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सिने संगीत के मोर्चे पर ख़य्याम | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ख़य्याम साहब से मुलाक़ातों का लगातार मौक़ा मुझे इस्मत आपा यानी इस्मत चुगताई और राज वेदी भाई के कारण मिलता रहा क्योंकि शुरू-शुरू में मैं चर्चगेट की ‘ए’ रोड के इंडस कोर्ट में राज वेदी और उज्वला भाभी के साथ ही रहता था. राज वेदी और इस्मत आपा का घर साथ-साथ था. किचिन की खिड़कियाँ आमने-सामने थीं. और उज्वला भाभी से यह पूछते कि केसर तो डाल दी, इलायची पीस कर डालूं या साबुत, इस्मत आपा की ऐसी ज़रूरतों की आवाजें सुनाई ही पड़ती रहती थीं. राज वेदी मेरे और मोहन राकेश के भाई से ज़्यादा दोस्त और बड़े भाई थे. वे अंतरराष्ट्रीय ख्याति के फ़ोटोग्राफर थे. उनके छोटे भाई मित्तर वेदी इंडस्ट्रियल फ़ोटोग्राफी के जनक थे. उज्वला भाभी स्टूडियो की इंचार्ज थीं और घर की अन्नपूर्णा. घर में दो बच्चे थे, मिन्ना और तुषार. दिन भर के बाद राज भाई और इस्मत आपा शाहिद का घर शाम को एक हो जाता था. कोई शाम खाली नहीं जाती थी. आने-जाने वालों में सभी तो थे. कृशन चंदर-सलमा, राजिंदर सिंह बेदी, ख्वाजा अहमद अब्बास, जोए अंसारी, सरदार जाफरी-सुलताना, बाकर मेंहदी, रघु राय, एस पॉल, जगजीत सिंह-चित्रा, सुरिंदर सिंह-पद्मा, राजेंद्र मेहता-नीना, डॉ धर्मवीर भारती-पुष्पा, गिरधारी वैद-उर्मिला, टीपी झुनझुनवाला-शीला, ओपी नैयर, मदन मोहन, मजरूह, साहिर, साबिर दत्त, सुखदेव, कंरजिया, अरविंद-कुसुम आदि-आदि और फिर ख़य्याम तो थे ही जगजीत कौर के साथ-साथ. मुलाक़ात लेकिन ख़य्याम से मेरी खास और गहरी मुलाक़ातें उस समय हुईं जब जिया सरहदी साहब पाकिस्तान से भारत आए हुए थे. वे बंबई लौटकर फ़िल्में बनाना चाहते थे. उनका डेरा प्रेम जी के यहाँ पड़ा. प्रेमजी वैसे तो दिलीप कुमार के सेक्रेटरी थे पर वे फ़िल्में भी प्रोड्यूस करने लगे थे. महबूब स्टूडियो के फाटक के सामने वाली बिल्डिंग में उनका ऑफिस था. वहीं प्रेमजी ने जिया सरहदी साहब से मुलाक़ात के लिए मुझे बुलाया था. जिया सरहदी ख़ुद एक बड़े लेखक थे.
प्रेमजी और जिया सरहदी ने फ़िल्म लिखने के लिए मुझे चुना. इसे लेकर मैं बेहद खुश और चकित था. भारत छोड़ने से पहले जिया साहब चंदूलाल शाह की ‘फुटपाथ’ फ़िल्म लिख चुके थे. अब जिस फ़िल्म पर मैंने काम शुरू किया उसकी थीम जिया साहब ने ही दी थी. टाइटिल रखा गया था ‘नौजवान’. कहा जा सकता है कि यह एक खुली प्रगतिवादी फ़िल्म थी. इसी फ़िल्म की बैठकों के दौरान ख़य्याम साहब जिया सरहदी से मिलने कई बार आते रहते थे. वे पुराने दोस्त थे. ख़य्याम ने ही जिया साहब की दिलीप कुमार अभिनीत ‘फुटपाथ’ में म्यूज़िक दिया था. शायद अब वे ‘नौजवान’ का म्यूज़िक देनेवाले थे. तो डिटेल्स से बचकर यह कहा जा सकता है कि ख़य्याम, जिया सरहदी और साहिर का एक साथ आना आकस्मिक नहीं था. मेरा हौसला तो ज़रूरत से ज़्यादा ही बढ़ा हुआ था. निकटता पलायनवादी रोमांटिक फ़िल्मों से हटकर हम अवाम के दुख-दर्द और संघर्ष की दास्तान पेश करने जा रहे थे. ख़य्याम की यह ख़ासियत सामने आई कि दोस्त और मेहरबान अपनी जगह, पर संगीत देने को वह तभी तैयार होते थे जब उन्हें थीम पसंद हो. थीम के प्रति इस छुआ-छूती रवैए के कारण ही उन्हें पंडितजी पुकारा जाता था. उनका यही नाम चल पड़ा था. उन्हें ख़य्याम नाम जिया सरहदी ने ही दिया था. वैसे ख़य्याम एक ख़ुदापरस्त खानदान से आए थे. उनके पिता मस्जिद में इमाम थे पर वे तरक्की पसंद तहरीक से जुड़े हुए थे. इसलिए बॉक्स आफिस पर फेल होने के बावजूद वे ‘फिर सुबह होगी’ के अपने संगीत और साहिर के गीतों को बहुत ही सराहा करते थे. ‘वो सुबह कभी तो आएगी’ वे गुनगुनाते रहते थे या मेज पर उंगलियों की ताल के साथ ‘आसमां पे है ख़ुदा और जमीं पे हम’ उन्होंने कई बार सुनाया था. वैसे उनके अक्षत यश में चेतन आनंद की फ़िल्म ‘आख़िरी ख़त’, ‘रजिया सुल्तान’, ‘कभी-कभी’ और ‘उमराव जान’ तो शामिल है ही पर शायद पाठकों को यह नहीं मालूम होगा कि साहिर जैसे सफलतम शायर की सोहबत में ख़य्याम ने कुछ बेहद खूबसूरत नज्में और ग़ज़लें भी लिखी हैं. और क्या कोई विश्वास करेगा कि खै़याम जैसा अमिट और अमर संगीत देने वाले संगीत निर्देशक दूसरे विश्व युद्ध के दौरान फौज के मोर्चे पर दक्षिण एशिया के मुल्कों में तैनात रहा है! वे रंगून, पिनांग और सिंगापुर में रहे और चाहते थे कि नेताजी सुभाषचंद्र बोस की आज़ाद हिंद फौज में शामिल हो सकें. पर तब तक युद्ध में पराजित होकर जापान हथियार डाल चुका था. युद्ध के खूनी मोर्चे से लौटकर ख़य्याम ने भारतीय सिने-संगीत का अपराजेय मोर्चा संभाला था. |
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