नज़रिया: गुरमेहर मामले से बीजेपी को फ़ायदा या नुकसान?

दिल्ली विश्वविद्यालय, छात्र विरोध

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    • Author, उर्मिलेश
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार

इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत के मौजूदा सत्ताधारी बोलने, प्रचार और जन-गोलबंदी में बेहद कामयाब हैं.

लेकिन यह कम दिलचस्प नहीं है कि अपने लिए और अपने विचार-दर्शन के लिए हर समय-हर जगह खुलकर बोलते रहने वाले हमारे सत्ताधारी अन्य लोगों को अपनी बात खुलकर बोलने नहीं देना चाहते, ख़ासकर ऐसे लोगों को जिनके विचार उनसे नहीं मिलते.

और ऐसे विचारों को दबाने के लिए वे किसी हद तक जा सकते हैं. दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा गुरमेहर कौर के मामले में उन्होंने ऐसा ही किया.

रामजस कॉलेज के सेमिनार को लेकर 22 फरवरी को जिस तरह सत्ताधारी दल और आरएसएस से सम्बद्ध अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने कैंपस मे उपद्रव किया, पुलिस की मौजूदगी में छात्रों-शिक्षकों को पीटा और पुलिस या तो मूकदर्शक रही या उनका सहयोग करती नज़र आई, वह एक भयानक घटनाक्रम था.

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लेकिन बात यहीं नहीं रुकी. 20 वर्षीया गुरमेहर को 'देशद्रोही', 'गुनहगार' और 'प्रदूषित जहरीला दिमाग' बताने की संघ-भाजपा नेताओं में मानो होड़-सी लग गई.

युद्धोन्माद का माहौल

जबकि गुरमेहर का गुनाह महज इतना भर था कि उसने एक प्लेकार्ड के साथ अपना वीडियो जारी किया जिसमें लिखा, 'मैं एबीवीपी से नहीं डरती.'

इस वीडियो के वायरल होते ही भाजपा-संघ-एबीवीपी समर्थकों के बीच खलबली मच गई. कुछ ही देर बाद उसका पिछले साल का एक और वीडियो खोज लिया गया जिसमें उसने लिखा था कि 'उसके पिता को पाकिस्तान ने नहीं युद्ध ने मारा.'

इस पोस्टर की भी एक कहानी है. गुरमेहर ने यह पिछले साल उस समय जारी किया जब देश में युद्धोन्माद का माहौल घहराया था. भारत-पाक के शासक लगातार एक-दूसरे को टकरावभरी मुद्रा में कोस रहे थे या आगे के लिये ताल ठोक रहे थे.

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गुरमेहर ने दोनों देशों के बीच शांति के पक्ष में अभियान चलाने का फैसला किया. जंतरमंतर पर आयोजित युद्धोन्माद-विरोधी एक रैली में भी उसने भाग लिया.

धर्म और युद्ध

उसने अपने एक वीडियो में इस बात का उल्लेख किया कि उसके पिता मनदीप सिंह भारतीय सेना में कैप्टन थे और करगिल की जंग में शहीद हुए थे.

बचपन में उसे 'पाकिस्तान' और 'मुस्लिम' नाम तक से चिढ़ हो गई थी पर मां ने जब दुनिया-समाज, धर्म और युद्ध का मतलब समझाया तो उसे अपने बचपने और गलती का एहसास हुआ और फिर युद्ध के ख़िलाफ़ शांति के पक्ष में तन कर खड़ी हो गई.

तब से वह जब भी मौका आता है, शांति की तरफदारी करती है और करती रहेगी. बात, बस इतनी सी थी. लेकिन केंद्र की मोदी सरकार के मंत्रियों, वरिष्ठ भाजपा नेताओं, हरियाणा सहित कई राज्यों के मंत्रियों और एबीवीपी के नेताओं ने उस 20 साल की छात्रा के ख़िलाफ़ मोर्चा-सा खोल दिया.

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इनके बयानों के समानांतर सोशल मीडिया में गुरमेहर के खिलाफ 'ट्रॉलिंग' शुरू हो गई. किसी ने बलात्कार की धमकी दी तो किसी ने जान से मार डालने की. उनकी मां, उसके पिता और खानदान पर भी टिप्पणियां की गईं.

