपन की तस्वीर

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इमेज कैप्शन, योगी के बचपन की तस्वीर

योगी के पिता आनंद सिंह बिष्ट बताते हैं, "1993 में ही वह गोरखपुर चले गए थे जहां महंत अवैद्यनाथ ने उनसे अपना उत्तराधिकारी बनने को कहा था. इसके बाद वह घर अनुमति मांगने आए और अपनी मां से पूछा कि क्या मैं गोरखपुर चला जाऊं, तो उन्हें लगा कि ये कोई नौकरी करने जा रहा है. मां ने कह दिया चला जा. हालांकि जब वह मुझे मिला तो मैंने मना कर दिया. उसने ज़िद की तो मैंने कह दिया कि चला जा पर मेरी सहमति नहीं है."

फरवरी, 1994 को बसंत पंचमी के दिन गोरखपुर में अजय सिंह बिष्ट महंत अवैद्यनाथ से दीक्षा लेकर योगी आदित्यनाथ बन गए.

हालांकि घरवालों को इसका पता तीन महीने बाद चला जिसके बाद वह उनसे मिलने भी गए.

और उस दिन से अजय उनके लिए भी 'महाराज जी' हो गए.

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