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सोमवार, 06 जून, 2005 को 18:46 GMT तक के समाचार
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'शास्त्रीय संगीत में शॉर्टकट नहीं होता'

सितारवादक देबू चौधरी
देबू दा शास्त्रीयता के मुल रूप को बनाए रखने के पैरोकार हैं.
भारतीय शास्त्रीय संगीत को अपने योगदान के लिए पद्मविभूषण से सम्मानित जानेमाने सितार वादक देबू चौधरी का मानना है कि शास्त्रीय संगीत के लिए शॉर्टकट नहीं, साधना की ज़रूरत होती है.

अपने गुरू, उस्ताद मुश्ताक अली ख़ान साहब की सितार परंपरा को जीवित रखनेवाले अकेले कलाकार, देबू दा मानते हैं कि तमाम सम्मानों और प्रसिद्धि के वाबजूद उन्हें आज भी अपनेआप को और अपनी संगीत परंपरा को जीवित रखने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है.

देबू दा शास्त्रीय रागों के मुल रूपों को यथावत बनाए रखने के लिए जाने जाते हैं और वो शास्त्रीयता के साथ किसी भी तरह के खिलवाड़ के ख़िलाफ़ हैं.

पिछले दिनों देबू दा ने अपने जीवन के 70 बसंत पूरे किए. इस अवसर पर उनसे विशेष बातचीत के अंश.

जीवन के 70 वर्षों की यात्रा के बाद ख़ुद को कहाँ पाते हैं.

भले ही 70 बसंत बीत गए हों, पर अभी भी जीवन के प्रति और साथ ही अपनी कला को जीवित रखने का संघर्ष ख़त्म नहीं हुआ है. मैं मुश्ताक अली ख़ान साहब की संगीत परंपरा का इकलौता वारिस हूँ और संगीत के मूल रूप को बनाए रखते हुए आगे बढ़ रहा हूँ.

वैसे यह मेरी आदत में है कि बिना संघर्ष के अब कोई भी चीज़ अच्छी ही नहीं लगती. मेरे गुरू को भी अपने जीवन भर संघर्ष ही करना पड़ा था और उनके बाद ही लोगों को उनकी कला का महत्व पता चला. आज मैं उस कला और सम्मान, दोनों का संघर्ष कर रहा हूँ.

मैं एक व्यापारी परिवार में पैदा हुआ और तमाम विरोधों के बावजूद कोलकाता से दिल्ली आया. सिर्फ़ यह साबित करने के लिए कि संगीत को जानने के लिए किसी घराने में पैदा होना ज़रूरी नहीं है.

दिल्ली में 200 रूपए की नौकरी और करोलबाग क्षेत्र में एक कमरे में चार लोगों के साथ मैंने अपना संघर्ष शुरू किया था.

पर मुझे जो नहीं मिला, मैं उसकी नहीं, जो मिला उसकी बात करता हूँ.

क्या ख़ास है आपकी परंपरा के संगीत में.

अपनी शैली को क़ायम रखना, राग की शुद्धता और संगीत के मूल रूप की सच्चाई ही हमारी पहचान है.

लोग प्रयोग करते हैं. हम उसे ग़लत नहीं ठहराते पर अपने मूल रूप में हम कोई तब्दीली या छेड़खानी नहीं करना चाहते.

भैरवी, बागेश्वरी, ध्रुपद और अहिर भैरव हमें ख़ासतौर पर पसंद हैं और इसके अलावा हमारी अपनी परंपरा के राग, जैसे विश्वेश्वरी, अनुरंजनी, प्रभातमंजरी और पलाशसारंग मैंने ख़ुद बनाए हैं.

पर भारतीय शास्त्रीय वाद्यों की जगह आज के युवा वर्ग को पश्चिमी वाद्य ज़्यादा प्रभावित करते हैं, क्या वजह है?

इससे परेशान होने की ज़रूरत नहीं है. आप ख़ुद देखें कि कितने ही सुगम गीत और संगीत आए, लोगों के बीच ख़ासे प्रचलित रहे और फिर लुप्त हो गए पर सैकड़ों वर्षों का सफ़र तय कर चुके भारतीय राग और वाद्य आज भी अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं और ख़ासे पसंद किए जाते हैं.

मेरा तो मानना है कि जो श्रेष्ठ है, वो बचेगा और जो नहीं, वो ख़त्म हो जाएगा.

पर तमाम दूसरे बड़े संगीतकार भी आजकल प्रयोग को ज़्यादा महत्व दे रहे हैं. इस बारे में आप क्या सोचते हैं?

देखिए, इसमें कोई नुक़सान नहीं है पर आप कुछ भी कर लें. मूल रागों और स्वरों को कोई हिला दे तो जानें. इसकी बुनियाद इतनी पक्की है कि उसे कोई नष्ट कर सकता.

अगर लोग प्रयोग करना चाहते हैं तो करें. बहकते तो वो हैं जिनकी बुनियाद नहीं है. हम अपने काम पर गर्व करते हैं और हमें अपने पर विश्वास है.

कला सीखने की चीज़ है, कोई टाइपिंग मशीन नहीं है कि मिनटों में दूसरी प्रति तैयार कर दी जाए.

पर आज की नई संगीत पीढ़ी में जो जल्दी प्रसिद्धि पाने की होड़ है, वो शास्त्रीयता के लिए कितनी उचित है.

देखिए, इस कला के लिए एक जीवन भी काफ़ी नहीं है. यह तो साधना की चीज़ है. अगर किसी से आज मैं कहूँ कि सारी चीज़ें भूलकर फिर से शुरू करो तो लोग मुझे छोड़कर कहीं और चले जाएंगे.

यह 'जेट-एज' है और इस दौर में लोगों के पास संयम और साधना कम, भूख ज़्यादा है और उसे वो दूसरे तरीकों से पाना चाहते हैं.

पर कितने ही दौर आए और चले गए. आज जो दौर है, वो भी चला जाएगा पर मूल संगीत हमेशा जीवित रहेगा. दौर चिंता की बात नहीं हैं, ये तो आते हैं और चले जाते हैं.

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