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ELECTION SPECIAL: '2000 के दंगे ने बनारसी साड़ी उद्योग की कमर तोड़ दी'
- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, आजमगढ़ से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
आज़मगढ़ के मुबारकपुर क़स्बे में 70 साल के महबूब मुक़ादम से जब हमारी मुलाक़ात हुई तो वो एक खाट पर बैठे उर्दू का अख़बार पढ़ रहे थे. पहले बनारसी साड़ियों की बुनाई करते थे, लेकिन अब बूढ़ी आँखें साथ नहीं देतीं सो हुनर रखते हुए भी काम न करने को मजबूर हैं.
बातचीत के दौरान बड़ी निराशा के साथ बोले, "साल 2000 के फ़साद ने यहां के साड़ी उद्योग को बर्बाद करके रख दिया. हुनरमंद लोग भुखमरी की कगार पर पहुंच गए हैं. या तो अपना हुनर छोड़कर कमाने के लिए बाहर जाएं या फिर यहां घंटों काम करने के बावजूद दो जून की रोटी के लिए भी मोहताज रहें."
मुबारकपुर और मऊ का साड़ी उद्योग बनारसी साड़ी के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है. मुबारकपुर क़स्बे के भीतर लगभग सभी घरों में लूम यानी साड़ी बुनने की घरेलू मशीनें लगी हैं जिनमें कारीगर साड़ियों की बुनाई करते हैं.
साल 2000 में शिया-सुन्नी समुदाय के बीच हुए भीषण दंगों की आग में यहां का साड़ी उद्योग बुरी तरह से प्रभावित हुआ. महबूब मुक़ादम की ही तरह दूसरे स्थानीय लोगों का भी कहना है कि दंगे के बाद साड़ी की बिक्री के लिए बना स्थानीय बाज़ार पूरी तरह से बंद हो गया.
क़स्बे में ही रहने वाले 60 साल के वलीउल्लाह अंसारी एक अँधेरे से कमरे में एक गड्ढेनुमा जगह के भीतर लकड़ी की पटरी लगाकर बैठे थे और अपने बेटे के साथ एक ख़ूबसूरत साड़ी बुनने में तल्लीन थे. ऊपर एक बल्ब लगा था, लेकिन जल नहीं रहा था क्योंकि बिजली नहीं आ रही थी.
पूछने पर उन्होंने बताया, "एक साड़ी बुनने में क़रीब 10 दिन लगते हैं. तीन लोग मुश्तकिल लगते हैं तब जाकर दस दिन में एक साड़ी बनकर तैयार होती है. एक आदमी इसे मुक़म्मल बुनता है, दूसरा कढ़ाई करता है और तीसरा नरी-ढोटा भरता है यानी ज़री का काम करता है."
वलीउल्लाह अंसारी के मुताबिक वो दस-बारह साल के थे तभी से साड़ियों की बुनाई का काम कर रहे हैं. पहले वो अपने पिता की मदद करते थे, अब उनके बेटे-पोते इसमें मदद करते हैं.
उन्होंने बताया कि एक साड़ी की बुनाई पर उन्हें महज़ दो हज़ार रुपए मिलते हैं जो तीन लोगों की दस दिन की मज़दूरी होती है. ये साड़ियां बाज़ार में जाकर हज़ारों रुपए में बिकती हैं. वलीउल्लाह अंसारी की ही तरह यहां हज़ारों मज़दूर साड़ियां बुनकर अपना गुज़र-बसर कर रहे हैं.
आज़मगढ़ का मुबारकपुर और मऊ ज़िले के कई इलाक़े बनारसी साड़ियों की बुनाई के लिए मशहूर हैं. महज़ कुछ हज़ार रुपए में तैयार ये साड़ियां वाराणसी के बाज़ार में पहुंचकर ऊंचे दामों पर बेची जाती हैं जबकि इन्हें बनाने वाले कारीगर पीढ़ियों से तंगहाली में जी रहे हैं.
महबूब मुक़ादम का कहना था कि इस पेशे से पहले उन्हें कोई बहुत दिक़्क़त नहीं थी, "लोग और भी काम करते थे और ये पार्ट टाइम काम भी हुआ करता था. घर के सभी सदस्य मिलकर ठीक-ठाक कमाई कर लेते थे.
इसके अलावा मुबारकपुर में साड़ियों का बाज़ार लगता था जहां तमाम बुनकर अपनी बुनी हुई साड़ियों का अच्छा दाम भी पा जाते थे. लेकिन 2000 के दंगों के बाद यहां बाज़ार लगना बंद हो गया और बुनकर सिर्फ़ मज़दूर बनकर रह गए."
