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'जिसे सुनकर लोग रो पड़ें वो है संगीत' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
रीता गांगुली शास्त्रीय संगीत का बड़ा नाम है. अपनी प्रतिभा और लगन की वजह से वह अपनी दोनों उस्तादों यानी सिद्धेश्वरी देवी और बेग़म अख़्तर के भरोसे पर खरी उतरीं. वर्ष 1940 में लखनऊ में जन्मी रीता गांगुली को उनके योगदान के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया जा चुका है. इन दिनों वे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में माइम का हुनर सिखाने के साथ ही साथ आजकल ग़रीब बच्चों को भी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा देने में जुटी हुई हैं. सूफ़िया शानी के साथ हुई लंबी बातचीत के अंश : "सुर से रिश्ता मेरा शायद तभी जुड़ गया था जब माँ बचपन में लोरी सुनाया करती थीं. हमारे यहाँ किसी ने कभी भी गाना नहीं गाया. मैं ब्राह्मण घराने में पैदा हुई जहां घर के अलावा गाने पर पाबंदी थी हालाँकि मेरे पिता गाने सुनने के शौकीन थे. मुझे याद है बचपन की, हमारे घर रसूलन बाई आती थीं. वो मेरे पिता को भाई मानती थीं. तो इस तरह मुझे बचपन में ही बहुतों को सुनने का मौक़ा मिला. बेगम अख़्तर के पास जाने से पहले मैं सिद्धेश्वरी देवी की पहली गंडा-बंद शिष्या थी और बेगम से मुलाकात लखनऊ के एक कार्यक्रम के दौरान हुई जहाँ मैं उन्हें पसंद आ गई. कार्यक्रम ख़त्म होने पर बेगम ने सिद्धेश्वरी देवी से कहा, "मुझे तुम से कुछ चाहिए." सिद्धेश्वरी देवी ने कहा, "ज़िदगी भर मांगती आई हो, कभी किसी को कुछ दिया भी है?" बेगम ने अपनी खूबसूरत मुस्कुराहट के साथ कहा, “यह तो अपनी अपनी-अपनी क़िस्मत है; मैं मांगती हूँ मुझे मिल जाता है और तुम हो कि मांगना ही नहीं जानती." वह बहुत ऐतिहासिक दिन था. तक़रीबन तीस साल बाद दोनों कलाकार रूबरू थीं. इस तरह बेगम ने दो गुरु बेगम अख़्तर की यह ख़ासियत और खूबी थी कि उन्होंने कभी नहीं कहा कि जो तुमने सिद्धेश्वरी से सीखा है उसे भूल जाओ.
वह कहती थीं, "जो तुमने सिद्धेश्वरी देवी से सीखा है वह खालिस चौबीस कैरट सोना है. लेकिन ख़ालिस सोने के गहने से तो कुछ होगा नहीं उसमें एक दो हीरे के नग भी जड़ने चाहिए. तब वह बेशकीमती गहना बन पाएगा. और वह मैं जड़ूँगी." इस तरह वह हमारी क़ाबिलियत के मुताबिक़ हमें सिखाती थी. मैंने बेगम से शायरी का चयन और तर्ज़ देने का हुनर सीखा. अपनी दोनों गुरूओं की तुलना करूँ तो सिद्धेश्वरी जी बहुत मेहनत चाहती थीं वह चाहती थीं कि हूबहू उनकी नक़ल की जाए. जबकि बेग़म हमें अपनी शख़्सियत उभारने का पूरा मौक़ा देती थीं. वो कहती थीं,” मैं चाहती हूं मेरी रूह तुम्हारी मौसीक़ी में झलके”. दोनो में यह बुनियादी फर्क था. घर पर संगीत का माहौल तो था नहीं लिहाज़ा प्रोत्साहन का तो सवाल ही नहीं उठता. बल्कि जब संगीत की तरफ रूझान बढ़ने लगा तो पिताजी ने समझाया कि अपना घ्यान पढ़ाई में लगाओ क्योंकि जिस दिन तुम क्लास में दूसरे नंबर पर आओगी उस दिन तुम्हें अपना गाना छोड़ना पड़ेगा. मगर मेरी ज़िद कहें या कि लगन, मैंने पढ़ाई में अव्वल आते हुए संगीत का सफ़र जारी रखा. फ़िल्म के लिए गाना फिल्मी दुनिया में जाने की ख़्वाहिश कभी रही ही नहीं. यह महज़ इत्तेफ़ाक़ है कि मैं ने जगमोहन मूदड़ा जी की फिल्म 'बवंडर' में 'केसारिया बालम' गाया. हालांकि राज कपूर ने फिल्म 'हिना' के लिए भी गाने को कहा था लेकिन “हां” न कर सकी. 'परिणीता' मे इसलिए गाना पड़ा क्योंकि शरतचंद और प्रदीप सरकार की मैं भक्त हूँ. प्रदीप सरकार आज के सत्यजीत राय हैं. मुझे लगता है कि आज भी मैं किसी मुक़ाम पर नहीं पहुँची हूँ. मुक़ाम तो सचमुच वह है कि लोग आपको सुनकर वाह-वाह के बजाए अहा-अहा करें और रोएँ. शम्भू महराज जी लोगों को नाच कर रूलाते थे, सिद्धेश्वरी जी के क्या कहने. बेगम उस तरह से आज भी ज़िंदा हैं. आजकल मैं कुछ ऐसे ग़रीब बच्चों को संगीत सिखा रही हूं जिनके पास किसी उस्ताद के पास जाकर सीखने के साधन नहीं हैं. एक कोशिश है, बच्चों को सीख कर ख़ुशी मिल रही है और मुझे उन्हें सिखा कर मज़ा आ रहा है." | इससे जुड़ी ख़बरें क्या चार चाँद लगा पाएँगे चार संगीतकार?14 नवंबर, 2005 | मनोरंजन मैं अच्छा शागिर्द हूँ: बिरजू महाराज 12 नवंबर, 2005 | मनोरंजन 'रीमिक्स के नाम पर भद्दा मज़ाक'30 सितंबर, 2005 | मनोरंजन 'बाज़ार चलाता है मेरी दुनिया'20 सितंबर, 2005 | मनोरंजन देखिएः लाइव-8 का वीडियो प्रसारण02 जुलाई, 2005 | मनोरंजन 'शास्त्रीय संगीत में शॉर्टकट नहीं होता'06 जून, 2005 | मनोरंजन 'फ़्यूज़न संगीत में कोई बुराई नहीं'26 मई, 2005 | मनोरंजन कर्नाटक संगीत में डूबा ज़ुलु युवक10 जून, 2004 | मनोरंजन | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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