नज़रिया: मोदी लोगों के लिए एटीएम मशीन या चुनौती ?

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- Author, शिव विश्वनाथन
- पदनाम, समाजशास्त्री
अक्सर चुनावों का ये स्वभाव होता है कि चुनावी नतीजों का विश्लेषण इनके फ़ौरी असर से एक कदम आगे बढ़कर ही हो पाता है.
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को जो प्रचंड बहुमत मिला है उसने मोदी सरकार को लेकर संशय को ख़त्म कर दिया है.
जो थोड़ी बहुत अनिश्चितता दिखती थी वो भी अब गायब हो चुकी है और अब दक्षिण और उत्तर पूर्व भारत में भी भाजपा के उदय की किरणें दिखने लगी हैं.
कभी क्षेत्रीय पार्टी की तरह सिमटी सी भाजपा अब किसी 'महामारी' की तरह देश के हिस्सों में फैल चुकी है. लेकिन ये भी सच है कि मोदी वोटरों के लिए 'एटीएम' हो गए हैं जो नतीजे देता है.

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ऐतिहासिक जीत
हाल के विधानसभा चुनावों में सबको चौंकाने वाली भाजपा की ऐतिहासिक जीत का श्रेय जिस व्यक्ति को जाता है वो लोगों के मन में अपनी पैठ बना रहा है.
ऐसा लगता है यूपी को भी 'मोदी वायरस' लग चुका है और भारत के अन्य कई इलाके इसकी चपेट में आने को तैयार बैठे हैं.
बदलाव की जिस लहर पर सवार होकर 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की आंधी आई थी उसके भंवर में मोदी जैसे खुद ही एक संदेश बनकर उभरे हैं और ये संदेश साफ़ है कि भारत को ऐसा ही नेता चाहिए.

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वो एक महत्वाकांक्षी नेता के तौर पर अपने ही वोट बैंक का प्रतिनिधित्व भी करते हैं, जो विरासत में मिली सत्ता से ज्यादा उपलब्धियों और गतिशीलता को महत्व देता है.
'मेक इन इंडिया'
मोदी एक सेल्फ़-मेड मैन हैं, एक ऐसा व्यक्ति जो अपने बूते खड़ा हुआ है, जिसने खुद को बनाया है और ऐसे में जब वो 'मेक इन इंडिया' की अपील करते हैं तो उसमें कुछ सच्चाई नज़र आती है.
जनता उन पर भरोसा भी करती है. किसी भी चूक का ज़िम्मा पार्टी और सरकार पर लेकिन मोदी एक सटीक-अचूक अवधारणा जैसे बने रहते हैं.
लोग न सिर्फ उन पर विश्वास करते हैं, बल्कि उन पर विश्वास करना भी चाहते हैं.

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वो बदलाव की बात करते हैं और वोटर मान लेते हैं कि वो अपना वादा निभाएंगे.
'धर्मनिरपेक्षता का खेल'
मोदी जैसे एकदम 'पैसावसूल' वाली फ़िलींग देते हैं. मध्य वर्गीय भारतीयों के लिए मोदी एक ऐसा मसीहा बनकर उभरे हैं जो भ्रष्टाचार से सड़ चुके सिस्टम की सफ़ाई करेगा.
भारतीयों को अब बदलाव की सुगबुगाहट का आभास हो रहा है और लोग भी अपनी महत्वकांक्षाओं को पंख लगाकर इस बदलाव के महासमर का हिस्सा बन रहे हैं.
उत्तर प्रदेश में भाजपा को मिला बहुमत इस ओर इशारा कर रहा है कि 'चुनावी खेल' के नियम-क़ायदे अब बदल गए हैं.

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हाशिए के वोटरों ने मोदी को संकेत दे दिया है कि अब वो समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता के खेल से ऊब चुके हैं.
विकास का नारा
वोटरों ने साफ़ कर दिया है कि जाति के समिकरण की बातें भी अब पुरानी हो चुकी हैं.
मतलब ये कि अब सिर्फ़ जातिवाद की बात करना एकदम घटिया राजनीति का परिचायक है.
अब राजनीति की थाली में वोटरों को जातिवाद की खिचड़ी के साथ कुछ और भी परोसना होगा. दलित सिर्फ़ मायावती को वोट देंगे, ये मान्यता पुरानी हो चुकी है.
दलित भी अब एक ही खांचे में फिट हाने के बजाय नई और व्यापक संभावनाओं की ओर देख रहे हैं. मोदी ने विकास का नारा देकर इस दायरे को बड़ा कर दिया है.

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अब विकास, राजनीति का वो जादुई शब्द है जो अपने साथ एक्शन, डिलिवरी और उपलब्धता जैसे वायदे लेकर आता है.
करिश्माई व्यक्तित्व
जब वोटर से विकास का वादा किया जाता है तो परिणाम प्रत्यक्ष होते हैं यानी ऐसे जो कि दिखाई दें.
मोदी में मध्यवर्ग को एक नेता मिल गया है, जो उन्हें अपने जैसा लगता है और उसका करिश्माई व्यक्तित्व उन्हें पहुंच से दूर भी नहीं लगता.
भाजपा ने पुरानी कांग्रेस पार्टी की तरह एक पार्टी के राज की संभावना को बढ़ा दिया है.