मुबारकपुर में ही पॉवरलूम चलाने वाले बिलाल अंसारी ने हमें उस बाज़ार को दिखाया जहां साड़ियों की बड़ी-छोटी तमाम दुकानें थीं. अब ये दुकानें या तो बंद हैं या फिर साड़ियों की बजाय वहां दूसरी चीज़ों की दुकानें खुल गई हैं.
कुछ ऐसा ही हाल मऊ ज़िले के बुनकरों का है. हालांकि मुबारकपुर में ज़्यादातर बुनकर हाथ से ही बुनाई करते हैं जबकि मऊ के बुनकर पॉवरलूम यानी मशीन से बुनाई करते हैं. मशीन से बुनी साड़ियों में नायलॉन का इस्तेमाल होता है और ये सस्ती होती हैं जबकि हाथ से बुनी साड़ियों में रेशम के धागे इस्तेमाल होते हैं और ये बहुत महँगे होते हैं.
साड़ियों की बिक्री के लिए यहां तमाम सोसायटी बनी हुई हैं. मुक़ादम बताते हैं कि सोसायटी के सदस्य में बुनकर कम और दूसरे समुदाय के लोग ज़्यादा हैं. उनके मुताबिक सरकारी मदद और योजनाएं भी इन्हीं सोसायटी के माध्यम से आती हैं और अक़्सर बुनकरों को उनका लाभ नहीं मिल पाता.
मुक़ादम एक और बात बताते हैं, "ऐसा नहीं है कि बुनाई के धंधे में सिर्फ़ अंसारी ही लगे हैं. इसमें कुरैशी भी लगे हैं, पंडितजी, ठाकुर साहब, मल्लाहों, चौहानों और दूसरी जातियों के यहां भी ये काम होता था. केवल ख़ान-पठान के यहां नहीं होता था. लेकिन बमकांड के बाद अब सिर्फ़ अंसारी ही इस पेशे में रह गए हैं क्योंकि उनके पास रोज़ी का कोई दूसरा ज़रिया नहीं है."
मुबारकपुर में ही स्थानीय व्यवसायी फ़िरोज़ अहमद बताते हैं, "ये हमारी बदनसीबी है कि बनारसी साड़ियां बनती सब मुबारकपुर में हैं, लेकिन सिर्फ़ बिकने की जगह के कारण इन्हें बनारसी कहा जाता है. हमें बेचने की कोई सुविधा नहीं है. अभी एक विपणन केंद्र बना भी है, लेकिन शुरू नहीं हुआ है."
स्थानीय बाज़ार न होने की एक वजह यहां के ख़राब रास्ते और बुनियादी सुविधाओं के न होने को भी बताया जाता है. फ़िरोज़ अहमद कहते हैं कि इन साड़ियों का स्थानीय स्तर पर बाज़ार बहुत बड़ा है भी नहीं क्योंकि ज़्यादातर साड़ियां यहां से बाहर ही बिकती हैं.
मऊ ज़िले में साठ के दशक में राज्य सरकार ने बुनकरों के रहने और अपना लूम बनाने के लिए एक कॉलोनी बनाई थी जिसे आजकल बुनकर कॉलोनी के ही नाम से जाना जाता है. अहमद अज़ीम इसी बुनकर कॉलोनी में रहते हैं.
उन्होंने बताया कि कताई मिल और स्वदेशी कॉटन मिल के चलते बहुत से लोगों को रोज़गार मिला था, लेकिन उनके बंद होते ही बहुत से लोग बेरोज़गार हो गए. यहां पॉवरलूम चलाने के लिए बिजली बहुत कम आती है.
बुनकरों का कहना है कि बिजली आने का समय तय नहीं है इसीलिए यदि रात में भी बिजली आती है तो उन्हें उठकर अपने काम पर लगना पड़ता है.
स्थानीय पत्रकार वीरेंद्र चौहान कहते हैं, "स्थानीय और कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने का सरकारें चाहे जितना दावा करें, ये हुनरमंद लोग इनका लाभ लेने से लगभग पूरी तरह से वंचित हैं. लोगों का साफ़तौर पर कहना है कि एक तो उन्हें इनकी जानकारी बहुत कम मिल पाती है दूसरे सरकारी जटिलता और अधिकारियों की कार्यशैली मनोबल को ही तोड़ देती है."
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