तमिलनाडु: 'असली खेल तो अब शुरू हुआ है'

    • Author, इमरान कुरैशी
    • पदनाम, बेंगलुरु से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

शशिकला की सज़ा पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद तमिलनाडु में राजनीतिक स्थिरता की फ़ौरन वापसी के कोई आसार नहीं दिख रहे हैं.

कोर्ट के फ़ैसले ने वास्तव में ऐसे कई सवाल पैदा कर दिए हैं जो जयललिता की अन्नाद्रमुक पार्टी को विभाजन की ओर ले जाते हैं.

कोर्ट के फ़ैसले के बावजूद 'अडिग' शशिकला ने अपने पुराने वफ़ादार ई के पलनीसामी को अपनी जगह पार्टी के विधायक दल के नेता के ओहदे पर बिठा दिया.

पलनीसामी के सामने अब केयरटेकर मुख्यमंत्री पनीरसेल्वम की चुनौती से निपटना है.

पनीरसेल्वम होंगे चुनौती

अन्नाद्रमुक में चल रही मौजूदा उथल-पुथल का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि फ़िलहाल विधायकों के रुख़ के बारे में पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता.

कितने विधायक शशिकला ख़ेमे को छोड़कर पनीरसेल्वम का दामन थामेंगे, कोई नहीं जानता.

ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के चेन्नई चैप्टर के निदेशक एन सत्यमूर्ति का कहना है, "पनीरसेल्वम के पक्ष में आने वाले विधायकों की संख्या इस बात पर निर्भर करेगी कि राज्यपाल विद्यासागर राव सरकार बनाने के लिए पहले किसे बुलाते हैं और विधानसभा में बहुमत साबित करने के लिए किसे कहेंगे."

विधानसभा में शक्ति परीक्षण का मतलब ये हुआ कि पलनीसामी या पनीरसेल्वम को 234 सदस्यों वाले सदन में कम से कम 118 विधायक अपने पक्ष में दिखाने होंगे.

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक के एन अरुण सत्यमूर्ति की बात से सहमत दिखते हैं.

अरुण कहते हैं, "असली खेल तो अब शुरू हुआ है. शशिकला की ग़ैरमौजूदगी में पहले से ज़्यादा विधायक पनीरसेल्वम के पक्ष में अपनी वफ़ादारी बदल सकते हैं. हकीकत में कहा जाए तो पार्टी के विभाजन के आसार पहले के बनिस्पत ज़्यादा बढ़ गए हैं."

कार्यकर्ता आधारित पार्टी है अन्नाद्रमकु

अन्नाद्रमुक में और भी ऐसी बातें हैं जो बेहद अहम हैं. अन्नाद्रमुक भारत की दूसरी वामपंथी पार्टियों की तरह ही कार्यकर्ता आधारित पार्टी है.

ये कार्यकर्ताओं का दबाव ही था कि तीन मंत्रियों और तकरीबन आधा दर्जन विधायकों ने शशिकला खेमे को छोड़कर पनीरसेल्वम का साथ दिया.

हालांकि ये संख्या इतनी बड़ी भी नहीं है कि इससे शशिकला खेमा हिल जाए.

पार्टी विधायकों पर शशिकला खेमे के कंट्रोल की एक वजह ये भी है कि चुनाव के दौरान पार्टी टिकटों के वितरण के वक्त जयललिता की तबीयत ख़राब थी.

पार्टी के एक नेता नाम न बताने की शर्त पर कहते हैं कि यह बात हर किसी को पता है कि शशिकला और उनके पति नटराजन ने टिकट बंटवारे में अम्मा पर असर डाला था.

सत्यमूर्ति कहते हैं कि शशिकला और उनके ख़ेमे के लिए पार्टी पर कंट्रोल रखना आसान नहीं है.

वे कहते हैं,"ये काफ़ी मुमकिन है कि आख़िरी दौर में पार्टी टूट जाए. चुनाव आयोग पार्टी का निशान ज़ब्त भी कर सकती है."

दूसरी तरफ़ अरुण कहते हैं कि पार्टी में मतभेद इस हद तक बढ़ चुके हैं कि अब किसी तरह का समझौता मुमकिन नहीं दिखता है.

वरिष्ठ पत्रकार एस मुरारी का नज़रिया इससे अलग है.

वह कहते हैं कि पार्टी और विधायक दल की कमान संभालने के बाद से शशिकला और उनके परिवार के खिलाफ लोगों की बहुत नाराज़गी है.

मुरारी ने कहा, "ये धड़ा आने वाले समय में कोई बड़ी भूमिका नहीं निभा सकता है. उनकी अहमियत धीरे-धीरे खत्म हो जाएगी. जैसे ही सत्ता उनके हाथ से फिसलेगी फिर कुछ रह नहीं जाएगा."

शशिकला की संभावनाएं

तो प्रश्न उठता है कि क्या शशिकला की सारी संभावनाएं खत्म हो गई हैं?

सत्यमूर्ति का कहना है, "शशिकला की संभावनाएं खत्म हो सकती हैं लेकिन उनके परिवार या उनके गुट की नहीं. इन लोगों ने पार्टी में जड़ें जमा ली हैं. जब तक जयललिता जीवित थीं, ये खामोश थे लेकिन अब वे अपने वजूद का एहसास करा रहे हैं."

अरुण कहते हैं कि सबकुछ विधानसभा में शक्तिपरीक्षण के नतीजे पर निर्भर करेगा.

फ्रंटलाइन पत्रिका के वरिष्ठ पत्रकार आर के राधाकृष्णन कहते हैं, "फिलहाल शशिकला भले ही असरदार हों लेकिन वक्त के साथ-साथ उनके गुट की ताक़त कम होगी."

थोड़े लफ्जों में कहें तो अन्नाद्रमुक की समस्याएं फ़िलहाल शुरू ही हुई हैं.

राज्यपाल क्या फैसला लेंगे, तमिलनाडु की राजनीति की दशा और दिशा इसी से तय होगी.

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