परंपरागत वोटों पर दाव कितना चल पाया यूपी चुनाव में?

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- Author, अंबिकानंद सहाय
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
सदियों पहले यूनानी दार्शनिक अरस्तू ने कहा था कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है. जी हां, समाज सर्वोपरि है. कोई भी मनुष्य राजनीतिक हो या ना हो, पर वह सामाजिक तानेबाने या ढांचों से ऊपर नहीं जा सकता.
कौम और कुनबे में बंटे समाज का अक्स वहां की राजनीति में भी दिखेगा. इन चाहे-अनचाहे हालातों में ही पैदा होती है 'कास्टबेस्ड आइडेंटिटी' पॉलिटिक्स.
आइडेंटिटी पॉलिटिक्स
तो आइए, 21 वीं सदी की 'आइडेंटिटी पॉलिटिक्स' के जगज़ाहिर कसौटियों के चश्मे से 2017 के यूपी चुनाव को देखते हैं.
चुनाव के अंतिम चरण का प्रचार थम चुका है. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तीन दिनों तक वाराणसी में जमे रहे.
बाबा विश्वनाथ के दर से लेकर बनारस की गलियों में दरवाज़े-दरवाज़े तक जाने के साथ साथ वे गढ़वा आश्रम जाकर गाय को चारा भी खिला आए.
ये एक बानगी है यूपी चूनाव में राजनीतिक दलों के खिसकते आधार की, नहीं तो जिस वाराणसी से प्रधानमंत्री सांसद बनकर पहुंचे हैं, वहां ख़ुद 18 केंद्रीय मंत्री और 50 सांसदों के साथ उनका पूरा अमला तैनात है.

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इसकी बुनियादी वजह तो यही है कि वाराणसी में सवर्ण मतदाता इस बार पार्टी से नाराज़ हो गए हैं. कुछ तो टिकट बंटवारे में हुई उपेक्षा से और कुछ वाराणसी की सूरत बीते तीन साल में भी नहीं बदलने की वजह से.
बड़ी-बड़ी लोक लुभावन बातों को छोड़िए. सूबे में सियासी दलों के जातिगत जनाधार की बात करें तो अगड़ी जातियां और बनिया समुदाय भाजपा की ताकत रही है. जबकि संपूर्ण दलित वर्ग बसपा की पहचान है. जहां तक समाजवादी पार्टी का सवाल है तो वह पिछले तीन दशकों से यादव-मुस्लिम वोटबैंक पर सवारी करती रही है.
सवाल है कि 2012 और 2014 के चुनावों के मुकाबले इस चुनाव में क्या कोई बदलाव दिखेगा? क्या तीनों प्रमुख सियासी पार्टियों के आधार रहे जातिगत वोटबैंकों में हलचल दर्ज होगी? और अगर पहले दोनों प्रश्नों का उत्तर हां है तो सूबे के चुनावी नतीजे क्या होंगे?

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पश्चिमी उत्तर प्रदेश से शुरुआत करें तो पहले-दूसरे चरण के इन चुनावों में जाट समुदाय भाजपा से बिदका नज़र आया. साथ ही नोटबंदी से हुई परेशानियों ने बनियों के एक वर्ग को भी भाजपा से मुंह मोड़ने पर मजबूर किया.
हालांकि अगड़ी जातियों पर भगवा रंग बरकरार दिखा. यहां यादव-मुस्लिम गठजोड़ मज़बूती से सपा-कांग्रेस गठजोड़ को थामे रहा. वहीं दलित वर्ग पर बसपा और मायावती का मोह हावी दिखा.

