'हमारे आंसू पोंछने वाले तो हार गए'

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- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, लखनऊ
उत्तर प्रदेश चुनाव के नतीजों को मुसलमान किस तरह से देख रहे हैं. इसकी एक झलक पुराने लखनऊ में महसूस की जा सकती है. इस इलाके में मुसलमानों की ठीक-ठाक आबादी की रिहाइश है.
पिछली दफ़ा यहां से समाजवादी पार्टी के अभिषेक मिश्रा जीते थे.
यूपी की 16वीं विधानसभा में 60 से ज्यादा मुस्लिम विधायक थे, ये संख्या इस बार घटकर 24 रह गई है और राज्य में एक ऐसी पार्टी चुनकर सत्ता में आई है जिसने एक भी मुसलमान को टिकट नहीं दिया.
इमामबाड़ा के आसपास के इलाके में हमने जानने की कोशिश की लोग चुनावी नतीजों पर क्या राय रखते हैं. हमने अपने फ़ेसबुक लाइव के ज़रिए लोगों की राय जानी.
स्थानीय निवासी शाहिला कहती हैं, "इसको लेकर हम लोग मानसिक तौर पर परेशान हैं. जो भी हो रहा है गलत हो रहा है. हम लोगों के यहां से इतने अच्छे-अच्छे नेता खड़े हुए थे. जिनको हम लोग जानते थे, वो हम लोगों के आंसू पोंछते थे. लेकिन कोई नहीं जीत पाया."
भाजपा को वोट?
इस बार के यूपी चुनावों को लेकर कहा जा रहा है कि बीजेपी को मुसलमानों ने भी वोट दिया है. एक सोच रही है कि मुसलमान भाजपा को वोट नहीं देते हैं, इसलिए लिहाज से इसके उलट कोई बात एक तबके को चौंका रही है.
मुस्लिम विधायकों की कम संख्या और भाजपा की जीत पर मोहम्मद सैफ कहते हैं, "पूरी तरह से एकतरफा वोटिंग हो गई है. लोगों को इसका अंदाजा तक नहीं था."
हालांकि कई बार ऐसा होता है कि एक लहर मौजूद होती है और लोग इसे भांप नहीं पाते हैं.

मोहम्मद रिजवान कहते हैं, "जो नतीजे आने थे, वे आ चुके हैं. हमें बस इतनी उम्मीद है कि इलाके के पूर्व सपा विधायक ने जो विकास किया था, वैसा ही काम होता रहना चाहिए."
हिंदू हो या मुसलमान
लखनऊ के इस इलाके में चुनावी नतीजों को संदेह से देखने वाले कई लोग मिल जाते हैं.
स्थानीय होटल कारोबारी मोहम्मद उबैद आरोप लगाते हैं, "सरासर बेईमानी हुई है. सभी मुसलमानों ने वोट दिए हैं पर पता ही नहीं चला कि वोट किसे गया. सभी लोगों ने साइकिल को वोट दिया लेकिन पता नहीं बीजेपी कैसे जीत गई."
वैसे सवाल ये भी है कि विधायक हिंदू हो या मुसलमान, इससे क्या फर्क पड़ता है. विकास तो सबको चाहिए और ये कोई भी कर सकता है.

उबैद कहते हैं, "विकास की तरफ ध्यान होना चाहिए. सरकार आई है तो अच्छी तरह से काम करे और सबका विकास करे. हमें बस इतना ही चाहिए."
बीजेपी की जीत
यूपी के नतीजों को समझने की हर कोई अपनी-अपनी तरह से कोशिश में लगा हुआ है.
सीनियर जर्नलिस्ट कुलसुम मुस्तफा कहती हैं, "राजनीतिक पंडितों के लिए ये बड़ा मुश्किल चुनाव था. क्योंकि बहुत सी आहटें उन्हें मिली ही नहीं. वोटर खामोश रहा. पत्रकारों ने अपनी तीसरी आंख से इतना जरूर देखा था कि समाजवादी पार्टी के लिए ये चुनाव आसान नहीं है. लेकिन कम ही लोगों को बीजेपी की इतनी बड़ी जीत का अंदाजा रहा होगा. इस लिहाज से बीजेपी की जीत चौंकाने वाली है."

मुसलमानों को बीजेपी का टिकट न मिलने के सवाल पर कुलसुम का नजरिया औरों से अलग है. वे कहती हैं, "बीजेपी ने पूरे कैम्पेन में दो चीजें कीं. उन्होंने मुसलमानों को टिकट नहीं दिया लेकिन ऐसा नहीं है कि वे मुसलमानों के बीच नहीं गए. उन्होंने मुसलमानों को समझाया भी और टिकट भी नहीं दिया. इससे उनके दो काम हुए. टिकट न देने से ध्रुवीकरण हुआ और मुसलमानों के पास जाने से लोगों को लगा कि उनकी बात सुनी जा रही है. बीजेपी ने इस तरह से एक तीर से दो निशाने साध लिए."
तीन तलाक
हालांकि बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह इन सवालों पर हमेशा कहते रहे हैं कि टिकट देने से किसी तबके का सशक्तिकरण नहीं होता है बल्कि समुदाय के लिए क्या काम करते हैं, इससे इम्पावरमेंट होता है.
नौजवानों से बातचीत के दौरान ये महसूस हुआ कि युवा बीजेपी का डर दिखाने वाली राजनीति से प्रभावित नहीं हुए. उनके मुद्दे भी दूसरे नौजवानों की तरह हैं जिन्हें नौकरी और करियर के सवालों से जूझना पड़ रहा है.
कुलसुम का कहना है कि बगैर मुसलमानों के साथ बीजेपी को ये नंबर्स मिल ही नहीं सकते थे.
मुस्लिम मतजदाताओं में तीन तलाक के मुद्दे के असर से इनकार नहीं किया जा सकता है. कुलसुम भी इससे इत्तेफाक रखती हैं, "मोदी ने मुस्लिम महिलाओं का रुझान अपनी तरफ खींचा है. उन्होंने मुस्लिम औरतों से तीन तलाक के मुद्दे पर बात की."
फिलहाल इस सवाल पर जवाब देना मुश्किल है कि बीजेपी को कितने मुसलमानों ने वोट किया, खासकर महिलाओं और नौजवानों ने.
लेकिन कुलसुम बताती हैं, "बिना आंकड़ों के ये कहना जल्दबाजी होगी लेकिन ये सच है कि मुसलमानों ने अपना दिल बड़ा किया है. उन्होंने अपने हालात को बेहतर करने का बीजेपी को एक मौका दिया है."














