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बाज़ार के बेचारों का सच 'आगरा बाज़ार' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दिल्ली के एक सरकारी संस्थान का खुला-गीला मैदान, आसमान में बादल, ओले और बौछारें छोड़ते और ऐसे में एक खुले मंच पर डेढ़ सौ साल पुरानी.. एक शहर की कहानी. सैकड़ों दर्शकों की मौजूदगी में जब 54 साल से मंचित हो रहे नाटक 'आगरा बाज़ार' का एकबार फिर मंचन हुआ तो थिएटर के दीवाने 'आगरा बाज़ार' देखने के लिए उमड़ पड़े. और ऐसा होता भी क्यों नहीं, महान नाटककार हबीब तनवीर का नाटक हो, नज़ीर अकबराबादी के दौर का किस्सा हो और बात हो मशहूर शहर आगरा की तो कोई भी देखना चाहेगा ही. ककड़ी, किताबें, तरबूज़, लड्डू, पान और कुम्हार के भांडों से सजे-मजे बाज़ार में हबीब तनवीर ने अपनी पटकथा, गानों, संगीत, निर्देशन और सज्जा से उस शहर का ताना बुन दिया है जो 19वीं सदी के एक बदलते हिंदोस्तान की हक़ीकत है और इतिहास के एक दौर का सच भी. 'आगरा बाज़ार' 'आगरा बाज़ार' हबीब तनवीर का लिखा नाटक है जिसका पहला शो हुआ था 1954 में. पर रवानी और लोगों को मंत्रमुग्ध कर देने की क्षमता आज 54 बरस बाद भी इस नाटक में मिलती है.
यह नाटक 19वीं सदी में अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ 1857 के विद्रोह को देख चुके हिंदुस्तान के एक शहर आगरा की तस्वीर खींचता है जिसमें समाज, बाज़ार, संस्कृति, सोच और सलीके... सबकुछ बदल रहे हैं. एक ओर मुग़ल परंपरा की ओढ़ी-ढकी चादर और नज़ाकत की सूखती आंखें हैं तो दूसरी ओर है नज़ीर अक़बराबादी की गज़लों में बसता आम आदमी, रूढ़ियों-वर्जनाओं से उठते, बाहर निकलते शायर का शहर. आगरे के इस बाज़ार में दुकानदारों के बीच लाचारी, बेबसी है क्योंकि ख़रीदार नदारद हैं. ख़रीदार जो हो सकते थे, उनके पास काम नहीं है. बेरोज़गारी और लाचारी के चेहरे ओढ़े लोग वक्त काट रहे हैं. इस आस में कि कभी माहौल सुधरेगा. शायर और उसके कुछेक चाहनेवाले अपनी सोच, मिज़ाज और सामाजिक जुड़ाव से इन कठिनाइयों में भी एक शहर और इस बहाने एक संस्कृति, सामाजिकता को ज़िंदा रखने की कोशिश कर रहे हैं. प्रशासनिक कुव्यवस्था, तवायफ़ों के कोठे, घूसखोर कोतवाल, बदअक्ल सिपाही, बाज़ार में अख़बार और किताबों से कमाई और नाम खोजते लोगों का ठिकाना है यह 'आगरा बाज़ार'. अंदाज़े हबीब रंगकर्मी हबीब तनवीर के नाटकों की ख़ास बात यह रही है कि झुग्गियों में रहनेवालों, ग्रामीणों, आदिवासियों और आम लोगों के साथ वो ऐसे नाटक तैयार करते हैं जिनके आगे प्रोफ़ेशनल कलाकार बौने नज़र आने लगते हैं.
इन नाटकों में इन आम लोगों के ज़रिए आमजन के सवाल दर्शकों के सामने आते हैं. अकादमिक काम के बजाय लोगों के बीच काम करते रहे हबीब प्रगतिशील नाट्य समूह इप्टा के साथ लंबे समय तक जुड़े रहे. दिल्ली में 'आगरा बाज़ार' के मंचन के बाद कुछ पत्रकारों ने आज के रंगमंच की हालत पर जब उनसे सवाल किया तो हबीब बहुत तसल्ली से बोले, "आप फ़िक्र न करें. थिएटर ख़त्म नहीं होने वाला, वो तो ख़ूब हो रहा है. हां, आप लोगों को दिखाई कम ही देता है. आप देखना कम चाहते हैं. आज पहले से ज़्यादा नाटक हो रहे हैं." हबीब कहते हैं, "जब सिनेमा आया था तो लोगों को लगा कि अब थिएटर मर जाएगा. फिर टीवी आया तो सिनेमाघर खाली होने लगे और लगा कि अब वे बंद हो जाएंगे. आज थिएटर, सिनेमा, टीवी सब अपना वजूद लेकर आगे बढ़ रहे हैं. अच्छी फ़िल्में भी बन रही हैं. अच्छे नाटक भी हो रहे हैं." 'आगरा बाज़ार' की कहानी केवल आगरा के एक दौर के बाज़ार की कहानी नहीं है बल्कि बाज़ार में बेचारे बन चुके उन हज़ारों लोगों की कहानी है जिनके पास रहने, जीने और बेचने को बहुत कुछ नहीं है... और बाज़ार उनसे उतना भर भी छीनता जा रहा है. |
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