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रविवार, 28 जनवरी, 2007 को 01:22 GMT तक के समाचार
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अब कौन लगाएगा 'अदीबों की अदालत'?

कमलेश्वर
कमलेश्वर बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए भी लिखते रहे
भारत के जाने-माने साहित्यकार और फ़िल्म लेखक कमलेश्वर का शनिवार शाम निधन हो गया है और इसी के साथ हिंदी साहित्य जगत का एक अध्याय सिमट गया.

रचना जगत की कई विधाओं में अपना ख़ास और प्रभावी दखल रखने वाले कमलेश्वर बीबीसी हिंदी के पाठकों और श्रोताओं से भी जुड़े रहे.

चाहे वह पत्रकारिता की कालजयी परंपरा को समझने की कोशिश रही हो या फिर तस्लीमा नसरीन के पक्ष में बेबाकी से की गई टिप्पणी, कमलेश्वर समय-समय पर बीबीसी के ज़रिए लोगों से मुखातिब होते रहे हैं.

सबसे बड़ी बात तो यह है कि कमलेश्वर की रचनाधर्मिता को किसी एक साँचे में नहीं कसा जा सकता है. वो एक कोलाज की तरह ही है. उसमें अलग-अलग रंग देखने को मिलते हैं.

 पत्रकार, पटकथा लेखक, समीक्षक, कथाकार...न जाने कितनी ही भूमिकाएँ और सभी में एक ख़ास पहचान, एक मज़बूत पकड़ और ज़मीनी समझ. कमलेश्वर के लेखन का परिचय कुछ ऐसा ही है

पत्रकार, पटकथा लेखक, समीक्षक, कथाकार...न जाने कितनी ही भूमिकाएँ और सभी में एक ख़ास पहचान, एक मज़बूत पकड़ और ज़मीनी समझ. कमलेश्वर के लेखन का परिचय कुछ ऐसा ही है.

फ़िल्म जगत, दूरदर्शन, साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएँ, समाचार पत्र और ऐसे बहुत सारे क्षेत्रों में अपनी रचनात्मकता का प्रमाण दिया है कमलेश्वर ने.

दैनिक जागरण और दैनिक भास्कर जैसे समाचार पत्रों में संपादक के तौर पर उन्होंने काम किया और साथ ही उस समय दूरदर्शन को उन्होंने दिशा दी जब भारत में दूसरा और कोई टेलीविज़न चैनल नहीं हुआ करता था.

अलविदा... अदीब

एक ओर जहाँ कमलेश्वर अपनी कलम से गंभीर विमर्श कुरेदते नज़र आते हैं वहीं लोकप्रिय और आम लोगों की रुचि वाले साहित्य में भी इनका ख़ासा दखल रहा.

इसका प्रमाण यह है कि जिस ख़ूबसूरती से वो 'काली आँधी' जैसा साहित्य लोगों को देते हैं, उसी परिपक्वता के साथ फ़िल्म जगत को कमलेश्वर से कई अच्छी पटकथाएँ भी मिलती हैं.

कमलेश्वर को श्रद्धांजलि
कमलेश्वर को श्रद्धांजलि देती हुई उनकी बेटी

लघुकथाओं पर तो कमलेश्वर का विशेष काम रहा है और ख़ुद लिखने से लेकर नई कहानी के अस्तित्व का झंडा बुलंद करने तक उनकी बड़ी भूमिका रही है.

'सारिका' का संपादन करते हुए कथा साहित्य को एक विस्तार देना इसकी एक बानगी है.

अदीबों की अदालत की बात करता उनका उपन्यास 'कितने पाकिस्तान' हो या फिर भारतीय राजनीति का एक चेहरा दिखाती फ़िल्म 'आंधी' हो, कमलेश्वर का काम एक मानक के तौर पर देखा जाता रहा है.

साहित्य जगत को अपने योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 2006 में पद्म भूषण सम्मान से सम्मानित किया.

साहित्य अकादमी ने उन्हें उनके उपन्यास, 'कितने पाकिस्तान' के लिए 2003 में अकादमी अवार्ड से सम्मानित किया था.

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