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बुधवार, 31 जनवरी, 2007 को 12:19 GMT तक के समाचार
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ख़ुद से युद्ध लड़ता पाकिस्तान

ज़ाहिद हुसैन की यह किताब में चरमपंथ से संघर्ष की बात खुलकर करती है
आतंक के ख़िलाफ़ युद्ध में कंधे से कंधा मिलाकर अमरीका का साथ देने के बावजूद अमरीकी प्रशासन एक बार फिर पाकिस्तान को शक की निगाह से देखने लगा है.

कुछ ही दिन पहले अमरीकी ख़ुफ़िया प्रमुख जॉन नीग्रोपोन्टे ने पाकिस्तान पर तालेबान और अल-क़ायदा की मदद करने का आरोप लगाया था और अब वहाँ के जन प्रतिनिधि इसी आधार पर पाकिस्तान को अमरीका की ओर से मिलने वाली फ़ौजी मदद रोकने की धमकी दे रहे हैं.

ऐसे वक़्त में पाकिस्तानी पत्रिका न्यूज़ लाइन के संपादक ज़ाहिद हुसैन की लंदन से प्रकाशित किताब 'फ़्रंटलाइन पाकिस्तान' आतंकवाद को रोकने में पाकिस्तान की भूमिका को लेकर गरम लोहे पर हथौड़े की चोट करने वाले सवाल उठाती है.

11 सितंबर के बाद से आतंकवाद के प्रति पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ की एक क़दम आगे और दो क़दम पीछे की नीति की चीरफाड़ करने वाली इस किताब में पाकिस्तानी फ़ौज, ख़ुफ़िया संगठनों और अतिवादी संगठनों के नरम-गरम संबंधों की पड़ताल की गई है.

आतंकवाद के ख़िलाफ़ अमरीकी गठबंधन में शामिल सभी देशों में शायद पाकिस्तान एकमात्र देश है जिसे बाहरी लड़ाई के साथ-साथ ख़ुद से भी एक ख़तरनाक जंग लड़नी पड़ रही है. 11 सितंबर के बाद से पाकिस्तान ने तालेबान और अल-क़ायदा के कई बड़े नेताओं को गिरफ़्तार करके अमरीका को सौंपा या उन्हें मार डाला, घरेलू स्तर पर कट्टरवादी इस्लामी संगठनों के ग़ुस्से और विरोध का ख़तरा उठाते हुए जेहादी ग्रुपों पर पाबंदियाँ लगाईं.

यहाँ तक कि भारत प्रशासित कश्मीर में सक्रिय अतिवादी संगठनों को मदद रोकने या कम करने का फ़ैसला भी किया गया. जेहादी संगठनों के ग़ुस्से और मायूसी का निशाना ख़ुद मुशर्रफ़ बने और कई बार चरमपंथी हमलों में बाल-बाल बचे.

लेकिन अफ़ग़ानिस्तान में तालेबान के दोबारा मज़बूत होने की ख़बरों के साथ पश्चिमी देशों का मीडिया ही नहीं बल्कि प्रशासन के कुछ हिस्सों में भी अब सवाल उठने लगा है कि आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध में क्या पाकिस्तान वाक़ई दिलोजान से शरीक है या यथार्थ कुछ और ही है? अमरीका और दूसरे पश्चिमी देशों के दबाव में जरनल मुशर्रफ़ आतंकवाद और अतिवाद के ख़िलाफ़ जिस मज़बूती से क़दम उठाते नज़र आते हैं, क्या ज़मीनी तौर पर उन पर अमल भी उतनी ही मज़बूती से होता है? या फिर एक तयशुदा नीति के तहत पाकिस्तान की फ़ौजी और ख़ुफ़िया एजेंसियाँ उन्हीं सब ताक़तों को अंदरख़ाने मज़बूत करने में लगा हुआ है जिनके विरोध में जनरल मुशर्रफ़ मोर्चा लिए नज़र आते हैं?

ज़ाहिद का मानना है कि पाकिस्तानी सेना के कुछ अधिकारी अब भी तालेबान से सहानुभूति रखते हैं

ये सभी सवाल गाहे-बगाहे मीडिया में उठाए जाते रहे हैं लेकिन अक्सर जवाब नहीं मिलते. पहली बार ज़ाहिद हुसैन ने अपनी नई किताब 'फ़्रंटलाइन पाकिस्तान - द स्ट्रगल विद मिलिटेंट इस्लाम' में इन मुश्किल सवालो को उठाया ही नहीं है बल्कि बहुत स्पष्ट शब्दों में कहा है कि इस्लामी अतिवादियों को पाकिस्तान की फ़ौज और ताक़तवर ख़ुफ़िया एजेंसी आइएसआइ ने पूरी तरह अब भी नहीं त्यागा है.

