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'बाज़ार चलाता है मेरी दुनिया' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दुनिया में कितने ही तरह के लोग हैं और उनकी ज़िंदगी के अपने अलग-अलग अनोखे रंग भी हैं. ऐसी ही विविधताओं के साथ लोग दुनिया में आते हैं और इन तमाम चीज़ों के सहारे अपनी ज़िंदगी जीते हैं. पर एक संगीतकार की दुनिया कैसे चलती है और कौन प्रभावित करता है उनके जीवन को, यह जानने के लिए पाणिनी आनंद ने बात की भारत की जानी-मानी शास्त्रीय संगीत गायिका शुभा मुदगल से. आइए जानते हैं शुभा मुदगल की ज़ुबानी- मेरा जीवन किसी अन्य भारतीय संगीत विद्यार्थी या संगीतकार के जीवन से बहुत भिन्न नहीं है. मेरी तालीम हुई है शास्त्रीय संगीत में यानी जो पारंपरिक संगीत है लेकिन मैं समसामयिक भारत की, आज के आधुनिक भारत की महिला हूँ. आज के दौर में भारतीय पारंपरिक कलाओं के लिए बहुत ज़्यादा संघर्ष का दौर है. एक ओर तो संगीत परंपरा वाले परिवारों में न जन्मी मुझ जैसी महिला भी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ले सकती है, जो कि अब से पचास या सौ वर्षों पहले संभव नहीं था. पहले तो महिलाओं का पेशेवर संगीतकार होना बड़ा मुश्किल था औऱ एक ख़ास वर्ग की महिलाएँ ही ऐसा कर सकती थीं, भद्र परिवारों की महिलाओं को यह अनुमति नहीं थी. पर आज मुझ जैसी महिला भी शास्त्रीय संगीत सीख सकती है, मंच प्रस्तुतियां कर सकती है. अपनी आजीविका भी संगीत के द्वारा चला सकती है. कठिन है डगर लेकिन दूसरी ओर माहौल ऐसा बनता चला जा रहा है कि भारतीय संगीत में जो भी विविधता है, वो धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है. आप रेडियो सुनें या टीवी देखें या फिर जो कार्यक्रम होते हैं, उन्हें देखें, एक ही प्रकार का संगीत और वो भी बॉलीवुड की देन, सुनने को मिलता है. ऐसा लगता है कि कोई भी ऐसा संगीत जो एक ख़ास तरह के डांस के लिए उपयुक्त न हो, उसे सराहनेवाले लोग दिन-ब-दिन कम से कम होते जा रहे हैं. मेरी परवरिश जिस माहौल में हुई है, वहाँ बताया गया है कि हर प्रकार के संगीत की श्रद्धा करनी चाहिए, उसका आनंद लेना चाहिए और फिर लोगों की प्राथमिकताएं तो होती ही हैं लेकिन अब ऐसा नहीं है. ऐसा होता जा रहा है कि चाहे होली हो या दिवाली या फिर स्वतंत्रता दिवस हो या फिर हिरोशिमा में हुए परमाणु बम विस्फ़ोटों की सालगिरह, हर अवसर का संगीत एक जैसा ही है और ऐसा लगने लगा है कि भारतीय संगीत की विविधता एक घुटन महसूस करने लगी है. मैं भी उसी दौर में जी रही हूँ और मेरी दुनिया भी इन्हीं से प्रभावित हो रही है. मेरी दुनिया भी बाज़ार से चल रही है. मुझको है आशा
हाँ मगर यह आस्था, यह विश्वास कि अपने साथ अगर शास्त्रीय संगीत है तो आसानी से सब गुज़र जाएगा. जितना भी संघर्ष, जितनी भी कठिनाइयां आएं पर कभी ऐसा नहीं होगा कि हम अपने को अकेला महसूस करेंगे. हमारे बड़े-बुज़ुर्गों ने भी यही कहा है कि एक जज़्बा होना चाहिए. एक विश्वास होना चाहिए कि आप जो करना चाह रहे हैं, वही करें और यह जो बाज़ार के रुख़ हैं, इनसे विचलित होने की कोई ज़रूरत नहीं है. हमने भी ठान ली है कि जो चाहते हैं, वही करेंगे. |
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