You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
फ़ौजी हो या चरमपंथी दोनों के जनाज़े में उमड़ते हैं लोग
- Author, माजिद जहांगीर
- पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
कश्मीर के एक गांव के दो लोग मारे जाते हैं. एक चरमपंथियों के हमले में मरता है तो दूसरा सुरक्षा बलों की गोली से.
भारत प्रशासित कश्मीर के अनंतनाग ज़िले के मढ़हामा के बासित रसूल डार पर हिज़बुल मुजाहिदीन से जुड़े होने का आरोप था.
23 साल के बासित रसूल की मौत बिजबिहाड़ा में एक एनकाउंटर के दौरान 14 दिसंबर, 2016 को हुई.
इसके महीने भर बाद ही 25 फरवरी, 2017 को इसी गांव के गुलाम मोहिउद्दीन राथर शोपियां में चरमपंथियों की गोली का निशाना बन गए.
बासित चरमपंथी बनने के बाद 53 दिनों तक ज़िंदा रहे जबकि लांस नाइक गुलाम मोहिउद्दीन 14 सालों से भारतीय सेना में काम कर रहे थे.
सेना का जवान
ये बात कम दिलचस्प नहीं है कि दोनों ही परिवार एक दूसरे के लिए ज़रा भी नफरत नहीं रखते.
लेकिन दोनों की मौत पर इस इलाके के लोगों की राय इनके परिवारवालों से हट कर है.
बासित के पिता गुलाम रसूल डार के साथ मेरी मुलाक़ात उनके घर पर हुई. घर में पसरी खामोशी उनकी जिंदगी की वीरानगी को बयान कर रही थी.
कांपती आवाज़ में गुलाम रसूल डार कह रहे थे, "मेरा बेटा मारा गया तो मेरी जिंदगी सूनी हो गई. सेना का जवान मारा गया तो उसके घरवाले भी इन्हीं हालात से दो चार हुए."
मैंने थोड़ा ठहरकर पूछा, क्या जवान या उसके परिवार से कोई शिकवा है?
वह कहते हैं, "मैं उनके जनाजे में शरीक नहीं हुआ पर मेरे दिल में किसी के लिए नफरत नहीं है. मारा गया जवान तो बस अपनी जिम्मेदारी निभा रहा था. फौजी और चरमपंथी दोनों ही अपनी विचारधारा के वजह से मारे जाते हैं. कभी ये मरता है तो कभी वो."
लांस नाइक गुलाम मोहुद्दीन का घर बासित के घर से क़रीब एक किलोमीटर दूर है.
मैं जब गुलाम मोहिउद्दीन के दो मंज़िला मकान में दाखिल हुआ तो परिवार के सभी लोग एक ही कमरे में बैठे थे.
उनके बड़े भाई फिरोज अहमद राथर से मैंने बासित रसूर डार के बारे में पूछा. फिरोज अहमद इस मसले पर ज्यादा बात नहीं करना चाहते.
उन्होंने कहा, "मैं किसी से नफरत नहीं करता. इधर भी कश्मीरी मारे जा रहे हैं, उधर भी कश्मीरी... हम तो फंस गए हैं इस जाल में..."
गुलाम मोहुद्दीन के पड़ोसी शकील अहमद दोनों के जनाजे में शरीक हुए थे.
बासित के आखिरी सफर में हजारों लोगों की भीड़ थी तो गुलाम मोहुद्दीन के जनाजे में भी बड़ी तादाद में लोग आए थे.
दोनों की मौत पर शकील अहमद कहते हैं, "कश्मीरी नौकरी के लिए फौज़ में जाते हैं. इसक असर अगर कश्मीर की आजादी की तहरीक पर पड़ता तो उनको जाने से रोका जाता. ठीक इसी तरह यहां वोट देना बंद होगा तो फिर फौज में भी कोई नहीं जाएगा."
शकील मानते हैं कि कश्मीर में बिना मकसद के कोई चरमपंथी नहीं बनता है.
उनका कहना था, "जब एक चरमपंथी मरता है तो उसे भी शहीद कहा जाता है. अब तो यहाँ पढ़े-लिखे नौजवान चरमपंथी बनते हैं, इंजीनीयरिंग की पढ़ाई के बाद लड़के चरमपंथी बनते हैं. बासित भी इंजीनियर ही था. फौज के जवान को भी लोग अच्छा मानते हैं लेकिन पहले चरमपंथी को."
इलाके के एक और निवासी सबज़ार अहमद तांत्रे दोनों की मौत पर कहते हैं, "बासित जिस काम के लिए निकले थे, उन्हें इसके लिए कोई मुआवजा नहीं मिलता था, जबकि गुलाम मोहुद्दीन को अपने काम के लिए तनख़्वाह मिलती थी."
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)