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'बाल साहित्य लिखना बच्चों का खेल नहीं' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बाल भारती, चंदा मामा, चंपक, नंदन, पराग, चकमक, इंद्रजाल, बाल भास्कर, अमर चित्र कथा वग़ैरह कुछ ऐसे नाम हैं जिन से कभी न कभी हमारी भेंट हुई है. लेकिन क्या आज के बच्चों को हिंदी के जाने माने कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की ये पंक्तियां याद होंगी? 'इब्ने-बतूता पहन के जूता, निकल पड़े तूफ़ान में पिछले दिनों पंडित जवाहरलाल नेहरू के जन्मदिवस, 14 नवंबर से लेकर दिल्ली में एक हफ़्ते तक 'पुस्तक सप्ताह' समारोह का आयोजन किया गया जिसमें बाल साहित्य को लेकर काफ़ी चर्चा की गई. जाने माने कहानीकार जोगेंद्र पाल ने कहा, "हम लोग अपने बच्चों के साहित्य के प्रति जागरुक नहीं हैं और यही वजह है कि हमारे साहित्य में बाल साहित्य और पत्रिकाओं का हिस्सा भी काफ़ी कम है." उन्होंने कहा कि बच्चों के लिए लिखना बच्चों का खेल नहीं है और यही वजह है कि हिंदी के बड़े लेखकों ने आम तौर पर इसे अनदेखा कर दिया. उर्दू के कहानीकार रतन सिंह ने बच्चों के लिए लिखी अपनी किताब 'उड़न खटोला' पर हुई चर्चा के दौरान कहा कि बच्चों के सहज, सरल और उनकी मासूमियत तक पहुंचना हमारे बस में नहीं रह जाता. लेकिन उनके लिए लिखना हमारा दायित्व है. पढ़ने की प्रेरणा जोगेंद्र पाल ने कहा कि लाहौर से एक उर्दू पत्रिका 'फूल'प्रकाशित होती थी, उनके मास्टर साहब ने उन्हें वह पत्रिका पढ़ने की ऐसी आदत लगा दी कि वे कहानीकार बन गए. वे कहते हैं, "पढ़ने से कल्पना को जो खुली आज़ादी मिलती है वह किसी दूसरे ज़रिए से संभव नहीं है. एक बच्चा पुराने ज़माने की कहानी पढ़ता है तो वह अपनी कल्पना में कहानी से भी 500 साल आगे निकल जाता है, और अगर भविष्य के बारे में वह कहानी पढ़ता है तो ज़माने से हज़ारों साल आगे निकल जाता है." वाणी प्रकाशन के संपादक नीलाभ कहते हैं कि बच्चों में पढ़ने की आदत कम हो गई है और यह भी एक वजह है कि 'पराग', 'चकमक', 'मनमोहन' और 'लल्ला' जैसी सफल मासिक बाल पत्रिकएं बंद हो गईं. उनका कहना है कि टीवी, वीडियो गेम्स, और दूसरे आधुनिक उपकरणों ने उन बच्चों से भी पढ़ने की आदत छीन ली जो बहुत कुछ पढ़ सकते थे. वे कहते हैं कि कि हमारे हिंदी भाषी क्षेत्र में सभ्य होने की निशानी पैसा है, लेकिन बंगाल में अभी पढ़ा लिखा होना संस्कृति का अटूट हिस्सा है और यही वजह है कि बंगला में बाल पुस्तकें और पत्रिकाएं ज़्यादा हैं. अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में हिंदी के शिक्षक आशुतोष कुमार ने कहा, आशुतोष कुमार ने कहा कि इस संदर्भ में सरकारी संस्था नेशनल बुक ट्रस्ट, सहमत और भोपाल की एक ग़ैरसरकारी संस्था एकलव्य बच्चों के लिए काम कर रहीं हैं और बड़ी सुंदर पुस्तके प्रकाशित कर रही हैं. आशा की किरण
राजकमल के प्रकाशक अशोक महेश्वरी ने इसके विपरीत कहा कि पिछले दिनों बच्चों की साहित्य में रूचि बढ़ी है और जिन पुस्तकों का वह साल में एक संस्करण निकालते थे अब उसके दो-दो, तीन-तीन और चार संस्करण निकाल रहे हैं. उन्होंने माना की बच्चों के लिए हिंदी में मूलभूत ताज़ा रचनाएं कम आ रही हैं लेकिन फिर भी स्थिति में सुधार है. चेन्नई यानी दक्षिण भारत से 'चंदामामा' जैसी बच्चों की लोकप्रिय पत्रिका फिर से जारी हो गई है. उन्होंने कहा, "पाठ्य पुस्तक को छोड़ दें तब भी हिंदी में बच्चों के लिए काफ़ी किताबें आ रही हैं और बड़े सुंदर और आकर्षक इलस्ट्रेशन यानी चित्रण के साथ आ रही हैं." नई दिल्ली के न्यू फ़्रेंड्स कालोनी की बाज़ार में फ़ुटपाथ पर दसियों किताबों और पत्रिकाओं की दुकान हर दिन लगती हैं और उनमें अंग्रेज़ी के उपन्यास के साथ साथ अंग्रेज़ी और हिंदी की पत्रिकाएँ भी नज़र आती है. वहीं बच्चों की 'चंपक', 'नंदन', 'चंदामामा' पर भी नज़र पड़ी. फ़ुटपाथ पर किताब की दुकान लगाने वाले श्याम ने कहा कि उनके पास इन पत्रिकाओं की दस-दस प्रतियाँ आती हैं और लगभग सब की सब बिक जाती हैं. लेखक और पाठक में दूरी
हौज़ ख़ास मार्केट, साउथ एक्सटेंशन जैसी जगहों पर किताब बेचने वाले अंग्रेज़ी, हिंदी उपन्यास के साथ साथ बच्चों की कॉंमिक्स और पुरानी पत्रिकाएं भी किराए पर देते हैं और वहां से बच्चे अपनी पसंद की किताबें ले जातें हैं, ये अलग बात है कि वहाँ अंग्रेजी के कॉमिक्स की बिक्री ज्यादा होती है. जवाहरलाल नेहरू विश्विद्यालय के भूतपूर्व प्रोफ़ेसर और जाने-माने आलोचक सदीक़ुर्रहमान क़िदवई कहते हैं कि लेखक और पाठकों का रिश्ता टूट चुका है. उन्होंने कहा, "हमारे यहां नन्हे पाठकों से जा कर कोई नहीं मिलता, स्कूलों में इसका आयोजन होना चाहिए और बच्चों को उसका हिस्सा बनाना चाहिए." |
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