महिलाओं के 'राज़' अब बैंकों के हवाले

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- Author, विकास पांडे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पिछले दो दिनों में 500 और 1000 रुपये के नोट बंद होने की ख़बर से परेशान लोगों की लंबी कतारें बैंकों के बाहर लगी रहीं.
इन लोगों में एक बड़ी संख्या घरेलू महिलाओं की रही. वो महिलाएं, जो घर में 'गुपचुप' तरीके से की गई सेविंग्स को अपने बैंक अकाउंट में जमा करवाने के लिए या फिर करेंसी बदलवाने के लिए कतारों में दिखीं.
इनमें ज्यादातर महिलाओं ने माना कि भारतीय महिलाओं की आदत होती है कि वे अपने घर के कामों से बचे पैसे को छोटी-छोटी बचत के रूप में इकट्टा करती रहती हैं.
कभी-कभी तो जमा किए गए ये पैसे ठीक-ठाक रकम की शक्ल में सामने आते हैं और बुरे वक्त में परिवार के काम भी आते हैं.
मोदी सरकार के इस फ़ैसले ने इन महिलाओं को ख़ासा परेशानी में डाल दिया है.
दिल्ली के करोलबाग़ इलाके में रहने वाली इंदु मेहरा 10 साल से अपने पति से छुपाकर पैसे जमा कर रही थीं.
उनके पति एक व्यवसायी हैं. इंदु मेहरा की इस रकम के बारे में उन्हें बुधवार को पता चला.

इंदु मेहरा बताती हैं, "मुझे दस सालों से ज्यादा समय से अपने माता-पिता और अपने पति से कभी-कभी नकद पैसे मिलते रहते थे जिसे मैं जमा करती रहती थी. मेरे बच्चों और मेरे पति को इसके बारे में पता नहीं था. लेकिन अब उन्हें पता चल गया है."
आगे वो कहती हैं, "मैं मोदी सरकार के इस फ़ैसले का समर्थन करती हूं, लेकिन जिस तरह से इसे उन्होंने लागू किया, वो मुझे पसंद नहीं आया. उन्हें इस फ़ैसले से पहले नोटिस देना चाहिए था. तब मैं अपनी बचत को अपने पति से बताए बिना ख़ुदरा रकम में तब्दील कर सकती थी."
इसी तरह प्रिया रोहतान भी नहीं चाहती थीं कि उनके पति को उनकी बचत के बारे में पता चले.
वो अपने बचाए हुए पैसे के बारे में कहती हैं, "मैंने कभी भी अपने पति को इस पैसे के बारे में नहीं बताया, क्योंकि मुझे डर था कि कहीं उन्हें पता चल जाएगा तो वो खर्च कर देंगे. मैंने अपने बच्चों के भविष्य के लिए ये पैसे बचा रखे थे. लेकिन मैं इस बात से काफी नाराज़ हूं, क्योंकि सरकार के एक फ़ैसले ने मेरी बचत बर्बाद करवा दी."
प्रिया रोहतान कहती हैं कि जब उनके पति को पता चला कि यह पैसे मैंने उन्हीं के दिए पैसों में से बचाकर रखे हैं और उन्हें इस बारे में कानों-कान कोई ख़बर नहीं है, तो वो हंस पड़े.

किरण राजपाल बचत के पैसे जमा कराने के लिए सुबह दस बजे ही अपनी बेटी के साथ बैंक आ गई थीं.
उनका कहना है कि जब वो पैसे बैंक में जमा करा देंगी, उसके बाद ही अपने पति को इस बारे में बताएंगी.
वो कहती हैं, "मुझे नहीं लगता है कि जब मैं उन्हें बताऊंगी तो वो नाराज़ होंगे. मुझे लगता है कि वो इस बात पर ग़ौर जरूर करेंगे कि मैंने उनके तनख़्वाह में से अपने बच्चों के भविष्य के लिए पैसे बचाकर रखे हैं."
आगे वो कहती हैं, "मुझे नहीं लगता है कि मैंने कोई बहुत नया काम किया है. हर भारतीय महिला के पास मुसीबत और किसी ख़ास मौके, मसलन जन्मदिन या शादी-ब्याह के लिए घर में ही एक 'गुप्त बैंक' होता है."

इस बदलाव पर आशा छाबड़ा का कहना है कि उन्हें कभी भी ज़िंदगी में पैसे की कमी नहीं पड़ी, इसके बावजूद वो हमेशा थोड़े-थोड़े पैसे जमा करती रही हैं.
वो कहती हैं, "मेरे पति का ट्रांसपोर्ट का काम है. हमें कभी भी नकद पैसे की कमी नहीं हुई, लेकिन फिर भी मैं हमेशा बचत करती रही हूं. मैंने परिवार में कभी भी किसी को अपनी इस बचत के बारे में कुछ नहीं बताया. लेकिन अब सब को पता चल जाएगा."
आगे वो कहती हैं, "मैं बैंक में कैश जमा करवाने को लेकर बिल्कुल भी परेशान नहीं हूं क्योंकि मेरे सारे पैसे जायज है. मैंने ये पैसे सालों में जमा किए हैं. मुझे नहीं पता कि मेरे पति यह जानने के बाद क्या करेंगे. लेकिन मुझे लगता है कि सब ठीक रहेगा."

सुनीता सैगल एक स्कूल में टीचर है. वो सरकार के मौजूदा फ़ैसले का समर्थन करती हैं.
उनका कहना है कि चूंकि इस फ़ैसले से भ्रष्टाचार कम होगा इसलिए वो लाइन में लगने जैसी छोटी-मोटी तकलीफों की परवाह नहीं करती हैं.
वो कहती हैं, "यह बात सही है कि इस फ़ैसले से हम औरतों के 'राज़' बाहर आ गए हैं लेकिन हमें इसे लेकर फिक्रमंद होने की ज़रूरत नहीं है. मैं ज़रूरत पड़ने पर अपने बच्चों और पति को कई बार पैसे दे चुकी हूं लेकिन मैं हमेशा यह पक्का कर लेती हूं कि इसकी फिर से भारपाई हो जाएगी."

आगे वो कहती हैं, "मैं आगे भी ऐसा करती रहूंगी भले ही मेरे बचाए गए पैसे अब राज़ नहीं रह गए हो."
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