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हालांकि कांग्रेस हाशिए पर पहुंच चुके लोगों, मध्य वर्ग और अल्पसंख्यकों के हितों की राजनीति करती रही, वहीं भाजपा की आत्मा में हिंदू-हिंदी का मुद्दा रहा है.
भाजपा की राजनीति
लेकिन अब भाजपा का दायरा इससे आगे फैलता दिखता है. एक बहुसंख्यक पार्टी के तौर पर भाजपा की राजनीति कांग्रेस से भिन्न होगी.
कांग्रेस जहां दलितों के लिए बराबरी, मुस्लिमों के संदर्भ में धर्मनिरपेक्षता के पहिए पर सवार होकर राजनीति करती थी, वहीं भाजपा राष्ट्र राज की भावना पर सवार होकर राजनीति के रथ को आगे बढ़ाती दिखती है.
भारतीय जनता पार्टी ने भारत की विविधता को विकार की तरह देखना शुरू कर दिया है.

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और वो भारत को एकरूप, एक जैसे कानूनों से चलने वाले एक राष्ट्र के तौर पर देखना चाहती है जिसमें कश्मीर या उत्तर पूर्व भारत के लिए थोड़ी या किसी भी तरह की किसी रियायत की जगह नहीं नज़र आती.
भारतीय राजनीति
जहां विविधता की भावना गायब होने की तरफ़ झुकाव रहेगा वहीं भारत सिर्फ़ विकास और राष्ट्र राज के खंभों के बीच खड़ा रहेगा.
भारत अब जटिल साझा विकास की ओर बढ़ता देश नहीं बल्कि सिर्फ़ एक साधारण मशीन बनने की तरफ़ बढ़ता दिखता है.
चुनावी नतीजों से ऐसा आभास होता है कि भारतीय वोटर अब वोट डालते हैं तो एक पार्टी को सत्ता में मज़बूती से बने रहने का मौका देने के लिए.

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लोग चाहते हैं कि पार्टी सत्ता में टिकाऊ हो और शायद ये उम्मीद भी है कि निश्चित कार्यकाल देने पर सरकारों का कामकाज या कहें गवर्नेन्स को कारगर बनेगा.
मध्य वर्ग
ऐसा लगता है कि लोग चाहते हैं कि सरकारें काम करें, बाकी मूल्य, शब्दाडंबर, दूसरे विकल्प और नैतिकता किनारे रहें तो कोई परेशानी नहीं.
प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी को देखते हुए मध्यवर्ग जिसके लिए लोकतंत्र अस्तित्व से ज़्यादा व्यावहारिक अहमियत रखता है.
उसके बारे में अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि अब लोकतंत्र की सफलता भी महत्वपूर्ण बन चुकी है.

अब हमारा समाज रेस में दौड़कर ही संतुष्ट नहीं है बल्कि मोदी के आने के बाद हम सबमें रेस जीतने की चाहत बढ़ी है, और जीतने की चाहत हमें कम सहिष्णु और ज्यादा व्यावहारिक बनाती है.
भारत के प्रतीक
उत्तर प्रदेश के चुनाव में भाजपा की सुनामी, सोच में बदलाव का संकेत देते हैं.
मोदी सिर्फ एक नेता नहीं बल्कि उस भारत के प्रतीक बनकर उभरे हैं, जो हारने से थक चुका है और जिस भारत ने परिणाम हासिल करने का अपना नया मॉडल तैयार कर लिया है जिसका नाम है मोदी-राज.
यूपी में भाजपा को मिली बंपर जीत ने संकेत दे दिया है कि भले ही मीडिया को इस बदलाव को भांपने में समय लग रहा हो लेकिन मोदी अभी लंबी रेस दौड़ेंगे.

इस बीच बदलाव तक भाजपा विकास का अपना झंडा लेकर पहुंच सकेगी. मोदी भारत के भविष्य का प्रतीक बनकर उभरे हैं. संदेश साफ़ है कि मोदी को लंबी पारी खेलनी है.
अगले दस साल तक मोदी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के फ़ैसले भारत को दिशा देंगे.
उत्तर प्रदेश में भाजपा को मिले प्रचंड बहुमत ने साबित किया है कि भारत ने मोदी पर बिना पैसे वाला दांव लगाया है.
इस दांव में बहुसंख्यकों की तूती बोलेगी जबकि हाशिए पर रहने वाले हाशिए पर ही रहेंगे.
लोकतंत्र चुनावी रस्मों की विडंबना के ज़रिए एक सत्तावादी मोड़ ले रहा है, क्या ये अब भी समझना मुश्किल है?
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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