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संगीतकार नौशाद का निधन | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अनमोल घड़ी, आन, मुग़ल-ए-आज़म, बैजू बावरा, मदर इंडिया और पाकीज़ा जैसी फ़िल्मों के ज़रिए यादगार संगीत देने वाले नौशाद अब इस दुनिया में नहीं रहे. संगीतकार नौशाद ने शुक्रवार को मुंबई में आख़िरी साँस ली. 87 वर्ष के हो चुके नौशाद को संगीत की दुनिया में सराहनीय योगदान के लिए दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड से भी नवाज़ा गया था. नौशाद पिछले कुछ समय से बीमार थे और गत अप्रैल में ही उन्हें साँस में तकलीफ़ की शिकायतों के बाद नानावटी अस्पताल में भी भर्ती करवाया गया था. नौशाद ने फ़िल्म संगीत की दुनिया के कई इतिहास रचे. उन्होंने हिंदी फ़िल्मों में शास्त्रीय संगीत की शुरुआत की और बाँसुरी, सितार और मैंडोलिन जैसे वाद्यों का एकसाथ प्रयोग शुरु किया. उन्होंने पार्श्वसंगीत में साउंड मिक्सिंग की शुरुआत की. इसमें गीत और संगीत को अलग-अलग रिकॉर्ड किया जा सकता है. साथ ही नौशाद ने हिंदी फ़िल्मी दुनिया में एक नई परंपरा शुरू की थी जिसके तहत संगीत की स्क्रिप्टिंग होती थी यानी कौन सा वाद्य किस समय बजना है इस बारे में विवरण पहले से तैयार किया जाता था. नौशाद का यह प्रयोग बहुत सफल हुआ था. लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी को नौशाद ही हिंदी सिनेमा संगीत की दुनिया में लेकर आए थे. नौशाद का जन्म 25 दिसंबर 1919 को लखनऊ में हुआ था और वह 1930 के दशक में लखनऊ से मुंबई आए. आरंभिक संघर्ष के बाद 1940 के दशक में संगीतकार के रूप में अपनी पहचान बना ली. इसके बाद दो दशकों तक फ़िल्मी दुनिया में उनके संगीत का दबदबा क़ायम रहा. नौशाद ने कुल 67 फ़िल्मों में संगीत दिया. इनमें से आधे से अधिक सुपरहिट रहीं. हाल ही में उन्होंने मुग़ल-ए-आज़म के संगीत को डॉल्बी के लिए दोबारा रिकॉर्ड करवाया था. बीबीसी को दिए एक साक्षात्कार में पिछले साल ही उन्होंने कहा था कि उनकी सर्वश्रेष्ठ धुन अभी बननी बाक़ी है. |
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