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देश को भावनात्मक रूप से जोड़ती है हिंदी | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
यह आकस्मिक ही है कि मैं आज जब भारत की आज़ादी की तारीख़ 15 अगस्त, 1947 याद करता हूं तो मुझे एकाएक तीन ऐसे नाम याद आते हैं जिनके बिना हिंदी भाषा की आज की स्थिति और प्राणशक्ति को पहचाना नहीं जा सकता. यह तीन नाम हैं राष्ट्रकवि माखनलाल चतुर्वेदी, बनारसी दास चतुर्वेदी और पंडित श्रीनारायण चतुर्वेदी. इनमें से दो नाम तो मेरे लिए घरेलू जैसे थे क्योंकि वे मेरे कस्बे मैनपुरी से जुड़े हुए थे. बनारसीदास चतुर्वेदी तो फ़िरोजाबाद में जन्मे थे और पंडित श्रीनारायण चतुर्वेदी इटावा के थे. वैसे भी मैनपुरी में माथुर चतुर्वेदी समुदाय की बहुतायत थी और पंडित श्रीनारायण चतुर्वेदी जी की नजदीकी रिश्तेदारी मैनपुरी में थी और वे वहां आते-जाते रहते थे. चौथियाने मोहल्ले में उनका आना जाना था. अब लोग उन्हें आदर से भैया साहब संबोधित करते थे. इनमें से माखनलाल चतुर्वेदी ही उत्तरप्रदेश से बाहर मध्यप्रदेश में जन्मे थे पर उनकी उपस्थिति हिंदी खड़ी बोली भाषा और रचनात्मक साहित्य के लिए सबसे महत्वपूर्ण थी. वे दादा के रूप में पहचाने और स्वतंत्रता संग्राम के अपराजेय योद्धा के रूप में स्वीकारे जाते थे. आज हिंदी दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी भाषा है पर 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में यह सोचा भी नहीं जा सकता था कि हिंदी भाषा और नागरी लिपि कभी जीवित भी रह जाएगी. ऐसे भयानक और भीषण हालात थे कि दोनों का बचना असंभव हो गया था. अंग्रेज़ी सत्ता ने नागरी लिपि की जगह रोमन लिपि को फौज में लागू कर दिया था और हिंदू-मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक खाई चौड़ी करने के लिए अदालतों में फ़ारसी भाषा को वरीयता दी थी. जिसे उन्होंने उर्दू के नाम पर चलाया था. यहां उर्दू भाषा को ग़लत संदर्भों में न लिया जाए क्योंकि उर्दू खालिस तौर पर भारत में जन्मी यहीं पर विकसित हो रही भाषा थी. हिंदी और उर्दू का कोई आपसी मनमुटाव भी नहीं था पर अंगेज़ी सत्ता ने एक ही भाषा के बीच विभेद पैदा करने की साजिश की थी. ऐसे कठिन समय में आज़ादी की लड़ाई को जिस जनभाषा का ज़रूरत थी उसे जीवित और जागृत रखना बेहद ज़रूरी था. क्योंकि नागरी लिपि ही भारत की अधिसंख्य भाषाओं को जोड़ती थी. यहां हिंदी भाषा को ‘जाति वाचक’ हिंदू पहचान के साथ जो़ड़ने की ग़लती न की जाए क्योंकि हिंदी इस देश के नाम से जुड़ी थी. उस समय हिंदी का परचम राजा शिवप्रसाद ‘सितारे हिंद’ ने बुलंद किया था. उन्हीं की परंपरा में माखनलाल चतुर्वेदी, बनारसी दास जी तथा श्रीनारायण चतुर्वेदी जी सामने आए थे. स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान यहां इन तीनों दिग्गज लेखकों का विस्तृत विवरण देना तो संभव नहीं है पर हिंदी के पुरोधा पंडित श्रीनारायण चतुर्वेदी जी की बड़ी गहरी स्मृतियां भारत के प्रथम स्वतंत्रता दिवस से जुड़ी हुई हैं. मात्र इतना ही नहीं वे मेरे जनपद से जुड़े इटावा ज़िले के थे बल्कि इसलिए भी कि वे मेरे अग्रज के रूप में मेरे ही इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र रहे थे. साथ ही जब हमारा युवा दौर आया तब भैया साहब हिंदी खड़ी बोली की महान पत्रिका ‘सरस्वती’ के संपादक भी थे जिसकी नींव आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने रखी थी. भैया साहब स्वयं को रचनाकार से ज़्यादा हिंदी के कार्यकर्ता का दर्जा देते थे. वे अंग्रेज़ी, फारसी और ब्रज भाषा के उद्भव विद्वान थे. परंतु हिंदी के अनन्य प्रेमी वे छात्रवृत्ति पर इंग्लैंड से अंग्रेज़ी का अध्ययन करके आये थे और शिक्षा, संस्कृति और भारतीय पुरातत्व के विशेषज्ञ थे और अंग्रेज़ों की सरकार में आला अफ़सर. मुझे इलाहाबाद की वह गोष्ठी याद है जिसमें भैया साहब ने कहा था,''आज बहुत से अंग्रेज़ी परस्त अंग्रेज़ी भाषा का गुणगान करने में लगे हैं. वे अंग्रेज़ी को ज्ञान-विज्ञान की खिड़की बताते हैं और कहते हैं कि इसके बिना निस्तार नहीं. पर भारतीय संस्कृति हिंदी के बिना नहीं पनप सकती. अंग्रेज़ी तो मात्र खिड़की ही है.'' ''हमारी भाषा तो हमारा महाद्वार है. खिड़की के लिए महाद्वार बंद करना मूर्खता होगी. हम अपने दुख सुख अपनी ही भाषा में महसूस कर सकते हैं.'' यही कारण था कि एक तरफ तो 15 अगस्त, 47 को आज़ादी आई थी और दूसरी तरफ विभाजन के मारे शरणार्थियों का तांता लगा था. वहां भैया साहब शरणार्थियों के पुनर्वास में लगे थे. उनका कहना था कि अंग्रेज़ी हमें तोड़ती भी है और कुछ हद तक जोड़ती भी है पर देश को भावनात्मक रूप से जोड़ने का काम भारतीय भाषाएं और हिंदी ही कर सकती है. हिंदी हमारे जीवन के दुख सुख का हिस्सा है. |
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