'भारत माता'

अचरज कि ऐसी टिप्पणियां कथित तौर पर उस पक्ष से हो रही थीं, जो अपने माथे पर देशभक्ति का बड़ा सा टीका लगाये रखता है, जो 'भारत माता' या 'राष्ट्रगान' के कथित अपमान होने के पर किसी की भी पिटाई कर देता है, जो शहीदों के नाम पर राजनीतिक गोलबंदी के सर्वाधिक कर्मकांड करता है.

लेकिन इस बार संघ-परिवार से जुड़े संगठनों और सत्ताधारी नेताओं का फ्री-स्पीच विरोधी यह अभियान बहुत जल्दी ही औंधे मुंह गिर पड़ा. सामने एक शहीद की बहादुर और समझदार बेटी जो खड़ी थी.

केंद्रीय गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू तक को अपना पुराना बयान बदलना पड़ा. पहले उन्होंने 'गुरमेहर के दिमाग के प्रदूषित होने' की बात कही थी.

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शायद उनसे ही प्रेरित होकर हरियाणा के वरिष्ठ भाजपा नेता और मंत्री अनिल विज ने कहा, 'गुरमेहर की बातों का समर्थन करने वाले पाकिस्तान-समर्थक हैं, उन्हें पाकिस्तान भेज देना चाहिए.'

सोशल मीडिया

क्रिकेटर वीरेंद्र सहवाग और अभिनेता रणदीप हुड्डा सहित कुछ गैर-राजनीतिक लोगों ने भी भाजपा-एबीवीपी नेताओं की तरह बयानबाजी की. आम जनता और समाज से प्रतिकूल प्रतिक्रिया देखकर अब वे सब खामोश हैं.

पंजाब से लेकर बंगाल, यूपी से लेकर बिहार, तक आम समाज के बीच गुरमेहर की बातों का जबर्दस्त असर पड़ा और लोगों ने युद्ध के खिलाफ शांति की उसकी पक्षधरता को एक सकारात्मक सोच के रूप में लिया.

इसकी अभिव्यक्ति मुख्यधारा मीडिया से भी ज्यादा सोशल मीडिया में दिखाई दे रही है. सिनेमा, क्रिकेट, सियासत और विभिन्न समुदायों से सम्बद्ध कई बड़ी हस्तियों ने गुरमेहर के पक्ष को मानवीय और सकारात्मक सोच बताया.

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अरुण जेटली और मनोहर पर्रीकर जैसे मंत्री अपने 'राजनीतिक परिवार' की भद्द पिटती देख बहस को नयी दिशा देने की कोशिश कर रहे हैं. दोनों ने कहा कि देश में 'अभिव्यक्ति की आजादी' की सीमा पर बहस होनी चाहिए.

प्रेस फ्रीडम

जेटली और पर्रीकर सरकार के वरिष्ठ और प्रभावशाली मंत्रियों में हैं. जेटली तो छात्रनेता भी रहे हैं, गुरमेहर जिस दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ती है, उसके छात्रसंघ के अध्यक्ष रह चुके हैं.

आश्चर्य है, आज वह अभिव्यक्ति की आजादी की सीमा तय करने पर बहस चाहते हैं. क्या उन्हें नहीं मालूम कि प्रेस फ्रीडम और अभिव्यक्ति की आजादी के मामले में भारत का वैश्विक रिकॉर्ड बेहद दरिद्र है.

सन 2016 के वैश्विक सूचकांक में भारत प्रेस फ्रीडम के मामले में 180 देशों की सूची में 133 वें नंबर पर था.

दूसरी बात, जेटली और पर्रीकर सिर्फ अभिव्यक्ति की आजादी की सीमा तय करने पर क्यों बहस चाहते हैं, इस आजादी पर हो रहे हमलों की सीमा, उसके लिये जिम्मेदार तत्वों पर रोक, उनके द्वारा की जा रही हिंसा और उनके उपद्रव पर बहस क्यों नहीं चाहते!

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