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ख़ूबसूरती की मिसाल थी नूरजहाँ: नौशाद | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारतीय फ़िल्म उद्योग के सुप्रसिद्ध संगीतकार नौशाद ने भारत-पाकिस्तान की महान गायिका और अभिनेत्री नूरजहाँ की हाल ही में हुई उनकी पाँचवीं बरसी पर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि पेश की. बीबीसी से एक बातचीत में अपनी पुरानी यादों को ताज़ा करते हुए उन्होंने कहा, " यह वह दौर था जब यादगार और सदाबहार फ़िल्में बनती थीं और बड़े कलाकार हुआ करते थे." नौशाद साहब ने मलकाए तरन्नुम के नाम से मशहूर नूरजहाँ की एक ही फ़िल्म "अनमोल घड़ी" के लिए संगीत दिया था जो कि नौशाद के संगीत, नूरजहाँ के अभिनय और उनकी गायकी के कारण आज भी बॉलीवुड की यादगार फ़िल्मों में गिनी जाती है. नौशाद साहब के अनुसार 'अनमोल घड़ी' का गीत 'आवाज़ दे कहाँ है…' नूरजहाँ की खूबसूरत आवाज़ के कारण हमेशा याद रहेगा." नूरजहाँ को भी अपना वही गीत पसंद था और वह अपने हर कार्यक्रम का प्रारंभ उसी यादगार गीत से किया करती थीं. नौशाद का कहना है, "नूरजहाँ ख़ुद जितनी खूबसूरत थीं उनकी आवाज़ उस से ज़्यादा सुरीली थी. भारत के विभाजन के पश्चात वह पाकिस्तान चली गईं लेकिन हमेशा वहां से फोन करतीं तो रो पड़ती थीं." नूरजहाँ कुछ दिन मुंबई में रहीं और उन्होंने हम से अपना वह घर देखने की ख्वाहिश ज़ाहिर की जिस में वह विभाजन से पहले रहा करती थीं. हम सब साथ गए, चौपाटी का इलाक़ा था, उस घर में पहुंच कर उस घर से जुड़ी नूरजहाँ की सारी यादें ताज़ा हो गईं. उन्होंने घर का एक एक कोना पकड़ा और रोने लगीं. दर असल एक तो फ़नकार ज़ज़्बाती होता है और दूसरे इंसान अपना बचपन और उस से जुड़ी यादें कभी भूल नहीं पाता. यही नूरजहाँ के साथ हुआ. वहां से हम सब दिलीप कुमार के घर गए. नूरजहाँ ने वहाँ पहुँच कर कहा कि वह आज अपने हाथों से खाना पका कर खिलाएँगी. फिर उस दिन किचन उन्होंने संभाला, खाना तैयार हुआ. वह शाम हमारे लिए और नूरजहाँ के लिए एक यादगार शाम थी, महान कलाकारों और अच्छे इंसानों के साथ गुज़ारे पल वक़्त के हसीन लम्हे बन जाते हैं, अब यहाँ ना ऐसे इंसान हैं और ना ही ऐसे कलाकार." |
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