यूपी: 312 विधायकों के बाद भी बीजेपी को सीएम की खोज?

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- Author, नितिन श्रीवास्तव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
उत्तर प्रदेश चुनाव के नतीजे 11 मार्च की दोपहर तक आ चुके थे और भाजपा को अप्रत्याशित जीत मिली थी.
करीब एक हफ्ते होने को आए और प्रदेश के 312 भाजपा विधायकों को इस बात की हवा तक नहीं है कि आखिर उनका सीएम कौन होगा.
ज़्यादातर विधायक पिछले तीन दिनों से लखनऊ में डेरा डाले हुए हैं और वो भी अटकलों के गर्म बाजार के बीच.
जिन लोगों के नाम अभी तक यूपी सीएम के लिए चर्चा में रहे हैं उन पर गौर फ़रमाइए.
केशव प्रसाद मौर्य, मनोज सिन्हा, योगी आदित्यनाथ और एक समय में संतोष गंगवार का भी.

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इन सभी में एक ही चीज़ समान है, सभी लोक सभा सांसद हैं.
तो क्या भाजपा के अपने 312 नए विधायकों में से एक भी सीएम उम्मीदवार बनने की दौड़ में शामिल नहीं.
अब ज़रा चर्चा में रहे नामों पर जुगत भिड़ाते हैं.
पहले बात केशव प्रसाद मौर्य की जिन्हें एक चौंकाने वाले फ़ैसले में चुनाव के काफी पहले प्रदेश की कमान दे दी गई.
मंशा साफ़ थी. भाजपा प्रदेश में पिछड़े वर्ष के मतदाताओं को टारगेट कर रही थी जो पहले उससे थोड़ा इतर रहे थे.
स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे पूर्व बसपाइयों के 'कमल वाले तालाब' में आने से सफलता भी मिलते दिखी और परिणाम ने इस पर मुहर भी लगाई.
लेकिन केशव मौर्य के अलावा भाजपा ने इन चुनावों में प्रदेश के दलित वोट बैंक पर भी नज़र गड़ा रखी थी.

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तमाम तरह की स्कीमों पर बात हुई, जिलाध्यक्षों की नियुक्ति से लेकर टिकट वितरण तक में उन पर 'नया भरोसा' दिखा.
नतीजा हुआ प्रदेश की 84 सुरक्षित सीटों मे से मात्र दो पर बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवारों की जीत.
भाजपा के पास 65 से भी ज़्यादा सुरक्षित सीटों पर जीत ने ज़ाहिर कर दिया कि दलित वोट बैंक पर भी ख़ासा असर पड़ चुका है.
शायद दलित, केशव प्रसाद मौर्य की दावेदारी से खुश न हो.
शायद प्रदेश के सवर्णों को भी ये बात नागवार गुज़रे.
यही कशमकश संतोष गंगवार के नाम पर हो सकती है.
उधर गाज़ीपुर सांसद मनोज सिन्हा के नाम पर न सिर्फ पार्टी से जुड़े पिछड़े वर्ग और दलित नेताओं बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाटों का भी विरोध झेलना पड़ सकता है.

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मनोज सिन्हा पूर्वी उत्तर प्रदेश के संख्या में कम लेकिन संपन्न कहे जाने वाले भूमिहार तबके से ताल्लुक़ रखते हैं.
योगी आदित्यनाथ के नाम पर पार्टी शुरू से ही थोड़ी 'असहज' रही.
इसके पीछे योगी की 'कट्टरवादी छवि' और 'आक्रामक तेवर' बताया जाता है.
हालांकि पार्टी ने उनसे ज़बरदस्त प्रचार करवाया लेकिन 'मंदिर' जैसे मुद्दों से दूरी बढ़ती भाजपा की 'न्यू इंडिया' स्कीम में शायद योगी फ़िट नहीं बैठते.
इतनी कशमकश के बीच नरेंद्र मोदी और अमित शाह को सीएम भी 'तय' करना है और असंतोष भी दूर रखना है.
नए चुने गए 312 विधायक भी शायद यही सोच रहे होंगे.
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