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गुरुवार, 27 जुलाई, 2006 को 07:47 GMT तक के समाचार
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नौशाद: संगीत सम्राट या टेलर मास्टर

नौशाद
नौशाद को लोग संगीतकार के रुप में जानते हैं लेकिन वो शायर और कहनीकार भी थे
कितना और किस-किस तरह से याद करूं नौशाद साहब को. बांद्रा की कार्टर रोड वाले उनके बंगले में हुई बहुत सी मुलाक़ातें याद हैं.

इसी रोड पर राजेश खन्ना का बंगला ‘आशीर्वाद’ था और इसी सड़क पर पहुँचते हुए बाएँ मुड़ जाओ तो ऋषि दा (ऋषिकेश मुखर्जी) का बंगला था.

दाहिने कोने की बिल्डिंग में दिग्गज लेखक और अभिनेता हरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय का फ्लैट था.

वे बहुत वृद्ध हो चुके थे. अपनी दूसरी पत्नी और बेटे लक्ष्मण के साथ वहां रहते थे. अपने इस नए परिवार की चिंताओं से ग्रस्त और अपने निकटतम रक्त संबंधों वाले समाज से तिरस्कृत.

सरोजनी नायडू का यह भाई विलक्षण रचनात्मक और क्रांतिकारी चेतना का मालिक था. कमला देवी चट्टोपाध्याय से पूरी तरह अलग यह आदरस्पद व्यक्तित्व भी मेरी स्मृतियों में कौंधता रहता है.

नौशाद साहब की खुद्दारी

तो मैं बात कर रहा था नौशाद साहब की जिन्हें अमर संगीतकार के रूप में दुनिया जानती है. लेकिन एक खुद्दार और संघर्षशील व्यक्ति के रूप में उन्हीं की अपनी यादों के जरिए जानने का सौभाग्य मुझे मिला. ये मेरी यादों की निहायत निजी धरोहर है.

मेरे लिए यह बेहद गर्व की बात है कि जब नौशाद साहब की जीवन कथा को लेकर पहली डाक्यूमेंट्री फ़िल्म बनाने की बात आई थी तो लेखक के रूप में उन्होंने बड़े ही बड़प्पन से मेरे नाम की मंज़ूरी दी थी.

इस डाक्यूमेंट्री के निर्माता-निर्देशक थे मेराज़ साहब. इस योजना के तहत नौशाद की यादों को लंबे समय तक रिकॉर्ड किया गया था. वे रिकॉर्डिंग मेराज़ साहब की संपत्ति थी.

नौशाद अपने गानों में लोकभाषाओं का खूब इस्तेमाल करते थे

यदि वे आज भी सुरक्षित हों तो भारतीय सिने-संगीत के इतिहास और फ़िल्म-संस्कृति की अनमोल पूंजी साबित होगी क्योंकि नौशाद साहब की जीवनकथा का क़ाफी हिस्सा मेराज़ साहब ने उन्हीं की आवाज़ में रिकॉर्ड किया था.

लखनऊ की तहज़ीब में जन्मे नौशाद साहब का घराना तो नवाबों का नहीं था. पर वे नवाब शुजाउद्दौला की साझा लखनवी तहज़ीब की पूरी परंपरा को लेकर सिने-दुनिया में आए थे.

शायर और कहानीकार

यह जानना बहुत ही रोचक रोगा कि नौशाद साहब खुद एक शायर और कहानीकार थे. दिलीप कुमार, नरगिस और निम्मी अभिनीत मशहूर फ़िल्म ‘दीदार’ की कहानी उन्होंने ही लिखी थी.

‘बैजूबावरा’ पर फ़िल्म बनाने का मुख्य विचार और प्लॉट उन्हीं का था. उनकी शायरी की पुस्तक ‘आठवाँ सुर’ प्रकाशित भी हुई थी.

