मुख़्तार अंसारी: माफ़िया या मसीहा?

    • Author, समीरात्मज मिश्र
    • पदनाम, लखनऊ से बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

उत्तर प्रदेश का पूर्वांचल इलाक़ा अपराध और राजनीति के गठजोड़ के लिए 'कुख्यात' इलाक़ों में गिना जाता है. 'अपराध का राजनीतिकरण' या 'राजनीति का अपराधीकरण' जैसे चर्चित मुहावरों की इसी कड़ी में ग़ाज़ीपुर के रहने वाले मुख़्तार अंसारी का भी नाम आता है.

मुख़्तार अंसारी मऊ से लगातार चार बार विधायक हैं. एक बार बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर, दो बार निर्दलीय और एक बार ख़ुद की बनाई पार्टी क़ौमी एकता दल से.

उनके एक और भाई सिबगतुल्ला अंसारी भी उसी पार्टी से विधायक हैं. जबकि एक अन्य भाई अफ़ज़ाल अंसारी सांसद रह चुके हैं.

यह विडंबना ही है कि स्वाधीनता आंदोलन के दौरान कांग्रेस पार्टी में शीर्ष नेताओं में गिने जाने वाले जिन मुख़्तार अहमद अंसारी ने राजनीति की शुरुआत की, शताब्दी बीतते-बीतते उनके परिवार को एक माफ़िया नेता परिवार के रूप में राजनीति में स्थायित्व और पहचान मिल पाई.

मुख़्तार अंसारी कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और अपने ज़माने में नामी सर्जन रहे डॉक्टर एमए अंसारी के परिवार से आते हैं. यही नहीं, मुख़्तार अंसारी के पिता भी स्वतंत्रता सेनानी और कम्युनिस्ट नेता थे.

शुरुआत मुख़्तार अंसारी ने भी छात्र राजनीति से की, लेकिन जनप्रतिनिधि बनने से पहले उनकी पहचान एक दबंग या माफ़िया के रूप में हो चुकी थी. 1988 में पहली बार उनका नाम हत्या के एक मामले में आया. हालांकि इस मामले में उनके ख़िलाफ़ कोई पुख़्ता सबूत पुलिस नहीं जुटा पाई, लेकिन इस घटना से मुख़्तार अंसारी चर्चा में आ गए.

1990 के दशक में ज़मीन के कारोबार और ठेकों की वजह से वह अपराध की दुनिया में एक चर्चित नाम बन चुके थे. मुख़्तार अंसारी पर आरोप है कि वो ग़ाज़ीपुर और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई ज़िलों में सैकड़ों करोड़ रुपए के सरकारी ठेके आज भी नियंत्रित करते हैं.

अपराध के साथ ही 1995 में मुख्तार अंसारी ने राजनीति की मुख्यधारा में कदम रखा. 1996 में वो मऊ सीट से पहली बार विधानसभा के लिए चुने गए. उसी समय पूर्वांचल के एक अन्य चर्चित माफ़िया गुट के नेता ब्रजेश सिंह से मुख़्तार अंसारी के गुट के टकराव की ख़बरें भी ख़ासी चर्चा में रहीं.

बताया जाता है कि अंसारी के राजनीतिक प्रभाव का मुकाबला करने के लिए ब्रजेश सिंह ने बीजेपी नेता कृष्णानंद राय के चुनाव अभियान का समर्थन किया. राय ने 2002 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में मोहम्मदाबाद से मुख्तार अंसारी के भाई अफ़ज़ाल अंसारी को हराया था.

बाद में कृष्णानंद राय की हत्या हो गई और उसमें मुख़्तार अंसारी को मुख्य अभियुक्त बनाया गया. कृष्णानंद राय की हत्या के सिलसिले में उन्हें दिसंबर 2005 में जेल में डाला गया था, तब से वो बाहर नहीं आए हैं. उनके ख़िलाफ़ हत्या, अपहरण, फिरौती सहित कई आपराधिक मामले दर्ज हैं.

2007 में मुख्तार अंसारी और उनके भाई अफ़जाल बहुजन समाज पार्टी में शामिल हो गए. बीएसपी प्रमुख मायावती ने मुख़्तार अंसारी को ग़रीबों के मसीहा के रूप में पेश किया था. बीएसपी के टिकट पर ही मुख़्तार ने वाराणसी से 2009 का लोकसभा चुनाव लड़ा मगर वह बीजेपी के मुरली मनोहर जोशी से 17,211 मतों के अंतर से हार गए.

लेकिन 2010 तक आते-आते बहुजन समाज पार्टी से उनके रिश्ते ख़राब हो गए और फिर उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया. बीएसपी से निकाले जाने के बाद तीनों अंसारी भाइयों मुख्तार, अफ़ज़ाल और सिबगतुल्लाह ने 2010 में खुद की राजनीतिक पार्टी कौमी एकता दल का गठन किया.

माफ़िया से नेता बने मुख्तार अंसारी की पहचान उनके इलाक़े में एक अलग रूप में भी होती है. उनके विधानसभा क्षेत्र के लोग बताते हैं कि इलाक़े के विकास के लिए वो अपनी विधायक निधि से भी ज़्यादा पैसा ख़र्च करते हैं.

यही नहीं, इलाक़े में लोग तमाम विकास कार्यों को गिनाते भी हैं जो मुख़्तार अंसारी ने कराए हैं. इसके अलावा ज़रूरतमंद लोगों की मदद के भी तमाम क़िस्से उनके बारे में सुने जा सकते हैं.

फ़िलहाल उन्होंने एक बार फिर बहुजन समाज पार्टी का दामन थामा है और बीएसपी नेता मायावती ने यही कहते हुए उन्हें और उनके परिवार को पार्टी में जगह दी है कि मुख़्तार अंसारी के ख़िलाफ़ जो कुछ भी मामले हैं वो राजनीतिक द्वेष की वजह से हैं. मायावती ने ये भी आश्वासन दिया है कि निर्दोष पाए जाने पर उनके साथ न्याय ज़रूर किया जाएगा.

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