ट्रेन हादसा: 'पेड़ों पर मंजर लौटे पर वो कभी नहीं लौटेंगे'

गांववाले

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    • Author, मनीष शांडिल्य
    • पदनाम, पटना से बीबीसी हिन्दी के लिए

''समझ नहीं आ रहा है कि अपने घायल रिश्तेदारों को संभालें या लाश जलाने का इंतजाम करें.'' साजन धामी ने बीबीसी से अपनी परेशानी कुछ इस तरह बयान की.

रविवार रात करीब दस बजे जब उनसे फ़ोन पर बात हुई तब साजन दिन-भर में पहली बार अनाज का दाना पेट में डालने की तैयारी कर रहे थे.

साजन ने बताया, ''आज जब पोस्टमॉर्टम के बाद मुझे लाशें सौंपी जा रही थी तो मैंने अस्पताल वालों से कहा कि अभी शव अपने ही पास रखें. वे फिलहाल मान भी गए हैं.''

साजन के सात रिश्तेदार शनिवार की रात दुर्घटनाग्रस्त हुई हीराखंड एक्सप्रेस में मारे गए. मरने वालों में उनकी दादी, भाई, भाभी, बहन और तीन बच्चे शामिल हैं.

साजन फिलहाल ओडिशा के रायगढ़ा में हैं. साजन के दो परिजन इस हादसे में गंभीर तौर पर घायल भी हुए हैं.

रेल हादसा

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उनके परिवार के पंद्रह लोग शनिवार रात करीब नौ बजे भवानीपटना जंक्शन पर विजयनगर जाने के लिए हीराखंड एक्सप्रेस के जनरल डब्बे में सवार हुए थे.

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इमेज कैप्शन, घटना की खबर के बाद मृतकों के घर के पास जुटे लोग

साजन बेगूसराय जिले के बारा पंचायत के मिर्जापुर गांव के रहने वाले हैं. उनका परिवार देश भर में घूम-घूम कर मधुमक्खियों के छत्ते से शहद उतारने का काम करता है.

साजन रविवार को एक साथ सात शवों का अंतिम संस्कार करने की हालत में नहीं थे. उन्होंने बताया कि उनके कुछ रिश्तेदार सोमवार तक रायगढ़ा पहुंचे जिसके बाद वे अपने परिजनों का अंतिम संस्कार कर पाए.

साजन के मृतक परिजनों का अंतिम संस्कार

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इमेज कैप्शन, मृतक परिजनों का अंतिम संस्कार

हादसे के बाद साजन के गांव मिर्जापुर में मातम का माहौल है. इस गांव के तरुण कुमार रोशन ने बताया, ''साजन ने रविवार सुबह फोन कर बताया कि मेरा परिवार ख़त्म हो गया है.''

तरुण साजन के पड़ोसी भी हैं. वे बताते हैं कि हादसे की ख़बर मिलने के बाद रविवार को कई घरों में चूल्हा नहीं जला.

तरुण के मुताबिक हादसे का शिकार हुए लोग काम के सिलसिले में करीब दो महीने पहले ही गांव से निकले थे.

मारे गए लोगों में से एक का मिर्ज़ापुर गाँव में बंद पड़ा माकन

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इमेज कैप्शन, मारे गए लोगों में से एक का मिर्ज़ापुर गाँव में बंद पड़ा मकान

तरुण कहते हैं,''आम और लीची के पेड़ो में मंजर आने के बाद धीरे-धीरे ये परिवार हर साल अपने गांव लौट आता था. इन पेड़ों पर तो फिर से मंजर आने लगे हैं लेकिन मेरे गांव के सात लोग अब कभी लौट कर नहीं आएंगे.''

पिछले तीन महीनों में ये दूसरा मौका है जब बिहार के एक ही इलाके से इतनी बड़ी संख्या में लोग ट्रेन हादसे का शिकार हुए हैं.

20 नवंबर को कानपुर के पास हुए जिस रेल हादसे में 140 से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई थी, उनमें से 21 लोग पटना सिटी के एक ही चैक शिकारपुर इलाके के थे.

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