पटना हादसा: वो जिसने अकेले निकाली 20 लाशें

वीडियो कैप्शन, पटना: गंगा में नाव हादसे के बाद कैसे निकाली गई लोगों की लाश?
    • Author, सीटू तिवारी
    • पदनाम, पटना से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

तक़रीबन 50 साल के राजेंद्र सहनी हीरो बन गए हैं. 14 जनवरी की शाम से लेकर रविवार दोपहर तक उनका फ़ोन हर पल बजता रहा.

राजेंद्र गोताखोर है और 14 जनवरी को पटना के सबलपुर दियारे के नाव हादसे में उन्होंने कम से कम 20 लाशें निकालीं.

वो बताते है, "हम घर पर आग सेंक रहे थे. तभी प्रशासन की तरफ से फ़ोन आया कि जल्दी आओ. हम पहुंचे अपनी टीम के साथ. उसके बाद शनिवार रात में 20 और रविवार की सुबह चार लाशें निकालीं. इसके अलावा कितना कपड़ा, जूता, स्वेटर निकाला उसकी कोई गिनती ही नहीं."

गोताखोर

इमेज स्रोत, Seetu Tiwari

राजेंद्र सहनी 35 साल से गोताखोरी का काम कर रहे है. उनकी टीम में कुल 25 गोताखोर हैं.

राजेंद्र का दावा है कि गंगा के इसी हिस्से से उन्होंने करीब 6,000 लोगों को जिंदा या मृत निकाला है.

सबलपुर के नाव हादसे में उन्होंने देसी तकनीक का इस्तेमाल करके लाशें निकालीं. इस तकनीक में वो बंसी का इस्तेमाल करते हैं. बंसी यानी प्लास्टिक की एक रस्सी जिसके एक सिरे पर कांटा लगा होता है.

राजेंद्र बताते हैं, "बंसी को एक बार पानी में डाल दीजिए तो कोई भी लाश इससे बच नहीं सकती."

लाश ढ़ूंढ़ने में इस्तेमाल होने वाली बंसी

इमेज स्रोत, Seetu Tiwari

पटना में शनिवार हुए नाव हादसे में अब तक 24 लाशें निकाली जा चुकी हैं.

एनडीआरएफ़ का दावा है कि रविवार की सुबह जो चार लाशें निकली, वो उनके डीप डाइवर्स ने निकालीं. हालांकि राजेंद्र सहनी और उनकी टीम का दावा है कि ये लाशें उन्होंने ही निकाली हैं.

एनडीआरएफ़ के कमांडेंट विजय सिन्हा

इमेज स्रोत, Seetu Tiwari

इमेज कैप्शन, एनडीआरएफ़ के कमांडेट विजय सिन्हा

एनडीआरएफ़ के कमांडेट विजय सिन्हा ने बीबीसी को बताया, "हमें हादसे की शाम साढ़े सात बजे ख़बर मिली और हम यहां आठ बजे पहुंचे थे. हमने सुबह चार लाश निकाली है और इससे पहले किसने क्या किया, इस पर कमेंट करना मुश्किल है."

वहीं आपदा प्रबंधन विभाग के एडीएम शशांक शेखर सिन्हा राजेंद्र साहनी के दावे की तस्दीक करते हैं.

वो कहते है, "राजेंद्र सहनी हमारे मुख्य गोताखोर हैं. जो भी बॉडी रिकवर हुई, उन्होंने रिकवर की. हां, इतना ज़रूर है एनडीआरएफ और एसडीआरएफ ने मदद की जिनको बाद में कॉल करके बुलाया गया."

इस बीच ये सवाल उठना लाज़मी है कि आख़िर इतनी ट्रेनिंग और सरकारी खर्च के बाद हादसे के दौरान स्थानीय गोताखोर ही क्यों ज्यादा प्रभावी साबित होते है?

आपदा प्रबंधन के अधिकारी

इमेज स्रोत, Seetu Tiwari

आपदा प्रबंधन पर लंबे समय से रिपोर्टिंग कर रहे वरिष्ठ पत्रकार कुलभूषण कहते हैं, "ऐसा लगता है जैसे ये लोग सिर्फ़ लाश गिनने के लिए हैं, लोगों को बचाने या निकालने के लिए नहीं हैं. ये फोर्स जो मोटा वेतन हर माह उठाती है उनको फिर से ट्रेनिंग की ज़रूरत है. हादसे दर हादसे ये लोग हमारे हीरो नहीं बनते बल्कि राजेंद्र सहनी जैसा कोई हमारा हीरो बनता है."

महज़ 243 रु की दैनिक मज़दूरी पर काम कर रहे राजेंद्र सहनी भी नाराज हैं. वो बताते है कि सरकार के पास उनका करीब तीन लाख रुपया बकाया है, लेकिन सरकार उनको उनकी मजदूरी नहीं दे रही है.

वो कहते हैं, "लाश निकालना आसान है, लेकिन सरकार के पास से पैसे निकालने में चप्पल घिस जाती है. वक्त पड़ता है तो हम काम करते हैं. बाकी तो ये सारी फोर्स दिखावे की है, खानापूर्ति करने के लिए. इनको पानी की समझ कहां?"

राजेंद्र सहनी अपने बेटों के साथ

इमेज स्रोत, Seetu Tiwari

राजेंद्र के दो बेटे संदीप और छोटू भी उनकी राह पर हैं. वो अपने पिता से गोताखोरी के गुर सीख रहे हैं.

लेकिन संदीप कहते है, "सरकारी नौकरी मिली तो करेंगे वर्ना ये फ्री फंड का काम कितने दिन करेंगे."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)