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पलनीसामी को रिमोट से कैसे कंट्रोल करेंगी चिनम्मा
- Author, टी. आर. रामचंद्रन
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
तमिलनाडु के नए मुख्यमंत्री पलनीसामी को बहुमत साबित करने के लिए 15 दिनों की मोहलत दी गई है. अन्नाद्रमुक विधायक दल के नेता पलनीसामी आसानी से बहुमत साबित कर भी लेंगे. उनकी दिक्कतें इसके बाद शुरू होंगी.
दूसरी तरफ, पनीरसेल्वम को जिन विधायकों पर भरोसा था, वे साथ नहीं आ पाए. इस लिहाज से पलनीसामी की राह में फिलहाल कोई बाधा नहीं दिखती लेकिन सत्ता संभालने के बाद जिन तकलीफों से उन्हें सामना करना पड़ सकता है, उस पर निर्भर करेगा कि ये सरकार कितने दिन चलेगी.
पलनीसामी के साथ सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि वे एक कठपुतली सरकार की अगुवाई करने जा रहे हैं. सत्ता उनके पास ज़रूर होगी, लेकिन इसकी चाबी किसी और के पास रहेगी. इसकी वजहें भी हैं. सुप्रीम कोर्ट से दोषी करार दी गईं शशिकला बेंगलुरु जेल में हैं, लेकिन वे अपने पति और रिश्तेदारों के जरिए डोर खींचती रहेंगी.
शशिकला की हैसियत
चाहे वे कहीं भी रहें. तमिलनाडु की राजनीति में इस परिवार को मन्नारगुड़ी माफिया के नाम से जाना जाता है. हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि अन्नाद्रमुक महासचिव के तौर पर शशिकला की हैसियत को अभी तक किसी ने चुनौती नहीं दी है.
जब तक इस स्थिति में बदलाव नहीं होता है, पलनीसामी को सरकार चलाने में कई दिक्कतों का सामना करना होगा. इस बीच शशिकला अपने भतीजे दिनाकरन को पार्टी में उपमहासचिव के तौर पर वापस ले आई हैं. हम माने या न मानें लेकिन पार्टी के ढांचे में ये एक ताक़तवर ओहदा है.
माना जा रहा है कि पलनीसामी को अपने कैबिनेट में दिनाकरन को जगह देनी पड़ सकती है. मतलब ये कि पार्टी महासचिव अपने विश्वासपात्र के जरिए मुख्यमंत्री पर नजर रखेंगी. शशिकला को लेकर तमिलनाडु में एक माहौल बना दिया गया दिखता है कि वो जयललिता की करीबी और भरोसेमंद थीं. उनको कोई हाथ नहीं लगा सकता.
अन्नाद्रमुक काडर
लेकिन हक़ीक़त तो ये है कि अन्नाद्रमुक काडर में शशिकला को लेकर उतनी उत्सुकता नहीं है जो अम्मा को लेकर रहती थी. ये बात साफ तौर पर उस वक्त जाहिर हो गई जब शशिकला पोएस गार्डन से बेंगलुरु आत्मसमर्पण करने के लिए गईं. उन्हें विदा करने के लिए सौ लोग भी नहीं आए थे.
हमने ये भी देखा है कि जब जयललिता बेंगलुरु जा रही थीं तो लाखों की संख्या में लोग पोएस गार्डन पर इकट्ठा हुए थे. जयललिता जब बेंगलुरु में दाखिल हुईं तो वहां क़ानून व्यवस्था की समस्या पैदा हो गई थी. लेकिन सवाल उठता है कि मौजूदा सूरतेहाल में पनीरसेल्वम के लिए क्या रास्ता बच रहा है.
कुछ लोग तो ये भी कह रहे हैं कि वे गलतफहमी में थे, लेकिन ये बात कहना ठीक नहीं होगा. शायद पनीरसेल्वम ये सोच रहे थे कि वे अम्मा के पहले वफादार हैं और इससे पहले अम्मा ने दो बार उन्हें अपनी जगह दी थी. अतीत में जयललिता को दो बार मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ी थी.
करिश्माई नेतृत्व
उन्होंने पनीरसेल्वम को दो बार 'कार्यवाहक' मुख्यमंत्री बनाया था. तीसरी बार जब जयललिता का देहांत हुआ तब फिर वो 'कार्यवाहक' मुख्यमंत्री बन गए. अब वो जमाना नहीं रहा कि महज वफादारी के बूते पनीरसेल्वम को सारे विशेषाधिकार मिल जाते. एक चीज याद रखनी होगी कि जयललिता पिछले ही साल मई में चुनकर आई थीं.
अभी एक साल भी पूरा नहीं हुआ है. विधायकों के सामने पांच साल का कार्यकाल है. किसी मध्यावधि चुनाव की सूरत में विधायकों को कोई गारंटी नहीं है कि उन्हें दोबारा टिकट मिलेगा. दूसरी बात की भी कोई गारंटी नहीं है कि अन्नाद्रमुक सत्ता में वापसी करेगी.
चूंकि जयललिता का करिश्माई नेतृत्व नहीं होगा और शशिकला उनकी भरपाई करने में समर्थ नहीं हैं. और सबसे अहम बात सुप्रीम कोर्ट के फैसले से जुड़ी है. कोर्ट के फैसले से पार्टी पर बहुत बड़ा धब्बा लगा है कि और आने वाले समय में इससे भी मुश्किल पैदा होगी.
द्रविड़ पार्टियां
तमिलनाडु की राजनीति में भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टी की कोई भूमिका नहीं दिखती. हां, एक नई पार्टी के लिए जगह बनती जरूर दिख रही है क्योंकि अन्नाद्रमुक विभाजन के नाजुक मोड़ पर खड़ी है. अन्नाद्रमुक की फिलहाल जो स्थिति है, उसमें किसी मध्यावधि चुनाव की सूरत में उसका सत्ता में वापस लौटना मुश्किल दिखता है.
अम्मा के लिए सहानुभूति में पड़े वोट भी ज्यादा मददगार होने से रहे. तमिलनाडु की राजनीति में पिछले 40 साल से दो द्रविड़ पार्टियों ने शासन किया है. अगले चुनावों में जयललिता की गैरमौजूदगी में अन्नाद्रमुक की हालत नाजुक और कमजोर हो जाएगी. पार्टी पहले से ही बंटी हुई दिख रही है.
एक धड़ा शशिकला के साथ है तो दूसरे की अगुवाई पनीरसेल्वम कर रहे हैं. बीजेपी ज़रूर इन सब के बीच अपनी जगह बनाना चाहती है, लेकिन तस्वीर साफ नहीं दिखती कि वे क्या कर पाएंगे. रही बात कि अगले 15 दिनों के भीतर क्या कोई नाटकीय घटनाक्रम हो सकता है, तो मेरे ख्याल से जितने नाटक होने थे, वे हो चुके हैं.
पनीरसेल्वम के तरफ आने वाले विधायकों ने अपना स्टैंड क्लियर कर दिया है, लेकिन कोई भी विधायक अपनी 'नौकरी' नहीं गंवाना चाहेगा. कोई विधायक इस्तीफा देने नहीं जा रहा है. सभी विधायक अपना कार्यकाल पूरा करना चाहेंगे. हालांकि राजनीति में किसी भी संभावना को खारिज करना कभी भी ठीक नहीं होता.
(बीबीसी संवाददाता निखिल रंजन से बातचीत पर आधारित)
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