सबूत पेश करने के लिए ज़ाहिद हुसैन ने न कोई ख़ुफ़िया दस्तावेज़ का सहारा लिया है और न ही नीति निर्धारकों की गुप्त बैठकों का ब्यौरा पेश किया है. उन्होंने अक्तूबर 1999 में फ़ौजी तख़्तापलट करके हुकूमत पर क़ाबिज़ हुए जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ के हर छोटे बड़े फ़ैसले को सिलसिलेवार तरीक़े से अध्ययन कर उसे सवालों की कसौटी पर कसा है. लेकिन इतने भर से पाकिस्तान की जो तस्वीर निकल कर सामने आती है वो, ख़ुद ज़ाहिद हुसैन के शब्दों में, पाकिस्तान ही नहीं ख़ुद राष्ट्रपति मुशर्रफ़ के लिए भी ख़तरनाक दृश्य उपस्थित करती है.

परवेज़ मुशर्रफ़ का ही बयान है कि 11 सितंबर के बाद अमरीका ने पाकिस्तान को सख़्त शब्दों में ख़बरदार किया था कि अगर तालेबान को अफ़ग़ानिस्तान से खदेड़ने में पाकिस्तान ने अमरीका का साथ नहीं दिया तो उसे बमबारी करके वापस पाषाण-युग में पहुँचा दिया जाएगा. इसलिए तालेबान से पल्ला झाड़ना और उसके बाद घरेलू जेहादी संगठनों पर लगाम कसना जनरल मुशर्रफ़ के लिए ठीक वैसा ही था जैसे कोई अपने बिगड़ैल बच्चे को सही राह पर लाने के लिए उस पर पाबंदी लगा दे. लेकिन इस तरह की पाबंदियों के बाद बच्चा बाज़ आने की बजाए और ढीठ हो जाए और अपने बाप को ही मारने दौड़े.

फ्रंट लाइन पाकिस्तान मुशर्रफ़ की किताब का दोहराव लग सकती है

ज़ाहिद हुसैन कहते हैं कि जिन इस्लामी अतिवादियों को आइएसआइ ने किसी ज़माने में कश्मीर और अफ़ग़ानिस्तान में जेहाद लड़ने के लिए पाल पोस कर बड़ा किया था, अब उन्होंने अपनी बंदूक़ें जनरल मुशर्रफ़ की ओर मोड़ दी हैं क्योंकि उनकी नज़र में मुशर्रफ़ ने जेहाद से दग़ा किया है. लेकिन किताब कहती है कि इस काम में अतिवादी अकेले नहीं हैं बल्कि पाकिस्तान की फ़ौज और ख़ुफ़िया एजेंसी आइएसआइ के कुछ अंदरूनी लोग उनके मददगार हैं. यही नहीं स्वयं जनरल मुशर्रफ़ ने कई बार राजनीतिक कारणों से जेहादी संगठनों को खुली छूट दी.

मसलन 2002 में अमरीका के विदेश मंत्रालय ने लश्कर-ए-तैबा को आतंकवादी संगठनों की सूची में डाला. इसके बाद मुशर्रफ़ के पास इस संगठन पर पाबंदी लगाने के सिवा और कोई रास्ता नहीं बचा था. पर दरअसल उसका कुछ नहीं बिगड़ा. लश्कर के लोग उसकी राजनीतिक शाखा जमात उद दावा के बैनर तले काम करने लगे और किसी भी सदस्य की गिरफ़्तारी नहीं की गई. ये भी सच है कि लश्कर के कई सदस्य अल-क़ायदा को लगातार मदद और छिपने की जगह मुहैया करवाते रहे.

ओसामा बिन लादेन के दाहिने हाथ कहे जाने वाले अबू ज़ुबैदा की गिरफ़्तारी भी फ़ैसलाबाद में जिस घर से हुई उसे लश्कर-ए-तैबा के एक सदस्य ने किराए पर लिया था. ज़ाहिद हुसैन कहते हैं, "लश्कर-ए-तैयबा की ओर इस्लामाबाद के रुख़ से ज़ाहिर होता है कि वो अतिवाद को तब तक जारी रखना चाहता है जब तक भारत कश्मीर के मुद्दे पर बातचीत के लिए राज़ी नहीं हो जाता".

