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गुरुवार, 29 जून, 2006 को 01:17 GMT तक के समाचार
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मौत का फ़तवा और तस्लीमा नसरीन

तसलीमा नसरीन
बांग्लादेश के कट्टरपंथियों ने तसलीमा के ख़िलाफ फतवा जारी किया है
बांग्लादेश की निर्वासित लेखिका तस्लीमा नसरीन की ज़िंदगी पर फिर मौत का खतरा मंडराने लगा है. वो इस समय दुनिया की सबसे विवादित और चर्चित लेखिका हैं.

बांग्लादेश में तो उनकी हत्या का फ़तवा इस्लामी कट्टरपंथियों ने तभी जारी कर दिया था जब उन्होंने ‘लज्जा’ नामक उपन्यास लिखा था.

जान बचाने के लिए उन्हें अपना देश छोड़कर नॉर्वे में शरण लेनी पड़ी थी. यह वर्ष 1993 की बात है.

इसके बाद से यह विद्रोही लेखिका लगातार भाग रही है और मौत के फ़तवे उसका पीछा कर रहे हैं लेकिन बेहद चिंता की बात यह है कि अब भारत में भी उनकी मौत का फ़तवा जारी कर दिया गया है.

बांग्ला लेखिका तस्लीमा नसरीन के व्यक्तिगत, मानसिक, सांस्कृतिक और रचनात्मक संताप और संकट को पहचाना जाना चाहिए.

बांग्ला भाषा और उसका साहित्य काफ़ी समृद्ध है पर वह दो देशों में बँटा हुआ है.

इतिहास

भाषा और सांस्कृतिक शून्यता के कारण ही वर्ष 1971 में पाकिस्तान की एकता को खंडित करके पूर्वी पाकिस्तान के बांग्लाभाषियों ने अपना स्वतंत्र देश, बड़े बलिदानों के बाद स्थापित किया था.

भाषा और संस्कृति ने यह क्राँति की थी और तब धर्म आड़े नहीं आया था क्योंकि बांग्लाभाषियों का आधा भूखंड धर्म के आधार पर विभाजित भारत का पश्चिम बंगाल बन चुका था.

भारत एक धर्मनिरपेक्ष जनतंत्र बना पर पाकिस्तान ने ख़ुद को इस्लामी देश घोषित किया.

इस्लामी देश होने की पहचान को तोड़कर जब पूर्वी पाकिस्तान बना तब वहाँ के कट्टरपंथी कठमुल्लों ने कोई विरोध या प्रतिवाद नहीं किया था पर अब यहाँ इस्लामी जेहादियों और कठमुल्लों के फ़तवे और फ़रमान चल रहे हैं.

बांग्लादेश एक स्वतंत्र देश है, अपनी रीति नीति वो जाने. लेकिन ताज्जुब तो यह है कि लगभग दो दशक बाद पश्चिम बंगाल के एक भारतीय इमाम ने तस्लीमा को मौत दिए जाने का फ़तवा जारी किया है.

यह भी तब जबकि तस्लीमा नसरीन भारत की नागरिक नहीं हैं. वे नागरिक होती भी, तब भी इस लोकतंत्र के मूल्यों के मुताबिक पश्चिम बंगाल के इमाम के इस ग़लत और हिमाकत भरे फ़तवे का तगड़ा और कारगर विरोध किया जाना चाहिए.

वाकया

हुआ यह है कि एक सेमिनार में तस्लीमा ने अपने विचार व्यक्त किए थे.

उस सेमिनार में कोलकाता के प्रमुख लेखक और कुछेक मुस्लिम बुद्धिजीवी मौजूद थे.

उनके हवाले से यह बात पुष्ट होती है कि वहाँ तस्लीमा ने इस्लाम मजहब के बारे में या पैगम्बर साहब के बारे में ऐसा कुछ भी नहीं कहा जिससे धर्म या उसके नबी की कोई तौहीन होती हो.

यहाँ यह याद करना ज़रूरी है कि तस्लीमा नसरीन ने काफी पहले भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन किया था पर उस निवेदन पर अभी तक अंतिम निर्णय नहीं हुआ है.

पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार ने उनकी आत्मकथा के एक भाग ‘द्विखंडिता’ पर बांग्ला भाषा में प्रतिबंध लगाया हुआ है लेकिन उनकी कोई पुस्तक भारत में प्रतिबंधित नहीं है.

हिंदी में तो उसकी सारी पुस्तकें खुले बाज़ार में उपलब्ध हैं और इंटरनेट पर भी वे रचनाएं मौजूद हैं. ऐसे में पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार का भाषाई प्रतिबंध एक मज़ाक बनकर रह गया है.

इस समय भी तस्लीमा नसरीन भारत के कोलकाता महानगर में सरकारी अनुमति पर रह रही हैं क्योंकि वो अपनी भाषा और साहित्य से अलग होकर एक सांस्कृतिक शून्य में नहीं रहना चाहती हैं.

फ़तवा

इस बार तस्लीमा के विरोध की कमान एक भारतीय इमाम ने संभाली है.

वो कोलकाता की टीपू सुल्तान मस्जिद के इमाम हैं. उनका नाम एसएसएनआर बरकती है.

इस बार बरकती ने तस्लीमा की हत्या का फ़तवा जारी किया है. यह पहला मौका है जब कोलकाता जैसे प्रबुद्ध और खुले हुए शहर में किसी को मौत देने का फ़तवा जारी किया गया है.

पिछले वर्ष भी इन्हीं इमाम बरकती ने तस्लीमा नसरीन का मुँह काला किए जाने और जूतों की माला पहनाए जाने का फ़तवा जारी किया था और इस बार की तरह ही 50 हज़ार रुपयों का इनाम भी घोषित किया था.

अच्छा है कि बांग्ला के प्रख्यात लेखक सुनील गंगोपाध्याय ने फ़तवा विरोधी मुहिम संभाल ली है.

लोकतांत्रिक भारत में इस तरह के फ़तवों को बर्दाश्त और मंज़ूर नहीं किया जाना चाहिए.

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