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पश्चिमी यूपी की 140 सीटों के चुनाव में एक और ख़ास बात दर्ज की गई. लगभग 51 सीटों पर निर्णायक भूमिका निभानेवाले जाटों ने अजीत सिंह की पार्टी राष्ट्रीय लोकदल का रुख कर लिया.
जबकि 2014 के लोकसभा चुनाव में आरएलडी खाता तक नहीं खोल पाई थी. जाटों की बदली मानसिकता की मूल वजह हरियाणा के जाट आरक्षण आंदोलन पर केन्द्र सरकार का ढुलमुल रुख है.
वैसे 2014 में मुज़फ्फ़रनगर दंगे की वजह से हुआ ध्रुवीकरण भी इस चुनाव में नहीं दिखा. तब दंगे की वजह से पूरी सियासी तस्वीर बदल गई थी और वोटर जातिगत दीवारें लांघकर भाजपा के पक्ष में खड़े हुए थे. लेकिन इस चुनाव में ये तमाम सियासी फ़ैक्टर नदारद हैं.
अब अगर रुहेलखंड और अवध की चुनावी तस्वीर को टटोलें तो इन इलाकों का राजनीतिक सामाजिक परिदृश्य और बदला हुआ नज़र आता है. इस इलाके को वैसे भी मुलायम बेल्ट कहते हैं.
वजह है कि यहां यादव और मुस्लिम का 'माई समीकरण' हमेशा से सपा के सियासी सवालों को सुलझाता रहा है, लगभग तीन दशकों से और इस चुनाव में भी.
मुलायम परिवार की आपसी उठापटक के बावज़ूद इस गठजोड़ में कोई गांठ नहीं उभरी. जहां मुलायम बेल्ट में बसपा के प्रदर्शन का सवाल है तो दलितों के अलावा मुस्लिम वोटरों का एक वर्ग भी हाथी पर सवार हुआ. और इसकी वजह शायद भाजपा को सियासी औकात बताने के अलावा बीएसपी के मुस्लिम उम्मीदवारों के प्रति लगाव भी रहा हो.

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बीजेपी को अगड़ी जातियों और बनियों के एक बड़े वर्ग के अलावा गैर यादव पिछड़ी जातियों का साथ मिला. इसलिए यहां ज़्यादातर सीटों पर मुकाबला त्रिकोणात्मक दिखा.
सूबे का चुनावी परिदृश्य और अधिक बदल जाता है जब आप बुंदेलखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश की ओर बढ़ते हैं. इन इलाकों में कई जगहों पर स्थानीय सामाजिक और जातिगत समीकरण राज्यव्यापी सियासी सरोकारों पर भारी नज़र आए.
सियासत के ज़मीनी विरोधाभासों को इन दृष्टांतों से समझिए. गोरखपुर में ब्राहाण और ठाकुरों का ईंट-घड़े का बैर जगज़ाहिर है. और शायद इसलिए योगी होने के बावजूद आदित्यनाथ की मौज़ूदगी गोरखपुर और उसके आसपास के ज़िलों में ब्राह्णों को भाजपा से दूरी बनाए रखने पर मजबूर करती है.

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अगर बात इलाहाबाद की करें तो यहां ब्राह्ण बनाम कायस्थों का दशकों से चला आ रहा संघर्ष भी भाजपा की चुनावी रणनीति में पलीता लगाता दिखता है. वहीं कुर्मी और यादवों की आपसी टकराहट भी कहीं ना कहीं सपा की पिछड़ों की राजनीति को मुंह चिढाती रही है.
जातिगत दुराव और दूरी के रोग से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का संसदीय क्षेत्र वाराणसी भी अछूता नहीं है. यहां ब्राह्णों के मुकाबले राजपूत सहित कई दूसरी जातियां हमेशा से राजनीति के दूसरे ध्रुव पर खड़ी रहती आई हैं.
तथाकथित पारंपरिक वोट बैंकों का इधर से उधर और उधर से इधर होना, इसे कोई समाजशास्त्री तो देख-समझ सकता है, लेकिन सतही राजनीतिक पर्यवेक्षक के लिए इस बारीकी को पकड़ना थोड़ा मुश्किल है.

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सूचना क्रांति के युग में आंधियां चलती हैं- टीवी स्क्रीन पर, विज्ञापनों में और प्रायोजित रैलियों में. कोई रोड शो देख लें, चाहे वो मोदी जी का हो या फिर अखिलेश-राहुल का. आंधियां ही आंधियां नजर आएंगी.
लेकिन ये भ्रामक है. दुर्गासप्तशती में एक श्लोक है-
"या देवी सर्व भूतेषु, भ्रांतिरुपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः"
जी हां, भ्रांति भी माता ही का स्वरुप है. जब भ्रांति होती है तो ख़ुशफ़हमी पैदा होती है. ख़ैर चलिए सियासी दलों और पंडितों की बिछाई खुशफ़हमियों की बिसात को उनके ही हवाले करते हैं और हम करते हैं 11 मार्च का इंतज़ार.
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