किताब में कहा गया है कि मुशर्रफ़ की जानकारी के बिना कई काम होते रहे हैं

यही वजह है कि इंडियन एअरलाइंस के विमान के बदले छोड़ा गया हरकत उल मुजाहिदीन का मसूद अज़हर कुछ ही दिन बाद ही कराची की एक मस्जिद से हिंदुस्तान और अमरीका को नेस्तोनाबूद करने का ऐलान कर रहा था लेकिन सरकार ने न तो उसे गिरफ़्तार किया और न ही भड़काऊ बयान देने से रोका.

फ़्रंटलाइन पाकिस्तान में इस तरह के कई उदाहरण हैं जब मुशर्रफ़ सरकार ने इस्लामी अतिवाद को क़ाबू में करने की बजाए उसकी ओर से आँखें मूँदीं. कई बार तो ख़ुद जनरल मुशर्रफ़ को इस बात की जानकारी तक नहीं थी कि उनके अफ़सर चरमपंथी संगठनों को बाक़ायदा ट्रेनिंग दे रहे हैं. मसलन, पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के कोटली इलाक़े में जैश ए मोहम्मद का एक कैंप आइएसआइ चला रही थी. जब मुशर्रफ़ को इसकी जानकारी मिली तो उन्हें आइएसआइ की कश्मीर यूनिट के प्रमुख मेजर जनरल ख़ालिज महमूद को बरख़ास्त करना पड़ा.

ज़ाहिद हुसैन कहते हैं कि जिन लोगों को कश्मीर और अफ़ग़ानिस्तान में जेहाद करने के नाम पर आइएसआइ ने तैयार किया था, 11 सितंबर के बाद मुशर्रफ़ की नीति में आए बदलाव से उनमें मायूसी छा गई. और इनमें से ही कई लोग पाकिस्तान के भीतर हुए घातक हमलों में शामिल पाए गए.

ये किताब इस मायने में काफ़ी दबंग है कि पाकिस्तान में रहते हुए ज़ाहिद हुसैन ने सत्ता के भीतर की सत्ता कही जाने वाली आइएसआइ और फ़ौज के बारे में कुछ साफ़-साफ़ बातें कही हैं. वो ये सवाल उठाते हैं कि क्या ये संभव है कि पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम के जनक डॉक्टर अब्दुल क़दीर ख़ान ख़ुफ़िया तौर पर लीबिया, ईरान और उत्तर कोरिया को परमाणु हथियार बनाने में काम आने वाले बड़े बड़े सेंट्रीफ़्यूज बेचते रहें और आइएसआइ या फ़ौज को भनक तक न लगे?

क़दीर ख़ान की गतिविधियों पर भी सवाल उठाए गए हैं

किताब की अगर कोई सबसे बड़ी कमज़ोरी है तो ये कि ये अंततः ये एक पत्रकार का रोज़नामचा बनकर रह गई है. अगर आपने जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ की किताब 'इन द लाइन ऑफ़ फ़ायर' पढ़ ली हो तो ज़ाहिद हुसैन की किताब कई जगहों पर बार उसी का दोहराव सी भी लगेगी क्योंकि दोनों किताबों में एक ही तरह के क़िस्सों का ब्यौरा है -- विश्लेषण भले ही अलग हो.

कुल मिलाकर ज़ाहिद हुसैन की किताब उस राह का सफ़रनामा है जिस पर जनरल ज़िया उल हक़ 1977 के बाद पाकिस्तान को ले गए. शीतयुद्ध के उन दिनों में पाकिस्तान ने दो मिशन तय किए थे -- सोवियत रूस के ख़िलाफ़ अमरीका की मदद से लड़ रहे अफ़ग़ानियों को कट्टर इस्लामी विचारधारा और हथियार मुहैया करवाना और भारत-प्रशासित कश्मीर में हथियारबंद संघर्ष बग़ावत को हवा देकर भारत से बांग्लादेश का हिसाब चुकता करना.

यही वो दौर था जब पाकिस्तानी फ़ौज, ख़ुफ़िया संगठन और नागरिक प्रशासन के साथ साथ न्यायपालिका और शिक्षा तक का जेहादीकरण कर दिया गया. नतीजतन आज पाकिस्तान एक ऐसे दोराहे पर आ पहुँचा है जहाँ उसकी बाहरी लड़ाई घरेलू लड़ाई में बदल गई है.

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