राष्ट्रवाद की सरकारी परिभाषा रूढ़िवादी है?

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    • Author, सुमित गांगुली
    • पदनाम, विश्लेषक

फ्रेंच लेखक अल्बेयर कामू ने एक बार लिखा था, "मैं अपने देश को इतना प्यार करता हूँ कि मैं राष्ट्रवादी नहीं हो सकता."

कामू के ये शब्द भारत के मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में प्रासंगिक मालूम पड़ते हैं.

ऐसा लगता है कि भारत के सामाजिक कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी जो सबसे बड़ी बात भूल रहे हैं वह यह है कि जिन्होंने भारतीय संविधान के साथ घोखाधड़ी की थी, वे लिबरल डेमोक्रेट्स ही थे.

उनके लिए यह राष्ट्रवाद और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हो रही एक पेचीदा बहस के लिए मुश्किल समय है.

ऐसा लगता है कि भारतीय जनता पार्टी ने राष्ट्रवाद की परिभाषा को तय करने पर अपना एकाधिकार जमा रखा है.

उनसे अलग सोच रखने वाले बुद्धिजीवी, छात्र और सामाजिक कार्यकर्ताओं को उनका कोपभाजन होना पड़ रहा है.

इसका ताज़ा उदाहरण जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) के कुछ छात्रों को प्रताड़ित करने के रूप में हमारे सामने है.

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छात्रों पर 2001 में संसद पर हमला करने के मामले में दोषी अफज़ल गुरु की फांसी की बरसी मनाने का आरोप है.

इस मौके पर छात्रों के कथित रूप से 'भारत-विरोधी नारे' लगाने के भी आरोप हैं.

वाकई ज़्यादातर नारे ऐसे लगाए गए, जो आम नारे थे लेकिन इसकी वजह से उन्हें सरकार की कठोर कार्रवाई का सामना करना पड़ा.

अफज़ल गुरु को राष्ट्रपति के दया याचिका ख़ारिज करने के बाद 2013 में फांसी दी गई थी. उनकी मौत की बरसी मनाना शायद ही कोई अच्छा फ़ैसला हो.

इस आयोजन की सरकार सिर्फ़ निंदा कर सकती थी और मामले को रफ़ा-दफ़ा करती. लेकिन इसके बदले सरकार ने यूनिवर्सिटी कैंपस में पुलिस भेजी और छात्र संघ अध्यक्ष समेत दूसरे छात्रों को गिरफ़्तार किया.

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कोर्ट में पेशी के दौरान छात्र संघ अध्यक्ष को सार्वजनिक रूप से अपमानित किया गया. छात्रों की ओर से की जा रही बड़ी-बड़ी बातों की अच्छी तरह निंदा की जा सकती थी.

हालांकि सरकार ने इसकी जगह असहमित के स्वर दबाने के लिए औपनिवेशिक काल के राजद्रोह क़ानून का सहारा लिया.

इससे भी बुरा तब हुआ, जब एक अभियुक्त के न्याय पाने के अधिकार के प्रति असहिष्णुता दिखी. कोर्ट में ऐसा माहौल बनने दिया गया, जिसमें वकीलों के एक समूह ने अभियुक्त को मारा-पीटा.

इस भयावह कार्रवाई ने लोगों को दो खेमों में बांट दिया.

देश के प्रबुद्ध वर्ग का एक तबक़ा छात्रों के समर्थन में आ गया. दशकों से जेएनयू जो अपने वाम रुझानों के लिए जानी जाती रही है. अचानक वह बौद्धिक स्वतंत्रता और बहस का केंद्र बन गई.

यह दावे बड़बोले और साफ़ तौर पर झूठे हैं. पूर्व प्रधानमंत्री के समय जेएनयू ने किसी भी ऐसे वैचारिक दृष्टिकोण को बहुत कम जगह दी, जिनसे वैचारिक रुढ़िवादिता की बू आती है.

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हालांकि दूसरी प्रतिक्रिया ज़्यादा परेशान करने वाली है.

हो सकता है कि छात्रों को नियंत्रित करना मुश्किल हो और वह अब भी कहते हों कि उनका भाषण अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अंतर्गत आता है.

लेकिन ये बिल्कुल बेतुकी बात है कि इस तरह की बचकाना बातें भारतीय गणराज्य या भारतीय राष्ट्रवाद को चुनौती देती हैं.

अफ़सोस है, राष्ट्रवाद की इतनी संकीर्ण दृष्टि सत्तारूढ़ पार्टी की है.

राष्ट्रवाद की उसकी अवधारणा भारतीय संविधान में निहित उदारवादी लोकतांत्रिक मूल्यों को चुनौती देती है.

राष्ट्रवाद की जो परिभाषा सरकार दे रही है वह संकुचित और रूढ़िवादी है. यह सिर्फ़ बहुसंख्यक धार्मिक समूहों को तुष्ट करने के लिए और असहमति के स्वर दबाने वाला है.

यह कहना बिल्कुल बेईमानी होगी कि सिर्फ़ इसी सरकार ने अपने से असहमति रखने वाले विचार के प्रति ऐसी बेरुखी दिखाई है.

मक़बूल फिदा हुसैन

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कांग्रेस सरकार ने मशहूर चित्रकार मक़बूल फ़िदा हुसैन के अधिकारों की रक्षा के लिए क्या किया? या फिर बांग्लादेश की विवादास्पद लेखिका तसलीमा नसरीन के निर्वासन के मामले में क्या किया गया?

रूढ़िवादी मुस्लिम समूहों के दबाव में वे दयनीय बने रहे क्योंकि कुछ लोगों को तसलीमा के लिखे हुए पर आपत्ति थी.

ये असफलताएं पहले ही भारत के उदारवादी-लोकतांत्रिक चरित्र को नुक़सान पहुँचा चुकी हैं.

इस बात में कोई दो राय नहीं कि 20वीं सदी के आख़िरी दशक में भारत अपने उन उद्देश्यों से बहुत भटक गया, जिसकी परिकल्पना भारत और संविधान निर्माताओं ने की थी.

मौजूदा वक़्त में देश एक गहरे अनुदारवादी और अति-राष्ट्रवादी दौर से गुज़र रहा है.

वैचारिक मतभेदों की परवाह किए बिना हर राजनीतिक दल भारत में मूढ़ता को बढ़ावा दे रहा है.

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यहां तक कि संगठित वामदल भी जो अभी राष्ट्रवाद के नाम पर सरकार की कार्रवाइयों पर बरस रहे हैं, इससे पहले अलोकप्रिय और लीक से हटकर विचारों पर हो रहे हमले पर चुप्पी साधे थे.

यह विडंबना है कि बीजेपी के शोर-शराबा वाले राष्ट्रवाद की निंदा करने वाले अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे को खुद ही संकुचित कर रहे थे.

नतीजतन बीजेपी की निंदा करने की उनकी रणनीति नक्कारखाने में तूती की आवाज़ की तरह है.

बीजेपी जिसने संविधान में उल्लेखित बहुलतावाद और धर्मनिरपेक्षता के प्रति कभी भी बहुत आस्था नहीं दिखाई है, अब अपनी विचारधारा के ख़िलाफ़ सवाल उठाने वालों को आंखें दिखा रही है.

यह स्वभाविक है कि बहुत नहीं तो कुछ भारतीय बुद्धिजीवी कामू के इस शानदार विचार के साथ ज़रूर खड़े होंगे.

इन्हीं भावनाओं को भारतीय संविधान निर्माताओं ने अपनाया था.

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