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बुधवार, 12 जुलाई, 2006 को 20:04 GMT तक के समाचार
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मुक्तिबोध के साथ तीन दिन

गज़ानन माधव मुक्तिबोध
मुक्तिबोध वामपंथी विचारधारा के प्रबल समर्थक थे
मुक्तिबोध को याद करूँ तो ज़्यादा यादें मेरे पास नहीं हैं पर जो हैं वे अप्रतिम और बहुत कारगर यादें हैं. कई बार ही शंकर परसाई से यह तय हुआ कि राजनादगाँव जाकर मुक्तिबोध से मिलना है.

यह प्रोग्राम कभी बन नहीं पाया क्योंकि मैं उन दिनों ‘सारिका’ में बम्बई था और दौड़ते भागते ही परसाई के पास जबलपुर पहुँच पाता था.

लेकिन इससे भी पहले, बहुत पहले मुक्तिबोध का कुछ ज़रूरी ज़िक्र श्रीकाँत वर्मा के उन दो तीन पत्रों में मौजूद था जो श्रीकाँत वर्मा ने बिलासपुर से लिखे थे, जब मैं इलाहाबाद में था. श्रीकाँत वर्मा शुरू से ही मुक्तिबोध मय थे.

यह प्रगतिशील चेतना का स्वर्णकाल था. पंडित जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री थे. भारत गुटनिरपेक्ष देशों का अग्रदूत था. ग़रीबी उन्मूलन के लिए पँचवर्षीय योजनाओं की शुरुआत हुई थी. सार्वजनिक सेक्टर को प्राइवेट सेक्टर पर तरजीह दी गई थी.

विश्व शाँति की प्रखर पक्षधरता का वह दौर था और भारत शीतयुद्ध और परमाणु बमों की स्पर्धात्मक होड़ का घनघोर विरोधी था.

साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद, पूँजीवाद और मार्क्सवादी साम्यवाद पर तब तीखी बहसें होती थीं. लोकतांत्रिक भारत की संसद में तब कम्युनिस्ट पार्टी दूसरी सबसे बड़ी पार्टी थी.

कामरेड पीसी जोशी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जनरल सेक्रेटरी थे. हिंदी सहित भारत की सभी भाषाओं में प्रगतिशील सोच और लेखन का आंदोलन अपने शिखर पर था. तब हिंदी के रचनात्मक साहित्य का केंद्र इलाहाबाद था.

उन्हीं दिनों 1957 में एक विराट साहित्यिक समारोह का आयोजन इलाहाबाद में हुआ था. जिसमें मुक्तिबोध तक शामिल हुए थे. यह आयोजन प्रेमचंद के छोटे बेटे अमृतराय ने किया था. जिन्हें हम अमृत भाई कहते थे.

सुभद्रा कुमारी चौहान की बेटी सुधा उनकी पत्नी और हम सबकी भाभी थीं. शिवानी प्रेमचंद तब इलाहाबाद में ही अमृतराय के पास रहती थीं और हम लोग रोज़ ही उनसे मिलते थे. अमृतराय से मुक्तिबोध की दाँतकाटी दोस्ती थी.

अमृतराय एक छोटी सी सड़क मिंटो रोड पर रहते थे, जहाँ क्नाटीनुमा एक से चार घर थे. पहला घर ओंकार शरद का था दूसरा खाली पड़ा था तीसरे में अमृत भाई और चौथे में दादा श्रीकृष्णदास रहते थे.

मार्कण्डेय उन्हीं के साथ रहते थे और यही मेरा और दुष्यंत कुमार का अड्डा था. यह नई कहानी के उदय का तूफानी दौर था. वैचारिक और रचनात्मक स्तर पर दादा श्रीकृष्णदास पत्रकारिता और लोकधर्मी रंगमंच इप्टा के बानियों में थे.

यहीं सरोजिनी भाभी, श्रीमती कृष्णदास के माध्यम से हम लोगों की ऐतिहासिक मुलाकात डॉ नामवर सिंह से हुई थी. दूसरी ऐतिहासिक मुलाकात दो साल बाद यहीं पर मुक्तिबोध से हुई थी जब वे इलाहाबाद प्रगतिशील साहित्य समारोह में आए थे और दादा श्रीकृष्णदास के घर उनसे मिलने पहुँचे थे.

दुनिया जानती है कि मुक्तिबोध वामपंथी कम्युनिस्ट विचारधारा के प्रबल समर्थक थे. उन्होंने जो बातें दादा श्रीकृष्णदास और बाद में मार्कण्डेय, दुष्यंत और हमसे कीं उसके शब्द ज़रूर दूसरे हैं पर सर्वहारा की सशस्त्र क्राँतिवादी सोच के उन दिनों में मुक्तिबोध ने जो बातों बातों में कहा वह मेरे दिमाग में आज भी उत्कीर्ण है.

बीड़ी का गहरा सुट्टा लगाते हुए वे बोले थे पार्टनर रूसी या फ्राँसीसी क्राँति का आयात नहीं किया जा सकता. प्रत्येक क्राँति अपनी ज़मीनी सच्चाइयों और कारणों से जन्मेगी. तब तुम ग़ैरबराबरी मिटाकर बराबरी लाने की बात करोगे तो लोग तुम्हें समाजवादी कहेंगे लेकिन जैसे ही तुम ग़ैरबराबरी के कारणों की तलाश करना शुरू करोगे लोग तुम्हें कम्युनिस्ट कहना शुरू कर देंगे.

इसे मंजूर करना भाषा की कभी परवाह मत करना. महाजनी सभ्यता से कम ख़तरनाक और कम क्रूर नहीं है व्यवसायी शोषक सभ्यता.

दुकानदारी और कर्जदारी. तलाश करना ज़रूरी है कि सभ्यता का अड्डा तिरछा विकास क्यों हुआ है. विचारों के जनसंघर्ष के लिए जनतंत्र ज़रूरी है. सर्वहारा की तानाशाही एक मिथकीय मुहावरा है. पर इस राजनीतिक मिथक को ध्वस्त और पराजित होने से बचाना भी ज़रूरी है आदि आदि.

समारोह में तो मुक्तिबोध, शमशेर बहादुर सिंह और नरेश मेहता मिलते ही थे पर मुक्तिबोध खासतौर से शमशेर बहादुर सिंह के बहादुरगंज वाले एक कमरे के मकान में गए थे. मैं ही उन्हें लेकर गया था. वहाँ वे शमशेर भाई से उनके छोटे भाई तेज बहादुर चौधरी के बारे में बातें करते रहे थे. बीच बीच में मैं उन्हें इलाहाबाद की मशहूर लाल मोहम्मद बीड़ी सुलगा सुलगा कर देता रहा था.

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