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शकीला बानो भोपालीःकारवाँ की बात करो | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इससे पहले कि मैं वर्ष 1957 वाला इलाहाबाद का ऐतिहासिक साहित्य समारोह और उसमें भाग लेने आए गजानन माधव मुक्तिबोध को याद करूँ, मैं क़व्वाली की कालजयी गायिका शकीला बानो भोपाली को याद करने के लिए मजबूर हूँ. कारण है रामप्रकाश त्रिपाठी द्वारा वर्णित उनका एक मार्मिक प्रसंग. शकीला बानो भोपाली की तहज़ीब और उनकी मानवीयता से जुड़ा यह प्रसंग बेमिसाल है. तो यह टुकड़ा रामप्रकाश त्रिपाठी के हवाले से. भोपाल में जब मैं अपनी गर्दिश दूर करने के लिए आया तो रमाकांत और ब्रज बिहारी दीक्षित के साथ बुधवारा की टोलवाली मस्जिद की गली के एक कमरे में किसी तरह गुज़र कर रहा था. तब एक दिन मुझपर पहले से मेहरबान उर्दू के नामानिगार और अज़ीम शायर ताज भोपाली साहब मिले. उस दिन मेरे दोनों रूम पार्टनर ग्वालियर गए हुए थे. मैं अकेला था. ताज साहब नई शेरवानी और अलीगढ़ी पायजामा पहने हुए थे. बालों में तेल भी था और कंघी भी की हुई थी. हजामत तक बनी हुई थी. ताज साहब की यह बनक मेरे लिए अजूबा थी. ईद के दिन भी मैंने उन्हें सजा-बजा नहीं देखा था. वे मुझसे बोले, कुछ पैसे डाले हो? मैंने स्वीकृति में सिर हिलाया. वे बोले, चलो क़व्वाली सुनवाते हैं. मैं समझा टिकिट-विकिट होगा, पर नहीं. वे भोपाल की बड़ी झील के किनारे फ़िरदौस पार्क के पास शकीला बानो भोपाली के यहाँ ले गए. वो अपना जन्मदिन मनाने भोपाल आई थीं. वहाँ महफ़िल जमी थी. दरियादिली ख़ैर साहेब, क़व्वालियाँ हुईं. तारीफ़ों और वाहवाही के पुल बंधे उस रात. पर शकीला तमाम वाहवाहों में से पता नहीं कैसे ताज साहब की ‘वाह’ को पहचान लेती थीं और क़रीब आकर अदब से सलाम करती थीं. ताज साहब इशारे से मुझे हुक्म देते, मैं उन्हें रुपए थमा देता. वे शकीला को देते और वे उसे अपने ओठों, आँखों और माथे से लगाकर रख लेतीं. ऐसा कई कई बार हुआ. हालाँकि शकीला जी की एक क़व्वाली पर मेरी तमाम तनख्वाहें न्यौछावर थीं मगर इस वक़्त महीने भर के ख़र्चे से ख़ाली होती जेब ने मेरी पेशानी पर बल ला दिए थे. ताज साहब तो बादशाहों के बादशाह थे. नंगे नवाब थे पर क़िले पर उनका घर था. न उन्होंने कभी पैसे की क़द्र की, न पैसे ने उनकी. अगली बार ताज साहब से वाहवाही का नोट स्वीकारते हुए शकीला बानो साहिबा ने मेरी आँखों की कातरता पढ़ ली. बहरहाल जब शकीला बानो के जन्मदिन के जश्न की दावत-वाबत खाकर मैं घर लौटा और स्वेटर उतारा तो क़मीज़ से तुड़े-मुड़े नोटों की एक छोटी गड्डी गिरी जो शकीला जी ने जेबकतरों वाली कुशलता के साथ मेरी जेब में ठूँस दी होगी. दरअसल चलते वक़्त उन्होंने लाड़ में मुझे ऐसे चिपका लिया था जैसे बड़ी बहन अपने बीरन को प्यार करती है. यह नोट उसी बड़ी जेबकतरों वाली कुशलता से इनायत किए गए थे जो मेरी तनख़्वाह से कहीं ज़्यादा थे. तो यह थी क़व्वाली की मलिका शकीला बानो भोपाली की मानवीयता भरी दरियादिली और तह़ीब. मुलाक़ात शकीला बानो से पहली बार मिलने का मौक़ा मुझे यूसुफ़ भाई (दिलीप कुमार) के घर मिला था. तब मैं उनके लिए ‘काली सरसों’ और ‘हव्वा खातून’ नामक फ़िल्मों की स्क्रिप्ट पर शुरुआती काम कर रहा था. वहीं दिलीप साहब ने उनसे मुलाक़ात की अपनी पहली घटना सुनाई थी. क्योंकि तभी से वो शकीला बानो की गायकी और तहज़ीब के मुरीद हो गए थे. प्रख्यात फ़िल्मकार बीआर चोपड़ा साहब तब भविष्य में इतिहास रचनेवाली फ़िल्म ‘नया दौर’ बना रहे थे. मध्यप्रदेश के होशंगाबाद ज़िले के बुदनी गाँव में शूटिंग चल रही थी. बारिश की वजह से फ़िल्म का ‘मोटर तांगा’ रेसवाला मशहूर सीन रुका हुआ था. यूनिट बेकार बैठी हुई थी. तो वक़्त गुज़ारने के लिए वहीं तब कमसिन शकीला बानो की पहली महफ़िल सजी थी. चोपड़ा साहब दिलीप कुमार, वैजयंतीमाला और जानी वाकर आदि सभी उनकी अदायगी और गायकी की क़व्वाली विधा का करिश्मा देख कर दंग रह गए थे. और तब हिंदी फ़िल्मों में क़व्वाली विधा का आगाज़ हुआ था. तो क़िस्सा कोताह यह कि शकीला जी से मुलाक़ात हुई और तब उनकी शख़्सियत का रचनाकार होने वाला ख़ास पहलू खुला. वो बेहतरीन नज़्में और ग़ज़लें भी लिखती थीं. वो ताज भोपाली, कैफ़ भोपाली, अख़्तर सईद खाँ की शायरी और बच्चन जी के गीतों और मधुशाला की मुरीद थीं. उन्हें भारत की गंगा-जमुनी संस्कृति और मिले-जुले भाषाई लेखन के कारवाँ पर नाज़ था. और बातों-बातों में उन्होंने कहा था कि वो मीराबाई के नक्शे क़दम पर चल रही हैं. शकीला जी ने भारत की कृष्ण भक्ति और सूफ़ी परंपरा पर बहुत गहरी बातें की थीं और क़व्वाली के जन्मदाता और खड़ी बोली हिंदी-उर्दू के प्रथम कवि अमीर ख़ुसरो के योगदान से वो बख़ूबी परिचित थीं. फिलहाल शकीला जी के बारे में इतना ही. |
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