#100Women:'बादलों के बीच' पढ़ने वाली लड़की

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भारत में अनूठे ढंग से पढ़ाई शुरू करने वाले पहले समूह में गौरी चिंदरकर भी थीं. वे उस समय 13 साल की थीं और सातवीं में पढ़ती थीं.
महाराष्ट्र के दूर दराज के इलाक़े में स्थित एक छोटे से गांव में रहने वाली गौरी अपने स्कूल जाती थीं और इंटरनेट के ज़रिए दुनिया के दूसरे इलाक़ों में बैठे लोगों से जुड़ जाती थीं. आज वे विश्वविद्यालय में पढ़ती हैं और उन दिनों को याद कर कहती हैं कि वह एक "सुंदर सफ़र" था.
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सेल्फ़ ऑर्गनाइज़्ड लर्निंग एनवायरनमेंट (एसओएलई या सोल) साल 2009 के मई महीने में गौरी के स्कूल में शुरू किया गया था.
गौरी कहती हैं -
मैं उस समय सातवीं में पढ़ती थी और इसके पहले अब तक सिर्फ क्लासरूम में बैठ कर पारंपरिक रूप से पढ़ाई करने के तरीके से ही परिचित थी. 'सोल' ने पुराने तरीके से होने वाली पढ़ाई का ढांचा एक झटके से तोड़ कर गिरा दिया और इंटरएक्टिव ढंग अपनाया.

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इसके लिए ख़ास तौर पर एक प्रयोगशाला बनाई गई थी. इसमें दीवार पर पूरे आकार के शीशे लगाए गए थे ताकि शिक्षक देख सकें कि क्या हो रहा है. हमारे लिए काफ़ी जगह छोड़ी गई थी ताकि हम वहां आराम से घूम फिर सकें. सबसे अहम तो यह था कि वहां लगे कंप्यूटर इंटरनेट से जुड़े हुए थे. ऐसा लगता था मानो वे हमें बुला रहे हों.
मैं महाराष्ट्र के एक छोटे से गांव में रहती थी, जहां निहायत ही सीमित सुविधाएं थीं. हालांकि मैंने कंप्यूटर और इंटरनेट के बारे में सुन रखा था, लेकिन कभी उनका इस्तेमाल नहीं किया था.
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कक्षा में मिलने वाले "पाठ" ज़्यादातर "ग्रैनी सेसन्स" के रूप में होते थे. यह दरअसल दुनिया के अलग अगल हिस्सों में बैठे मेंटर या गुरू से स्काइप के ज़रिए होने वाली बातचीत होती थी.
लेकिन ये मेंटर या गुरू पेशेवर शिक्षक नहीं होते थे. वे ग्रैनी यानी दादी अम्मा से लेकर सरकारी अफ़सर, डॉक्टर, आर्किटेक्ट या और भी कुछ हो सकते थे. वे हमसे हर तरह की बातचीत करते थे. इससे हमें अपनी पंहुच से बाहर की दुनिया के बारे में जानकारी मिलती थी.

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वे शिक्षक कम और दोस्त अधिक होते थे. हम जो चाहें उनसे पूरी आज़ादी से कह सकते थे. उन्हें हमें पढ़ाना नहीं था, बल्कि हमारी उत्सुकता को जगाना था ताकि हम ख़ुद उनके जवाब खोजें और जो जानकारी मिलें, उन्हें दूसरों के साथ साझा करें.
बीच के लोग हमें अपनी बात कहने के लिेए प्रोत्साहित करते थे. इसके पहले हमारी पढ़ाई लिखाई स्थानीय भाषा मराठी में होती थी. नई व्यवस्था में जब सत्र शुरू हुआ, हम अंग्रेज़ी की सिर्फ़ वर्णमाला और कुछ कविताएं जानते थे. हमें अंग्रेज़ी बोलना नहीं आता था और हम ग्रैनी सेसन्स के बाहर कहीं अंग्रेज़ी सुनते भी नहीं थे.
लेकिन धीरे धीरे नई भाषा का ख़ौफ़ दूर होने लगा. मैं अंग्रेज़ी में ही सोचने, पढ़ने और बोलने लगी. मैं समझने लगी कि अपनी बात दूसरों तक कैसे पंहुचाई जाए. मैं दूसरों के विचारों की इज्ज़त करना सीख गई.
अमूमन हम बच्चे ही तय करते थे कि हमें क्या बात करनी है. समय के अंतर की वजह से मैं अमरीका में बैठी अपनी ग्रैनी एन थॉमस से बात करने के लिए सुबह के साढ़े छह बजे स्कूल पंहुच जाती थी. कई बार तो सेसन्स तब हुए जब एन अपने परिवार के साथ समुद्र के किनारे छुट्टियां मना रही होती थीं.

