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पनीरसेल्वम, शशिकला में अम्मा का वारिस कौन?
- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
तमिलनाडु के सत्तारूढ़ दल एआईएडीएमके में उत्तराधिकार की रस्साकशी के बीच पैदा हुए राजनीतिक संकट ने लोगों के बीच भी बहस छेड़ दी है.
पार्टी की प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री जे जयललिता के निधन के बाद उनकी क़रीबी शशिकला को उत्तराधिकारी मान लिया गया था.
मगर सूबे में मौजूदा राजनीतिक संकट ने लोगों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है.
हालांकि शुरू में ऐसा लगता रहा कि शशिकला के साथ पार्टी खड़ी हुई है.
मगर मुख्यमंत्री ओ पनीरसेल्वम की बग़ावत ने उन्हें ऐन वक़्त में राजनीतिक रूप से स्थापित भी कर दिया है और सूबे में चल रहे राजनीतिक संकट को और भी पेचीदा बना दिया है.
अब एआईएडीएमके के कुछ और नेताओं ने भी उनके समर्थन में बोलना शुरू कर दिया है.
पनीरसेल्वम को हमेशा ही सुर्ख़ियों से दूर रहने वाले शख़्स के रूप में देखा जाता रहा है. तमिलनाडु की राजनीति पर नज़र रखने वालों को लगता है कि महत्वकांक्षी नहीं होना और कम बोलने के उनके स्वभाव की वजह से ही वो जे जयललिता के विश्वासपात्र बने रहे.
यही कारण है कि जब जब जयललिता संकट में आईं और उन्हें अपनी गद्दी छोड़नी पड़ी तो उन्होंने पनीरसेल्वम को ही मुख्यमंत्री बनाया.
सबसे पहले वो 21 सितंबर 2001 से लेकर 1 मार्च 2002 तक तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने. फिर 29 सितंबर 2014 से लेकर 23 मार्च 2015 तक वो मुख्यमंत्री बने जब जयललिता को आय से अधिक सम्पत्ति के एक मामले में सज़ा सुनाई गई थी.
जयललिता के निधन के बाद वो तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने थे. लेकिन शशिकला को विधायक दल का नेता चुने जाने के बाद उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया था. लेकिन अब उन्होंने ये कहकर कि उन पर दबाव डालकर इस्तीफ़ा दिलवाया गया था, राजनीतिक भूचाल ला दिया है. तमिलनाडु के कार्यवाहक मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने जयललिता की मौत की जांच के आदेश भी दिए हैं.
उधर, शशिकला ने पार्टी के सभी विधायकों को महाबलीपुरम के पास एक रिज़ॉर्ट में रखा है ताकि वो कहीं टूट कर ना चले जाएं. मगर मौजूदा राजनीतिक संकट ने हालात को और भी पेचीदा बना दिया है.
फ़िलहाल सभी विधायक शशिकला के साथ ज़रूर नज़र आ रहे हैं, मगर पनीरसेल्वम की बग़ावत के बाद अब इन विधायकों के चुनावी क्षेत्रों से लोगों ने कहना शुरू कर दिया है कि वो शशिकला का साथ न दें.
पार्टी की प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री जे जयललिता के निधन के बाद उनकी क़रीबी रह चुकीं शशिकला को स्वाभाविक उत्तराधिकारी माना जा रहा था. मगर शशिकला के उत्तराधिकार के दावों को सबसे पहले जयललिता की भतीजी दीपा जयकुमार ने चुनौती दी.
सोशल मीडिया पर भी लोगों के बीच बहस चल रही है और लोग भी यही सवाल कर रहे हैं कि जब जयललिता संकट में आईं तो उन्होंने शशिकला को क्यों मुख्यमंत्री नहीं बनाया? उन्होंने पनीरसेल्वम को ही चुना. यही सवाल पनीरसेल्वम भी कर रहे हैं.
वहीं पार्टी के कुछ नेता भी सवाल उठाने लगे हैं कि शशिकला ना विधायक हैं और ना ही पार्टी में कभी उनकी कोई बड़ी हैसियत ही रही है.
इसलिए पार्टी के संविधान के हिसाब से भी उन्हें महासचिव का पद नहीं दिया जा सकता है चूंकि यह नियुक्ति संगठन की चुनाव की प्रक्रिया के बाद ही पूरी की जा सकती है.
चेन्नई में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार के वी लक्ष्मना कहते हैं कि पनीरसेल्वम ने बग़ावत कर ख़ुद का राजनीतिक क़द काफ़ी ऊंचा कर लिया है जबकि उनकी इससे पहले तक कोई ख़ास हैसियत नहीं थी.
वो कहते हैं : "सिर्फ बग़ावत ही नहीं, जल्लीकट्टू पर प्रतिबन्ध को लेकर भड़के जन आक्रोश को बतौर मुख्यमंत्री उन्होंने सम्भाला, उससे भी उनकी पहचान बनी. मौजूदा राजनीतिक संकट के दौरान उन्होंने मौनव्रत रखने के बाद एक तरह से बम फोड़ दिया जिससे उनकी लोकप्रियता भी बढ़ी. वो आम आदमी के मुख्यमंत्री के रूप में ख़ुद की अलग छवि बनाने में काफी हद तक कामयाब भी रहे."
कुछ अन्य राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि तमिलनाडु के राज्यपाल का राजनीतिक संकट के दौरान सूबे से दूर रहना इस बात का भी संकेत है कि भारतीय जनता पार्टी भी पनीरसेल्वम को ही जयललिता के उत्तराधिकारी के रूप में देखना चाहती है.
मगर भाजपा में भी नेताओं की इसपर अलग-अलग राय है. राज्यसभा के सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने तो तमिलनाडु के राज्यपाल के सूबे में नहीं रहने की खुले तौर पर आलोचना की है.
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