ये हिंदी फ़िल्मों का वो जमाना था कि जब मूक फ़िल्में लगती थीं तो परदे की बगल में बैठकर दृश्य की भावनाओं के अनुरूप साजिंदे साज़ बजाया करते थे.

यह नौशाद साहब के बचपन के दिन थे. अन्य स्थानीय संगीतकारों के साथ लखनऊ के रॉयल सिनेमा हाल में लड्डन मियाँ हारमोनियम बजाते थे. यहीं से नौशाद साहब का संगीत प्रेम परवान चढ़ा. जो आख़िर जुनून तक जा पहुँचा.

इस जुनून की असली शुरूआत तो बाराबंकी क़स्बे के शरीफ़ दरगाह के उर्स के साथ हुई थी जहाँ उन्होंने सूफ़ी फक़ीर बाबा रशीद खां को बांसुरी बजा-बजा के गाते सुना था.

घर लौटे तो मोहल्ले की संगीत-साज़ों की एक दुक़ान में साफ-सफ़ाई करने की नौकरी कर ली. संगीत के प्रति उनकी लगन देखकर दुकान के मालिक ग़ुरबत अली ने एक हारमोनियम उन्हें दे दिया.

उनके अब्बा संगीत वगैरह के सख़्त विरोधी थे. उन्होंने वो हारमोनियम घसियारी मंडी वाले घर की पहली मंजिल से मोहल्ले की गली में उठाकर फेंक दिया.

आखिर 18 बरस की उम्र में नौशाद साहब घर छोड़ कर बम्बई पहुँचे और संगीत की दुनिया में उनका संघर्षशील सफ़र शुरू हुआ.

नई परंपरा

यह उनकी जिंदगी का सबसे मुश्किल दौर था. मौसिकीमार शायर के रूप में नौशाद साहब अपनी साझा विरासत के संस्कार लेकर बम्बई पहुंचे थे.

नौशाद
नौशाद इसी वर्ष पाँच मई को दुनिया से विदा हो गए

यही कारण था कि उन्होंने शास्त्रीय संगीत के साथ लोकधुनों और भाषा की एक नई संगीत परंपरा शुरू की थी. तभी तो उनके गानों में लोकभाषा के ‘घिर आई बदरिया’, ‘अंखियाँ मिला के’, ‘ओ मेरे सांवरे’, ‘मोरे द्वारे’ और ‘मन तड़पत’ जैसे शब्दों का लगातार प्रयोग मिलता है.

कहां तक याद किया जाए. 'रतन' फ़िल्म से लेकर 'मुगले आज़म' तक और उसके बाद हिंदी फ़िल्मों के संगीत का पूरा सफ़र एक तरह से नौशाद साहब के संगीत का ही सुरीला सफ़र है.

क्या इस ऐतिहासिक सत्य को कभी भुलाया जा सकता है कि अमर गायक कंदुनलाल सहगल ने अपना अंतिम अमर गीत ‘जब दिल ही टूट गया अब जी कर क्या करेंगे’ गाया था, उसे नौशाद साहब द्वारा ही संगीतबद्ध किया गया था.

और एक मजेदार प्रसंग. नौशाद साहब की जब शादी हुई तो वो भी लखनऊ के ही एक संगीतविरोधी घराने में. इसलिए ससुराल वालों को बताया गया था कि बम्बई में वे दर्जी की दुकान चलाते हैं.

शादी के समय तक उनकी शाहकार फ़िल्म ‘रतन’ आ चुकी थी. घर-घर में उसके गाने लोगों की जुबान पर थे.

एक क़िताब में ये दर्ज किया भी गया है कि जब नौशाद साहब की बारात चली तो बैंडवाले को ये पता नहीं था कि जो धुनें वे बजा रहे हैं वो नौशाद मियाँ की ‘रतन’ फ़िल्म की ही धुनें हैं.

कारण, वे तो एक टेलर मास्टर की बारात लेकर जा रहे थे संगीत सम्राट की नहीं.

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