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मैंने सबसे बेहतरीन तरीके से तमाम चीजें सीखीं, क्योंकि मुझे किसी ने "पढ़ाया" नहीं, बल्कि मैंने तजुर्बे से सीखा. उस उम्र में ही मैंने यह तय कर लिया कि मुझे क्या बनना था. ऐसा नहीं होता तो मैं भी तमाम दूसरे बच्चों की तरह रिज़ल्ट का इंतजार करती और स्कूल से निकलने के बाद ही कोई फ़ैसला कर पाती.
रिज़ल्ट का ग्रेड और ज्ञान, दो बिल्कुल अलग अलग चीजें हैं. सिलेबस पर ध्यान देकर अच्छा ग्रेड हासिल किया जा सकता है. लेकिन व्यवहारिक ज्ञान किसी सवाल का जवाब ख़ुद ढूंढने से ही मिल सकता है. यह ग्रेड से अधिक अहम है.
रिज़ल्ट के नंबर के बल पर कुछ ख़ास चीजों के लायक आप बन जाते हैं. लेकिन ज्ञान आपको ज़्यादा आत्मविश्वासी बनाता है. पारंपरिक रूप से होने वाली पढ़ाई में ग्रेड हासिल करने की दौड़ में वास्तविक ज्ञान काफ़ी पीछे छूट जाता है.
किसी आदमी के व्यवहार और विचारों पर उसके वातावरण का प्रभाव पड़ता है. सोल से हमें एक महत्वपूर्ण चीज मिली और वह है आज़ादी. सोल ने इस समीकरण को तोड़ दिया कि गणित की कक्षा सिर्फ़ गणित के लिए ही है.

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किसी सवाल का बना बनाया जवाब पाने के बदले हमने ख़ुद उसका उत्तर खोजना सीखा और उसमें हमे ख़ूब मजा भी आया. हमने जो उम्मीद की थी, उससे कहीं ज़्यादा हासिल भी किया. हमें किसी भी सवाल का जवाब ढूंढने और नई चीज खोज निकालने की आदत पड़ गई.
ग्रैनी सेसन्स कभी भी एकतरफा नहीं होते थे. ये बहुत ही इंटरएक्टिव होते थे. वे भारतीय संस्कृति और परंपरा के बारे में हो सकते थे और किसी कविता जैसी एकदम छोटी सी चीज के बारे में भी.
मैं आज भी कई सोल मेडिएटर्स के संपर्क में हूं. ऑस्ट्रेलिया के रोज़र्स उनमें एक हैं. हम फ़ेसबुक और व्हाट्सएप के ज़रिए एक दूसरे से जुड़े रहते हैं. मैं उनसे कुछ भी साझा कर सकती हूं. वे आज भी मुझे कई समस्याओं के समाधान तलाशने में मदद करते हैं.
मैं फ़िलहाल, कनकवली के एसएसपीएम कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग में कंप्यूटर इंजीनियरिंग में डिग्री कोर्स कर रही हूं. यह कॉलेज मुंबई विश्वविद्यालय के तहत है. मुझे वेब डेवलपर की नौकरी मिल जाने की उम्मीद है.
सोल एक खूबसूरत सफ़र था. यह आज भी चल रहा है. इस यात्रा ने मुझे सीखना, ग़लतियां करना, उन्हें ठीक करना और फिर से शुरू करना सिखाया.












