बर्फ़ की इमारतें खड़ी करने वाला कश्मीरी

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- Author, माजिद जहांगीर
- पदनाम, श्रीनगर से बीबीसी हिंदी के लिए
बर्फ़ पर कामयाबी की दास्तान लिखने वाले कश्मीर घाटी के 30 वर्षीय ज़ोहूरदीन लोन साल 2017 में अंतरराष्ट्रीय स्नो स्कल्पचरिंग चैंपियनशिप में भारत की नुमाइंदगी करेंगे.
उनके साथ भारत के तीन और खिलाड़ी रवि प्रकाश, सुनील कुशवाहा और मृदुल कुमार इस चैंपियनशिप में भाग ले रहे हैं. उनके साथियों ने अपनी टीम का नाम "कैलिस्टो आर्ट एंड कल्चर" रखा है.
इंटरनेशनल स्नो स्कल्पचर ऑर्गनाइज़िंग कमिटी की ओर से होने वाली इस चैंपियनशिप में दुनियाभर से कुल 16 टीमें भाग लेंगी. चैंपियनशिप अमरीका के ब्रेकेनरिज़ में होगी.
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जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी से फ़ाइन आर्ट्स में डिग्री हासिल करने वाले ज़ोहूर भारत प्रशासित कश्मीर के ज़िले बारामुला के सिंगपोर गांव से हैं. उन्हें बचपन से ही बर्फ़ से कुछ न कुछ बनाने का शौक़ था.
वह कहते हैं, "एक बार कश्मीर में काफ़ी बर्फ़ पड़ी थी, तो मैंने एक छोटी सी कलाकृति बनाई थी. फिर सोचा कि मैं एक कलाकार हूं. क्यों न मैं इसी कला का इस्तेमाल करके कुछ बड़ी आकृति बनाऊं. फिर मैंने घर में ही एक बड़ी सी आकृति बनाई, जो मुझे काफ़ी अच्छी लगी."
साल 2014 में गुलमर्ग में हुए "स्नो फ़िएस्टा 2014" में ज़ोहूर ने बेहतरीन प्रदर्शन किया और पहले स्थान पर रहे.

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वह बताते हैं, "वहां हमने 40 फ़ीट का कश्मीरी समोवार (कश्मीरी भाषा में चाय का बर्तन) बनाने के अलावा कश्मीर की संस्कृति को अपनी कला का फ़ोकस बनाया था."
ज़ोहूर के मुताबिक़ बेहतर उपकरण न होने के बावजूद उन्होंने अच्छा प्रदर्शन किया. एक ड्राइवर के बेटे ज़ोहूर के परिवार में किसी का इस कला से वास्ता नहीं रहा है. इस समय ज़ोहूर दिल्ली में एक ग्राफ़िक डिज़ाइनर हैं.
ज़ोहूर को उनकी फ़नकारी को आगे बढ़ाने के लिए अभी तक सरकार या किसी निजी संगठन की ओर से कोई मदद नहीं मिली है. इस वजह से एक वक़्त तो वे यह कला ही छोड़ने वाले थे.
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"मैंने कई बार सोचा कि इस काम को छोड़ दूं. किसी का सपोर्ट नहीं मिल रहा था. फिर सोचा कि नहीं मुझे दिन-रात मशक़्क़त करनी होगी और यही चीज़ मुझे आगे ले जाएगी. जब मैंने फ़ाइन आर्ट्स में एडमिशन लिया था, तो घर वाले काफ़ी परेशान थे. वो पूछते थे कि इस कोर्स से तुम आगे क्या करोगे क्योंकि कश्मीर में अभी आर्ट के बारे में आम लोगों में जानकारी नहीं है. मगर अब घरवालों को लगता है कि मैंने सही फ़ैसला लिया था."
ज़ोहूर को मलाल है कि भारत में ख़ासी बर्फ़ पड़ने के बावजूद स्नो स्कल्पचरिंग जैसी कला को तवज्जो नहीं दी जाती.
उनका कहना है कि भारत में अगर इस कला को अपनाया जाएगा, तो मुझे यक़ीन है कि यह कला बहुत से लोगों के भीतर छिपे हुए फ़न को बाहर लाएगी, लेकिन भारत में ऐसा नहीं हो रहा है.
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