'यूपी में मायावती के पास ये आख़िरी मौका था!'

मायावती

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उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनावी नतीजों ने राजनीतिक पंडितों को तो चौंकाया ही है, सियासी पार्टियां भी ईवीएम का पिटारा खुलने से हैरान हैं.

मायावती ने प्रेस कांफ्रेंस में आरोप लगाया है कि ईवीएम में गड़बड़ी थी और किसी भी बटन पर वोट देने से वोट भाजपा को मिल रहे थे.

भाजपा ने इस चुनाव के लिए 265+ का लक्ष्य तय किया था और जिस तरह से मतगणना के रुझान नतीजों में बदल रहे हैं, उससे भाजपा की सीटों की संख्या लक्ष्य से कहीं आगे जाती दिख रही है.

नतीजों से जो पार्टी सबसे ज़्यादा हैरान और परेशान है वो है मायावती की बहुजन समाज पार्टी.

तो क्यो कारगर नहीं रही माया की सोशल इंजीनियरिंग.

अजय बोस, मायावती की जीवनी लेखक

बसपा के लिए ये नतीजे बेहद खराब हैं. मायावती ने तो ऐसे नतीजों की कल्पना भी नहीं की होगी.

बसपा समर्थक

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जो रुझान और नतीजे दिख रहे हैं, उनसे साफ़ है मायावती की सोशल इंजीनियरिंग नाकाम रही है. मायावती पिछले दो साल से चुनावी तैयारियों में लगी थी और उन्होंने मुसलमान और दलितों का साथ लेकर सत्ता तक पहुँचने का इरादा जताया था.

माया का ये फार्मूला हिट हो पाता इससे पहले ही समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस से हाथ मिला लिया और बहनजी की तरफ आने का मन बना रहे मुसलमान इस गठबंधन की तरफ छिटकने लगे.

वैसे तो 2009 के लोकसभा चुनाव के बाद से ही बसपा का राजनीतिक ग्राफ़ ढलान पर है. इन चुनावों में उसके पास वापसी का आख़िरी मौका था, लेकिन मायावती चूक गईं.

हालाँकि राजनीति में कोई फुल स्टॉप नहीं होता, लेकिन अब नहीं लगता कि प्रदेश की राजनीति में मायावती अपने दम पर कुर्सी तक पहुँच पाएंगी.

जो रुझान और नतीजे मिल रहे हैं उससे तो लगता है कि बसपा के साथ सिर्फ़ दलित ही रह गया और दूसरा कोई उससे नहीं जुड़ पाया.

मुसलमान वोटर्स

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दलित-मुसलमान समीकरण कागजों पर तो बहुत अच्छा लगता है, लेकिन असलियत ये है कि दलित और मुसलमान अधिकतर दोनों ही ग़रीब हैं और समाज में इनका दबदबा भी कम है.

2007 में मायावती दलित-ब्राह्मण समीकरण के साथ चुनावी मैदान में उतरी थी और उन्हें कामयाबी हासिल हुई थी.

मायावती को एडवांटेज ये है कि पार्टी में उनका और कोई नेता नहीं है.

लेकिन अब मायावती को अपनी रणनीति में बदलाव करना होगा. जिस तरह कांशीराम गठबंधन की राजनीति के हक़ में थे, मायावती को भी उसी राह पर चलना होगा.

प्रोफेसर विवेक कुमार

बसपा समर्थक

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नतीजों से जो तस्वीर बन रही है उससे तो साफ़ है कि लोगों ने बसपा की दलित-मुसलमान राजनीति को स्वीकार नहीं किया.

मायावती ने बड़े पैमाने पर मुसलमानों को वोट दिए, लेकिन वो मुसलमानों का विश्वास हासिल नहीं कर पाईं.

सर्वजन से अल्पसंख्यक के नारे को लोगों ने ठुकरा दिया. एक बात और मीडिया ने जिस तरीके से बसपा को नज़रअंदाज़ किया, उसने भी मायावती की हार में अहम भूमिका निभाई.

अनिल यादव, वरिष्ठ पत्रकार

बहुजन समाज पार्टी एक राजनीतिक पार्टी के तौर पर ख़त्म होने की कगार पर है.

उसमें विद्रोह की आवाज़ें बुलंद हो रही हैं, दलित वोट ख़िसक रहा है और मायावती की 'सोशल इंजीनियरिंग' काम नहीं कर रही है.

ये चुनाव हिन्दू बनाम मुसलमान था. बहुत सोच समझकर भारतीय जनता पार्टी ने एक भी मुसलमान प्रत्याशी को टिकट नहीं दिया. ये लहर की तौर पर दिखा नहीं, पर अंदर ही अंदर नरेंद्र मोदी के लिए समर्थन जुट गया.

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